Wednesday, August 5, 2015

Thursday, July 24, 2014

आखिर कहां जाएं औरतें


संजय द्विवेदी 

आखिर औरतें कहां जाएं? इस बेरहम दुनिया में उनका जीना मुश्किल है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता (जहां नारियों की पूजा होती है देवता वहां निवास करते है) का मंत्र जाप करने वाले देश में क्या औरतें इतनी असुरक्षित हो गयी हैं कि उनका चलना कठिन है। शहर-दर-शहर उन पर हो रहे हमले और शैतानी हरकतें बताती हैं कि हमारा अपनी जड़ों से नाता टूट गया है। अपने को साबित करने के लिए निकली औरत के खिलाफ शैतानी ताकतें लगी हैं। वे उन्हें फिर उन्हीं कठघरों में बंद कर देना चाहती हैं, जिन्हें वर्षों बाद तोड़कर वे निकली हैं।
एक लोकतंत्र में होते हुए स्त्रियों के खिलाफ हो रहे जधन्य अपराधों की खबरें हमें शर्मिन्दा करती हैं। ये बताती हैं कि अभी हमें सभ्य होना सीखना है। घरों की चाहरदीवारी से बाहर निकली औरत सुरक्षित घर आ जाए ऐसा समाज हम कब बना पाएंगें? जाहिर तौर पर इसका विकास और उन्नति से कोई लेना-देना नहीं है। इस विषय पर घटिया राजनीति हो रही है पर यह राजनीति का विषय भी नहीं है। पुलिस और कानून का भी नहीं। यह विषय तो समाज का है। समाज के मन में चल रही व्यथा का है। हमने ऐसा समाज क्यों बनने दिया जिसमें कोई स्त्री, कोई बच्चा, कोई बच्ची सुरक्षित नहीं है? क्यों हमारे घरों से लेकर शहरों और गांवों तक उनकी व्यथा एक है? वे आज हमसे पूछ रही हैं कि आखिर वे कहां जाएं। स्त्री होना दुख है। यह समय इसे सच साबित कर रहा है। जबकि इस दौर में स्त्री ने अपनी सार्मथ्य के झंडे गाड़े हैं। अपनी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता से स्वयं को इस कठिन समय में स्थापित किया है। एक तरफ ये शक्तिमान स्त्रियों का समय है तो दूसरी ओर ये शोषित-पीडि़त स्त्रियों का भी समय है। इसमें औरत के खिलाफ हो रहे अपराध निरंतर और वीभत्स होते जा रहे हैं। इसमें समाज की भूमिका प्रतिरोध की है। वह कर भी रहा है, किंतु इसका असर गायब दिखता है। कानून हार मान चुके हैं और पुलिस का भय किसी को नहीं हैं। अपराधी अपनी कर रहे हैं और उन्हें नियंत्रित करने वाले हाथ खुद को अक्षम पा रहे हैं। कड़े कानून आखिर क्या कर सकते हैं, यह भी इससे पता चलता है। अपराधी बेखौफ हैं और अनियंत्रित भी। स्त्रियों के खिलाफ ये अपराध क्या अचानक बढ़े हैं या मीडिया कवरेज इन्हें कुछ ज्यादा मिल रहा है। इसमें मुलायम सिंह यादव की जनसंख्या जैसी चिंताओं को भी जोड़ लीजिए तो भी हमारा पूरा समाज कठघरे में खड़ा है।
स्त्री को गुलाम और दास समझने की मानसिकता भी इसमें जुडी है। पुरूष, स्त्री को जीतना चाहता है। वह इसे अपने पक्ष में एक ट्राफी की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। यह मानसिकता कहां से आती है? हमारे घर-परिवार, नाते-रिश्ते भी सुरक्षित नहीं रहे। छोटे बच्चों और शिशुओं के खिलाफ हो रहे अपराध और उनके खिलाफ होती हिंसा हमें यही बताती है। इसकी जड़ें हमें अपने परिवारों में तलाशनी होंगी। अपने परिवारों से ही इसकी शुरूआत करनी होगी, जहां स्त्री को आदर देने का वातावरण बनाना होगा। परिवारों में ही बच्चों में शुरू से ऐसे संस्कार भरने होंगे जहां स्त्री की तरफ देखने का नजरिया बदलना होगा। बेटे-बेटी में भेद करती कहानियां आज भी हमारे समाज में गूंजती हैं। ये बातें साबित करती हैं और स्थापित करती हैं कि बेटा कुछ खास है। इससे एक नकारात्मक भावना का विकास होता है। इस सोच से समूचा भारतीय समाज ग्रस्त है ऐसा नहीं है, किंतु कुछ उदाहरण भी वातावरण बिगाडऩे का काम करते हैं। आज की औरत का सपना आगे बढऩे और अपने सपनों को सच करने का है। वह पुरूष सत्ता को चुनौती देती हुयी दिखती है। किंतु सही मायने में वह पूरक बन रही है। समाज को अपना योगदान दे रही है। किंतु उसके इस योगदान ने उसे निशाने पर ले लिया है। उसकी शुचिता के अपहरण के प्रयास चौतरफा दिखते हैं। फिल्म, टीवी, विज्ञापन और मीडिया माध्यमों से जो स्त्री प्रक्षेपित की जा रही है, वह यह नहीं है। उसे बाजार लुभा रहा है। बाजार चाहता है कि औरत उसे चलाने वाली शक्ति बने, उसे गति देने वाली ताकत बने। इसलिए बाजार ने एक नई औरत बाजार में उतार दी है। जिसे देखकर समाज भौचक है। इस औरत ने फिल्मों, विज्ञापनों, मीडिया में जो और जैसी जगह घेरी है उसने समूचे भारतीय समाज को, उसकी बनी-बनाई सोच को हिलाकर रख दिया है। बावजूद इसके हमें रास्ता निकालना होगा।
औरत को गरिमा और मान देने के लिए मानसिकता में परिवर्तन करने की जरूरत है। हमारी शिक्षा में, हमारे जीवन में, हमारी वाणी में, हमारे गान में स्त्री का सौंदर्य, उसकी ताकत मुखर हो। हमें उसे अश्लीलता तक ले जाने की जरूरत कहां है। भारत जैसे देश में नारी अपनी शक्ति, सौंदर्य और श्रद्धा से एक विशेष स्थान रखती है। हमारी संस्कृति में सभी प्रमुख विधाओं की अधिष्ठाता देवियां ही हैं। लक्ष्मी- धन की देवी, सरस्वती विद्या की, अन्नपूर्णा: खाद्यान्न की, दुर्गा- शक्ति यानि रक्षा की। यह पौराणिक कथाएं भी हैं तो भी हमें सिखाती हैं। बताती हैं कि हमें देवियों के साथ क्या व्यवहार करना है। देवियों को पूजता समाज, उनके मंदिरों में श्रद्धा से झूमता समाज, त्यौहारों पर कन्याओं का पूजन करता समाज, इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। पौराणिक पाठ हमें कुछ और बताते हैं, आधुनिकता का प्रवाह हमें कुछ और बताता है। हालात यहां तक बिगड़ गए हैं हम खून के रिश्तों को भी भूल रहे हैं। कोई भी समाज आधुनिकता के साथ अग्रणी होता है किंतु विकृतियों के साथ नहीं। हमें आधुनिकता को स्वीकारते हुए विकृतियों का त्याग करना होगा। ये विकृतियां मानसिक भी हैं और वैचारिक भी। हमें एक ऐसे समाज की रचना की ओर बढऩा होगा,जहां हर बच्चा सहअस्तित्व की भावना के साथ विकसित हो। उसे अपने साथ वाले के प्रति संवेदना हो, उसके प्रति सम्मान हो और रिश्तों की गहरी समझ हो। सतत संवाद, अभ्यास और शिक्षण संस्थाओं में काम करने वाले लोगों की यह विशेष जिम्मेदारी है। समस्या यह है कि शिक्षक तो हार ही रहे हैं, माता-पिता भी संततियों के आगे समर्पण कर चुके हैं। वे सब मिलकर या तो सिखा नहीं पा रहे हैं या वह ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है। जब उसका शिक्षक ही कक्षा में उपस्थित छात्र तक नहीं पहुंच पा रहा है तो संकट और गहरा हो जाता है। हमारे आसपास के संकट यही बताते हैं कि शिक्षा और परिवार दोनों ने इस समय में अपनी उपादेयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्त्रियों के खिलाफ इतना निरंतर और व्यापक होता अपराध, उनका घटता सम्मान हमें कई तरह से प्रश्नांकित कर रहा है। यहां बात प्रदेश, जिले और गांव की नहीं है, यही आज भारत का चेहरा है। कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश से एक जैसी सूचनाएं व्यथित करती हैं। राजनेताओं के बोल दंश दे रहे हैं और हम भारतवासी सिर झुकाए सब सुनने और झेलने के लिए विवश हैं। अपने समाज और अपने लोगों पर कभी स्त्री को भरोसा था, वह भरोसा दरका नहीं है, टूट चुका है। किंतु वह कहां जाए किससे कहे। इस मीडिया समय में वह एक खबर से ज्यादा कहां है। एक खबर के बाद दूसरी खबर और उसके बाद तीसरी। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा, कहना कठिन है। किंतु एक जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता, जो हमेशा अंतहीन और प्राय: निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री की सुरक्षा के सवाल पर भी हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरूआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

Friday, April 25, 2014

“Teddy”

Ek ladki apne Lover se gift mein RING lena chahti thi

Magar ladke ne us ko “Teddy” gift diya

Jis par ladki ne bahut gussa kiya

Aur usne wo “Teddy” utha k Road pe phenk diya

Ladka woh “Teddy” uthane k liye Road ki taraf bhaga

Magar uska car se acident ho gaya

Aur woh wahi mar gya

Ladki dekh kar chillayi aur…

usne wo “Teddy” utha k apne seene se lagaya

Aur phir zor se rone lagi

Tabhi Teddy mein se awaaz aayi

“I Have ring in my pocket”

“WILL U MARRY ME?”

Moral -

“Trust in Your Love..”

Don’t make any demand in Love & always respect you love. :))

जागो ग्राहक जागो

अरेंज मैरेज- 4 लाख रुपए की जूलरी 50 हजार रुपए की शादी की रस्में 6 लाख रुपए की शादी कुल खर्चा: 10 लाख 50 हजार रुपए लव मैरेज- 100 रुपए का स्टैम्प पेपर 20 रुपए की नोटरी 50 रुपए की वरमाला 20 रुपए की फोटो कुल खर्चा: 190 रुपए पैसा आपका, पसंद आपकी, फैसला आपका! जागो ग्राहक जागो, लवर के साथ भागो!

टीवी चैनल

अगर कुत्तों का टीवी चैनल होता तो सोचिए उसमें सीरियल्स के नाम कैसे होते?

अगर कुत्तों का टीवी चैनल होता तो सोचिए उसमें सीरियल्स के नाम कैसे होते?
  • मैं कुतिया तेरे आंगन की
  • यहां मैं घर-घर भौंकी
  • काट खाना साथिया
  • अगले जनम मोहे पिल्ला ही कीजो
  • ये कुत्ता क्या कहलाता है
  • एक हजारों में मेरी कुतिया है
  • अफसर कुतिया
  • D.O.G
  • इस कुकुर को क्या नाम दूं
  • बड़े कुत्ते लगते हैं
  • कुत्ता और कुतिया हम
  • डांस कुकुरिया डांस
  • पवित्र पिलिया
  • कुतिया वधु
  • भौंक के आजा
  • कुत्ता वही, कुतिया नई

मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है...

मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है...




मुझे नहीं चाहिए
प्यार भरी बातें
चाँद की चाँदनी
चाँद से तोड़कर
लाए हुए सितारे।
 
मुझे नहीं चाहिए
रत्नजडि़त उपहार
मनुहार कर लाया
हीरों का हार
शरीर का श्रृंगार।
 
मुझे चाहिए
बस अपना वजूद
जहाँ किसी दहेज, बलात्कार
भ्रूण हत्या का भय
नहीं सताए मुझे।
 
मैं उन्मुक्त उड़ान
भर सकूँ अपने सपनों की
और कह सकूँ
मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है।