Meri mohabbat ki saza bemisaal di usne, udaas rehne ki aadat daal di usne, maine jab bhi apna bnaana chaha usko, baato-baato me baat hi taal di usne
Friday, April 25, 2014
जागो ग्राहक जागो
अरेंज मैरेज-
4 लाख रुपए की जूलरी
50 हजार रुपए की शादी की रस्में
6 लाख रुपए की शादी
कुल खर्चा: 10 लाख 50 हजार रुपए
लव मैरेज-
100 रुपए का स्टैम्प पेपर
20 रुपए की नोटरी
50 रुपए की वरमाला
20 रुपए की फोटो
कुल खर्चा: 190 रुपए
पैसा आपका,
पसंद आपकी,
फैसला आपका!
जागो ग्राहक जागो,
लवर के साथ भागो!
टीवी चैनल
अगर कुत्तों का टीवी चैनल होता तो सोचिए उसमें सीरियल्स के नाम कैसे होते?
अगर कुत्तों का टीवी चैनल होता तो सोचिए उसमें सीरियल्स के नाम कैसे होते?
- मैं कुतिया तेरे आंगन की
- यहां मैं घर-घर भौंकी
- काट खाना साथिया
- अगले जनम मोहे पिल्ला ही कीजो
- ये कुत्ता क्या कहलाता है
- एक हजारों में मेरी कुतिया है
- अफसर कुतिया
- D.O.G
- इस कुकुर को क्या नाम दूं
- बड़े कुत्ते लगते हैं
- कुत्ता और कुतिया हम
- डांस कुकुरिया डांस
- पवित्र पिलिया
- कुतिया वधु
- भौंक के आजा
- कुत्ता वही, कुतिया नई
मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है...
मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है...
मुझे नहीं चाहिए
प्यार भरी बातें
चाँद की चाँदनी
चाँद से तोड़कर
लाए हुए सितारे।
प्यार भरी बातें
चाँद की चाँदनी
चाँद से तोड़कर
लाए हुए सितारे।
मुझे नहीं चाहिए
रत्नजडि़त उपहार
मनुहार कर लाया
हीरों का हार
शरीर का श्रृंगार।
रत्नजडि़त उपहार
मनुहार कर लाया
हीरों का हार
शरीर का श्रृंगार।
मुझे चाहिए
बस अपना वजूद
जहाँ किसी दहेज, बलात्कार
भ्रूण हत्या का भय
नहीं सताए मुझे।
बस अपना वजूद
जहाँ किसी दहेज, बलात्कार
भ्रूण हत्या का भय
नहीं सताए मुझे।
मैं उन्मुक्त उड़ान
भर सकूँ अपने सपनों की
और कह सकूँ
भर सकूँ अपने सपनों की
और कह सकूँ
मेरा भी स्वतंत्र अस्तित्व है।
'नारीलता' फूल
अजूबा : जहाँ वृक्ष पर खिलते हैं नारी आकृति वाले 'नारीलता' फूल
प्रकृति के कई रंग हैं। कई बार प्रकृति कुछ ऐसे अजूबे भी उत्पन्न करती है
कि उन पर विश्वास करना मुश्किल होता है, ठीक वैसे ही जैसे परियों की
कहानियाँ। इसी प्रकार बचपन में हम अक्सर सुना करते थे कि गूलर का फूल होता
है, पर वह रात्रि को खिलता है और उसे कोई देख नहीं सकता। इसी तर्ज पर ’गूलर
का फूल’ होना जैसी एक कहावत भी है। जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब
हमारा कोई परिचित एक लंबे समय बाद आँखों से ओझल रहने पर अचानक प्रकट होता
है। ऐसी न जाने कितनी किंवदंतियाँ और बातें हैं, जिनके बारे में शत-प्रतिशत
दावा करना मुश्किल होता है, पर यही तो हमारी उत्सुकता व रोचकता को बढ़ाते
हैं। अक्सर अपने आस-पास हम पेड़-पौधों को तमाम देवी-देवताओं या जीवों की
आकृति रूप में देखते हैं। हममें से कितनों ने कस्तूरी मृग देखे हैं, पर
कस्तूरी खुशबू के बारे में अक्सर सुनते रहते हैं।
प्रकृति
का एक ऐसा ही अजूबा है- ’नारीलता फूल’। नारी की सुदरता का बखान करने के लिए
कई बार उसकी तुलना फूलों से की जाती है, पर यहाँ तो बकायदा नारी-आकृति फूल
के रूप में पल्लवित-पुष्पित होती है। कहा जाता है कि यह एक दुर्लभ फूल है
जो 20 साल के अंतराल पर खिलता है। यह भारत के हिमालय और श्रीलंका तथा
थाईलैंड में पाए जाने वाले एक पेड़ में खिलता है। हिमालय में इसे इसके आकार
के कारण नारीलता फूल कहा जाता है। जब यह फूल खिलता है तो पूरे पेड़ पर
चारों तरफ नारी-आकृति वाले यह फूल लटके रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो
किसी ने उन पेड़ों पर ढेर सारी गुडि़या लटका दी हों। वाकई नारी-आकृति वाला
यह फूल दुर्लभ एवं प्रकृति की अनमोल कलाकारी है।
यही कारण
है कि नारीलता फूल सदैव चर्चा में रहा है। यू-ट्यूब, फेसबुक और गूगल तक पर
लोग इसके बारे में चर्चा कर रहे हैं और इसे खोज रहे हैं। कुछेक लोगों का तो
ये भी मानना है कि यह किसी इंसान की हरकत है जिसने तमाम गुडि़यों को वृक्ष
पर लटका दिया है, तो कुछेक इसे डिजिटल टेक्नालाजी से जोड़-तोड़ की कला
बताते हैं। सच क्या है, यह किसी को नहीं पता। आखिर 20 साल का अंतराल कम
नहीं होता है। पर जो भी हो प्रकृति की अद्भुत कलाकारी के हमने कई रंग देखे
हैं और यह भी उसी में से एक हो तो आश्चर्य नहीं।
'मजदूर' की बेटी, पर 'मजबूर' नहीं,
'मजदूर' की बेटी, पर 'मजबूर' नहीं, 7 साल में हाईस्कूल, 13 साल में एमएससी
प्रतिभा उम्र की
मोहताज नहीं होती, वह अपना रास्ता खुद ही बना लेती है। तभी तो महज सात साल
की उम्र में हाईस्कूल पास कर रिकॉर्ड बनाने वाली वंडर गर्ल के नाम से
मशहूर लखनऊ की सुषमा वर्मा अब 13 साल की उम्र में लखनऊ विश्वविद्यालय में
मास्टर ऑफ साइंस (एमएससी) में दाखिला लेने के बाद एक बार फिर सुर्खियों में
हैं। सुषमा वही होनहार लडकी है जिसने सिर्फ़ 7 साल की उम्र में 10वीं और 9 साल की उम्र में 12वीं पास कर देश भर में सुर्ख़ियाँ बटोरी थी. सुषमा
ने कहा कि वह एम.बी.बी.एस. कोर्स ज्वाइन करना चाहती थी. लेकिन, 17 वर्ष की
उम्र प्राप्त करने से पहले वह ऐसा नहीं कर सकती. अतः वह लखनऊ
विश्वविद्यालय में एम.एस-सी. कोर्स ज्वाइन कर रही है.
एक लड़की
एक लड़की
न जाने कितनी बार
टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में
हर किसी को देखती
याचना की निगाहों से
एक बार तो हाँ कहकर देखो
कोई कोर कसर नहीं रखूँगी
तुम्हारी जिन्दगी संवारने में
पर सब बेकार.
कोई उसके रंग को निहारता
तो कोई लम्बाई मापता
कोई उसे चलकर दिखाने को कहता
कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता
पर कोई नहीं देखता
उसकी आँखों में
जहाँ प्यार है, अनुराग है
लज्जा है, विश्वास है।
न जाने कितनी बार
टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में
हर किसी को देखती
याचना की निगाहों से
एक बार तो हाँ कहकर देखो
कोई कोर कसर नहीं रखूँगी
तुम्हारी जिन्दगी संवारने में
पर सब बेकार.
कोई उसके रंग को निहारता
तो कोई लम्बाई मापता
कोई उसे चलकर दिखाने को कहता
कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता
पर कोई नहीं देखता
उसकी आँखों में
जहाँ प्यार है, अनुराग है
लज्जा है, विश्वास है।
21वीं सदी की बेटी
21वीं सदी की बेटी
जवानी की दहलीज पर
जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुकी बेटी को
माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य
ठीक वैसे ही
जैसे सिखाया था उनकी माँ ने
पर उन्हें क्या पता
ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है
जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते
अपने आँसुओं को
चुपचाप पीना नहीं जानती है
वह उतनी ही सचेत है
अपने अधिकारों को लेकर
जानती है
स्वयं अपनी राह बनाना
और उस पर चलने के
मानदण्ड निर्धारित करना।रावण अभी भी नहीं मरा है
रावण अभी भी नहीं मरा है
खामोश है ये शहर
सन्नाटा पसरा पड़ा है
आंतक की फैलती विषबेल
रावण अडिग सा खड़ा है।
जलता है हर साल
फिर आकर खड़ा है
डरते हैं अब राम भी
रावण आंतक पर अड़ा है।
फिर खड़ा हो करेगा अट्ठाहस
हर साल होता जाता बड़ा है
कब तक चलेगी यह लीला
रावण अभी भी नहीं मरा है।
महिलाओं से इतना डर क्यों
महिलाओं से इतना डर क्यों
महिलाओं से इतना डर क्यों लगने लगा है इस देश के सम्प्रभुओं को? फारुख
अब्दुल्ला साहब अपना दुःख बयां कर रहे हैं, कि महिलाओं से इतना डर लगने लगा
है कि उन्हें पीए बनाने से पहले भी सोचें ? जस्टिस गांगुली से जुड़ा सवाल
पूछे जाने पर जवाब देते हुए फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि अब लड़कियों से बात
करने में भी डर लगता है, और हालत ये हो गई है कि अब हम लोग महिला पीए भी
नहीं रखेंगे। क्या पता कब जेल जाना पड़ जाए। फारुख जी तो सिर्फ किसी के
बहाने बयान दे रहे हैं, पर शायद यही आवाज़ राजनेताओं से लेकर संत, पत्रकार,
जज, अधिकारी तक अपने मन में दबा कर बैठे हैं.…सवाल है कि आखिर क्यों ?
लड़कियाँ/महिलाएं खुलकर विरोध करने लगीं कि कैसे उनके साथ दुर्व्यवहार किया
गया, कैसे उनके सीनियर्स ने उनका फायदा उठाया तो कुछेक लोग जेल की सलाखों
के पीछे पहुँच गए और कुछ लोग कभी भी जेल जाने का इंतज़ार कर रहे हैं.…।
आखिर ये सम्प्रभु लोग यह क्यों नहीं सोचते कि महिलाओं का अपना भी स्वतंत्र
अस्तित्व है, सम्मान है, निजता है, आप उसके साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।
महिलाएं कोई गूंगी गुड़िया नहीं हैं, जिसे जहाँ चाहें फिट कर दें. उनमें भी
स्पंदन होता है, चीजों का विरोध होता है, उन्हें आप लम्बे समय तक दबा कर
नहीं रख सकते। आखिर, अपनी मानसिकता बदलने की बजाय यह कहना कि हम महिलाओं
के साथ काम नहीं कर सकते, उनसे डर लगता है .... कभी इसे महिलाओं के भी एंगल
से सोचिए ?? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किन विपरीत परिस्थितियों में
महिलाओं ने समाज और व्यवस्था में अपना स्थान बनाया है और आज यदि उसी महिला
से लोग डरने की बात कर रहे हैं तो यह महिलाओं से नहीं बल्कि खुद से डरना
है, क्योंकि शायद आपका अपने ऊपर नियंत्रण ही नहीं है.
आखिर, सम्प्रभु लोग यह क्यों सोचते हैं कि महिलाएं उनकी पीए बनें, बॉस
नहीं। कहीं न कहीं यह दोहरापन भी इन सबकी जड़ में है. यदि लोग यह सोचते
हैं कि महिलाओं के साथ रेप होता रहे, छेड़छाड़ होती रहे और आप कैंडल जलाकर
सदभावना और श्रद्धांजलि अर्पित करते रहेंगे तो इस ग़लतफ़हमी को निकाल डालिए।
महिलाओं की सौम्यता को उनकी कमजोरी नहीं समझिये, नहीं तो रणचंडी बनने में
कितनी देरी लगती है. फिर बड़ा से बड़ा अपने को भगवान समझने वाला संत और बड़े
से बड़े लोगों की तहलका मचाकर बखिया उघेड़ने वाले भी अर्श से फर्श पर आ जाते
हैं !!
एक सवाल
'निर्भया' के एक साल बाद, एक सवाल
चाहे उसे निर्भया कहिये या दामिनी या चाहे जो भी नाम रख लीजिए। या फिर
भंवरी देवी, प्रिदर्शिनी मट्टू या नैना साहनी। या ऐसे ही वो तमाम अनगिनत
नाम जो देश के कोने-कोने में रोज किसी न किसी रूप में यौनिक हिंसा या
विभत्सतता की शिकार होती हैं … यह एक लम्बी सूची हो सकती है। पर सवाल अभी
भी वहीँ है कि क्या आज समाज में नारी पूर्णतया सुरक्षित है ? क्या तमाम
राजनैतिक एवं प्रशासनिक व पुलिस सिस्टम के आश्वासनों, न्यायिक सक्रियता,
एनजीओ और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन, प्रिंट मीडिया के रँगे गए पूरे
पन्ने, न्यूज चैनल्स की ब्रेकिंग न्यूज एवम कैंडल मार्च जैसी कवायदें
भारत देश और यहाँ आने वाली अन्य देश कि महिलाओं को यह आश्वस्त कर सकते हैं
कि महिलाएँ अब इस देश में सुरक्षित हैं ? क्या वाकई 'मानसिकता' सिस्टम पर
हावी है या यह हमारा दोहरा चरित्र है कि हम कहते कुछ और हैं और करते कुछ और
हैं.… निर्भया की मौत के एक साल बाद भी यह सवाल अभी भी वहीँ खड़ा है। अभी
भी निर्भया और उन जैसी तमाम आत्माएँ हमसे यही सवाल पूछ रही हैं कि क्या
हम फिर से मानव योनि में जन्म लें या यूँ ही हमारी आत्मा भटकती रहे ?
उन्हें अभी भी इंतजार है उस दिन का जब कोई लड़की घर में, सड़क पर या खेतों
में यूँ ही रेप का शिकार नहीं होगी और कह सकेगी कि यह मेरा देश है, यहाँ
मेरे लोग हैं और मैं यहाँ पर पूर्णतया सुरक्षित हूँ .....!!
Wednesday, April 23, 2014
क्या है मेरे नाम का ??
देह मेरी , हल्दी तुम्हारे नाम की ।
हथेली मेरी , मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा , चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी , सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा , बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी , नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा , मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी , चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे , महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी , बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...
नम्रता से पूछती हूँ
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
हथेली मेरी , मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा , चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी , सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा , बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी , नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा , मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी , चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे , महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी , बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...
नम्रता से पूछती हूँ
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
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