Saturday, December 28, 2013

तालीम अधूरी है अभी

तालीम अधूरी है अभी


दफ़्न करना मुझे मदरसे की फुलवारी में
मेरी तालीम अधूरी है अभी

भीड़ इतनी है कि लड़ता है बदन से बदन
दिलों के बीच में दूरी है अभी


तुझे मालूम है रास्ता   पर इन  अंधेरों में
एक चराग़ ज़रूरी है अभी

तुम  कहते हो कि रह जाओ कुछ दिन और
रब से  मिलनी मंज़ूरी है अभी

मैंने ज़िंदगी समझा

मैंने ज़िंदगी समझा

उम्र भर बेवफ़ाई करता रहा
जिसको मैंने ज़िंदगी समझा

घर मेरा जल रहा था उसने
तमाशा ऐ आतिशी समझा

रोने को मुंह ढका था मैंने
वो इज़हारे खुशी समझा

साग़र पे बरसना फ़िज़ूल है

ये बादल क्यूँ नहीं समझा

उसे मानते थे अहले समझ
सच में जो कुछ नहीं समझा

ज़रा ठहर तू यहीं

ज़रा ठहर तू यहीं



ऐ जवान उम्र ज़रा ठहर तू यहीं
अभी आता हूँ बुढापे से मिलकर

मेरे जाने से रौनक भी चली जायेगी 
मरने वालों  में मुझे न शामिल कर 


लोग करते रहे समंदर की तलाश
हो गया राख  शहर जल जल कर

नहीं होता है ख़त्म जुर्म सज़ा देने से 

आओ लड़ें गुनाह से सभी मिल कर

तू भी गले मिले

तू भी गले मिले


इस तरह से बिखरे मुहब्बत के सिलसिले
ले जाए  हवा जैसे  परिंदों के घोंसले

हो किस तरह तय ये कि गुनहगार कौन था
कुछ मेरी उलझनें थी कुछ तेरे फैसले

खुशियाँ तलाशने को निकले थे घर से हम 

क़िस्मत  में जो लिखे थे वो सारे  ग़म मिले

मैय्यत से गले मिल के रोये  थे बहुत लोग 
हम चाहते ही रह गए तू भी गले मिले

Saturday, November 2, 2013

एक लड़का

एक लड़का था मेरे कॉलेज में ,
वो शायद मुझपे मरता था …
मुझसे बस एक बार बातें करने को
बड़े बहाने करता था ...

मेरे नाम कि कसमें खाता था
मेरे घर के चक्कर लगाता था
मेरे आसपास होने से , उसके चेहरे का रंग बदल जाता था
मेरा ज़िक्र होने पर वो , चौकन्ना सा हो जाता था ...

कितने ही ख़त उसने लिखे थे मुझको
जिनको मैंने उसके सामने , बड़ी अदा से फाड़ा था
उससे बेहतर कई हैं , मेरी मोहब्बत में
कितनी बार उसको ये जताया था …

उसके सामने जाने मैं इतनी बेरहम क्यों बन जाती थी
उसको दर्द पहुंचाकर खुद बड़ा मुस्कुराती थी
उस दिन हमने उसका बड़ा मज़ाक उड़ाया था ,
रो दिया था उसने जब मैंने अपनी शादी का कार्ड भिजवाया था …

आज उन बातों को दस साल बीत चुके हैं
अल्हड़पन कि बातों को गम्भीर मुद्दे घेर चुके हैं ,
पर वो लड़का जाने क्यों मुझे , अब भी याद आ जाता है
उसके याद आते ही कुछ , मेरे अंतर मन से खो जाता है …

उसके बेपनाह इश्क़ ने ही तो मुझे गुरूर दिलवाया था
एक मामूली सी शक्ल को उसने , हसीन महसूस करवाया था
उसके बाद किसी को मुझमे कुछ ख़ास नज़र नहीं आया
ना मैं किसी का चाँद , ना किसी का नूर ,
इन सब अल्फ़ाज़ों से तो बस उसी ने मुझे सजाया था ...

वो मेरा बचपना था , या ये मेरी खुदगर्ज़ी है
क्यों उसे ही चाहती हूँ अब , जिससे मुझे पहले इनक़ार था
ये भी मुमकिन है कि वो मुझको भूल गया हो लेकिन ,
मेरे ज़हन से वो जाता नहीं .......

ये वो ही मेरा पहला प्यार था..

बूढ़ा पेड़.

करीब एक साल पहले..
वो बूढ़ा पेड़..
अक्सर खटखटाता था...
सामने वाली खिड़की...
बहुत पुराना राब्ता था...
उस घर से...
एक बुढ़िया थी जो रोज़ उसकी कमर में...
बाँध देती थी कुछ दुआएँ...
रोली से इक रिश्ते का निशान छोड़ के जाती थी...
बहुत दिन जब बुढ़िया नहीं आई...
तब शाख बढ़ा कर खिड़की खटखटाने लगा...
बुढ़िया बीमार थी...
जब जब वो खाँसती...
पेड़ तस्दीक़ करता, कहीं दुआओं का कमरबन्द...
कमज़ोर तो नहीं पड़ रहा...
एक साल हुआ वो बुढ़िया नहीं रही...
अब पेड़ पर भी नयी कोपलें नहीं आती थी...
आज काटा जा रहा है...
तो एक भी आँसू नहीं निकला...
क्यूंकी उस खिड़की से झाँककर देखा था उसने...
नयी पीढ़ी है...
इसे बूढ़े रिश्ते नहीं...
बस स्पेस चाहिए...

Wednesday, September 11, 2013

Wednesday, May 1, 2013

प्यार

जब एक छोटी लड़की अपने पापा को बाहर से आया देखकर उनके लिए भागकर एक गिलास पानी का लाये| यह प्यार हैं
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जब सुबह पत्नी, पति के लिए चाय बनाती हैं और उस चाय को पति को देने के पहले पहला घूंट पीती हैं| यह प्यार हैं
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जब एक माँ अपने बेटे को सबसे बढ़िया मिठाई का टुकड़ा सबसे छुपा कर देती हैं| यह प्यार हैं
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जब आपका दोस्त फिसलन भरी सड़क पर आपका हाथ बहुत मजबूती से पकड़ लेता हैं ताकि आप गिर ना सके| यह प्यार हैं
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जब आपका भाई आपको मैसेज करके बोले घर टाइम पर आ जाना देर होने परमुझे तुम्हारी फ़िक्र होती हैं| ये प्यार है ।
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प्यार सिर्फ वह नहीं की लड़का और लड़की एक दुसरे की बांहों में बाँहे डाले सारे शहर का चक्कर लगाए, और अश्लीलता फैलाये

दरअसल सच्चा प्यार वह हैं जिसमे एक दूसरे का ख्याल रखा जाए ।।।।।।

Saturday, April 13, 2013

मेरे देश की बेटिया

ये हैं मेरे देश की बेटिया, हमें गर्व हैं हमारी बेटियों पर ....

क्या आपको भी अपने देश की इन बेटियों पर गर्व हैं?

अगर आपको गर्व हैं अपने देश की इन बेटियों पर तो इनके सम्मान में आप कुछ जरुर लिखे ताकि हमारे देश की बेटिया इनके जैसी बने और अपने परिवार, अपने देश सबका नाम रोशन करे वो समझ सके की असली इज्जत और सम्मान कहाँ हैं, आपके कमेन्ट करने से उनको प्रेरणा मिलेगी आगे बढ़ने के लिए, वे फ़िल्मी हिरोइन बनने की अपेक्षा असल जिन्दगी में असल की नायिका बनेगी।

माँ

ईश्वर सभी जगहों पर एक साथ मौजूद नही रह सकता इसलिए ईश्वर ने हमे माँ दिया ...

मित्रो, दिल को द्रवित कर देने वाली ये तश्वीर चीन की है .. एक माँ जो 97 साल की है वो अपने 62 साल के पैरालाइज बेटे की सेवा दिन रात करती है ..
इस माँ का बेटा न खड़ा हो सकता है, न बोल सकता है, न सुन सकता है .. माँ 97 साल की उम्र में भी अपने बेटे के लिए हर वक्त उपलब्ध रहती है .. शायद ईश्वर इस माँ की सेवा देखकर ही इस माँ को शक्ति दे रहा है ..

हे माँ तुझे चरणस्पर्श ..

क्या होता है मरने के बाद

सामान्य व्यक्ति जैसे ही शरीर छोड़ता है, सर्वप्रथम तो उसकी आंखों के सामने गहरा अंधेरा छा जाता है, जहां उसे कुछ भी अनुभव नहीं होता। कुछ समय तक कुछ आवाजें सुनाई देती है कुछ दृश्य दिखाई देते हैं जैसा कि स्वप्न में होता है और फिर धीरे-धीरे वह गहरी सुषुप्ति में खो जाता है, जैसे कोई कोमा में चला जाता है।

गहरी सुषुप्ति में कुछ लोग अनंतकाल के लिए खो जाते हैं, तो कुछ इस अवस्था में ही किसी दूसरे गर्भ में जन्म ले लेते हैं। प्रकृ‍ति उन्हें उनके भाव, विचार और जागरण की अवस्था अनुसार गर्भ उपलब्ध करा देती है। जिसकी जैसी योग्यता वैसा गर्भ या जिसकी जैसी गति वैसी सुगति या दुर्गति। गति का संबंध मति से होता है। सुमति तो सुगति।

लेकिन यदि व्यक्ति स्मृतिवान (चाहे अच्छा हो या बुरा) है तो सु‍षुप्ति में जागकर चीजों को समझने का प्रयास करता है। फिर भी वह जाग्रत और स्वप्न अवस्था में भेद नहीं कर पाता है। वह कुछ-कुछ जागा हुआ और कुछ-कुछ सोया हुआ सा रहता है, लेकिन उसे उसके मरने की खबर रहती है। ऐसा व्यक्ति तब तक जन्म नहीं ले सकता जब तक की उसकी इस जन्म की स्मृतियों का नाश नहीं हो जाता। कुछ अपवाद स्वरूप जन्म ले लेते हैं जिन्हें पूर्व जन्म का ज्ञान हो जाता है।

लेकिन जो व्यक्ति बहुत ही ज्यादा स्मृतिवान, जाग्रत या ध्यानी है उसके लिए दूसरा जन्म लेने में कठिनाइयां खड़ी हो जाता है, क्योंकि प्राकृतिक प्रोसेस अनुसार दूसरे जन्म के लिए बेहोश और स्मृतिहीन रहना जरूरी है।

इनमें से कुछ लोग जो सिर्फ स्मृतिवान हैं वे भूत, प्रेत या पितर योनी में रहते हैं और जो जाग्रत हैं वे कुछ काल तक अच्छे गर्भ की तलाश का इंतजार करते हैं। लेकिन जो सिर्फ ध्यानी है या जिन्होंने गहरा ध्यान किया है वे अपनी इच्छा अनुसार कहीं भी और कभी भी जन्म लेने के लिए स्वतंत्र हैं। यह प्राथमिक तौर पर किए गए तीन तरह के विभाजन है। विभाजन और भी होते हैं जिनका वेदों में उल्लेख मिलता है।

जब हम गति की बात करते हैं तो तीन तरह की गति होती है। सामान्य गति, सद्गगति और दुर्गति। तामसिक प्रवृत्ति व कर्म से दुर्गति ही प्राप्त होती है, अर्थात इसकी कोई ग्यारंटी नहीं है कि व्यक्ति कब, कहां और कैसी योनी में जन्म ले। यह चेतना में डिमोशन जैसा है, लेकिन कभी-कभी व्यक्ति की किस्मत भी काम कर जाती है।

नारी रूप

कभी मेरा अपमान करते हो
कभी मेरी गर्भ में हत्या ..
कभी मुझे दहेज़ के लिए जला देते हो
तो कभी सरे आम मेरी इज्ज़त नीलाम करते हो..
कभी मेरे नाम कि गालियाँ देते हो
कभी सरे बाज़ार मेरी बोली लगाते हो ..
नवरात्रियों का व्रत करने वालों ये मत भूलना कि मैं उसी देवी का अंश हूँ
जिसके चरणों में गिरकर तुम अपने सुखी जीवन की भीख मांगते हो ..
मेरी इज्ज़त किये बगैर कोई भी मनुष्य समाज न सभ्य बन सकता है न सुखी .........
होश में आओ ....मेरा सम्मान करना सीखो...
कंही ऐसा न हो कि तुम्हारे कुकृत्यों से धरती नारी विहीन हो जाये
और नारी रूप तुम्हे सिर्फ मंदिरों में ही नज़र आये !!



Thursday, April 11, 2013

अमलताश के झूमर












कब से धरा कर रही तलाश
कब छाओगे तुम पलाश?
कब अपने मखमली लवों से
तुम मेरा श्रृंगार करोगे?
कब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी मेरी माँग भरोगे?

बोला पलाश, मत हो उदास
मैं यहीं हूँ तेरे आस-पास
बस चलने दे फागुनी बयार और
सज जाने दे अमलताश
तब अपने मखमली लवों से
मैं तेरा श्रृंगार करूँगा
तब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी तेरी माँग भरूँगा।

फिर मौसम ने ली अंगड़ाई
फागुनी हवा इठलाती आई
झूम उठा तब सुर्ख पलाश और
झर-झर बरसा अमलताश।

नभ भी मुस्काया हर्षाया,
कुछ और धरा के पास आया
शरमाई धरा, मुस्काई धरा
नभ को छूने बढ़ आई धरा

दूर क्षितिज पर जैसे ही
सूरज ने पर्वत को छुआ
सुरमई शाम के आँचल में
नभ और धरा का मिलन हुआ।

पतझड़ के पत्ते झूम-झूम
तब चूम धरा को उड़ने लगे
मखमली पलाश के गेसू फिर
माँग धरा की भरने लगे।

साँझ हुई तब सिंदूरी थी
माँग धरा की सिंदूरी
सिंदूरी सूरज - पर्वत
नभ भी हो आया सिंदूरी।

पर सूना था सिंदूरी पलाश और
सिसक रहा था अमलताश
पतझड़ के काँधे सर रख कर
स्थिर पलाश
करके अपना सर्वस्व वार
निःशब्द खड़ा बस रहा निहार।

इस मिलन - विदा की बेला में
सूरज, पर्वत, पतझड़, फागुन
नव वधू धरा, हर्षित आकाश
कहते थे सब मिल बार-बार
तुम धन्य पलाश, धन्य अमलताश
बोला पलाश अलविदा धरा
अलविदा धरा, अलविदा आकाश।

पीपल









यदि कोई व्यक्ति पैसों की तंगी का सामना करना रहा है तो उसे प्रति मंगलवार और शनिवार यह उपाय अपनाना चाहिए। निश्चित ही व्यक्ति की सभी समस्याएं धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं और व्यक्ति मालामाल हो सकता है। उपाय इस प्रकार है- सप्ताह के प्रति मंगलवार और शनिवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठें। इसके बाद नित्य कर्मों से निवृत्त होकर किसी पीपल के पेड़ से 11 पत्ते तोड़ लें। ध्यान रखें पत्ते पूरे होने चाहिए, कहीं से टूटे या खंडित नहीं होने चाहिए। इन 11 पत्तों पर स्वच्छ जल में कुमकुम या अष्टगंध या चंदन मिलाकर इससे श्रीराम का नाम लिखें। नाम लिखते से हनुमान चालिसा का पाठ करें। इसके बाद श्रीराम नाम लिखे हुए इन पत्तों की एक माला बनाएं। इस माला को किसी भी हनुमानजी के मंदिर जाकर वहां बजरंगबली को अर्पित करें। इस प्रकार यह उपाय करते रहें। कुछ समय में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे।

ध्यान रखें उपाय करने वाला भक्त किसी भी प्रकार के अधार्मिक कार्य न करें। अन्यथा इस उपाय का प्रभाव निष्क्रीय हो जाएगा। उचित लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा। साथ ही अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहें।

पक्षी और बादल

पक्षी और बादल,
ये भगवान् के डाकिये हैं,
जो एक महादेश से-
दूसरे महादेश को जाते हैं।
हम तो समझ नहीं पाते,
पर उनकी लायी चिट्ठियाँ
पेड़, पौधे, पानी और पहाड़
बांचते हैं।
हम तो केवल यह आंकते हैं
कि एक देश की धरती
दूसरे देश को सुगंध भेजती है.
और वह सौरभ हवा में तैरते हए
पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।
और एक देश का भाप
दूसरे देश में
पानी बनकर गिरता है।

वसंत के श्रृंगार - पलाश







वसंत के श्रृंगार - सेमल