Monday, January 28, 2013

अजब गाँव

अजब गाँव

यह अजब गाँव की गजब कहानी है. इस गाँव में सभी कुछ तो अच्छा है लेकिन वहाँ के बाशिंदों के नाम अजब गजब हैं. तीन-चार पीढ़ी पहले गाँव में एक बार बाढ़ आ गयी थी तब किसी ठग तांत्रिक ने यहाँ आकर खबर फैला दी थी कि "अगर गाँव के बच्चों के नाम सीधे सीधे अर्थपूर्ण रखे जायेंगे तो गाँव पूरी तरह पानी में डूब जाएगा, और कोई भी नहीं बच पायेगा." लोग अनपढ़ और सरल थे उसकी बातों से डर गए. तब से बच्चों के नामकरण उल्टे-पुल्टे व बेतुके किये जाने लगे जैसे झगडू, नकटू, नखरू, लटकू, पटकू, ढक्कन, पटकन, कूड़ा, चूड़ा, डोकिया, फोतिया आदि और लड़कियों में तिकड़ी, बिगड़ी, कीड़ी, लोकाती, सेड़ी, चूरी, बासी आदि नाम रखे जाने लगे.

वर्तमान पीढ़ी तक आते आते भी ये निरर्थक नाम रखने का क्रम नहीं टूटा है क्योंकि ये लोग अंधविश्वासी और भीरु संस्कारी होते आये हैं, अतः अपनी परम्परा नहीं तोडना चाहते. पर जब से शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है बच्चे स्कूल जाने लगे हैं और अपने बेढब नामों को लेकर परेशान रहते हैं, पर क्या करें? उनके नाम तो तब रख दिये जाते हैं जब वे खुद कुछ समझ ही नहीं पाते थे. अपने गंदे नामों पर कोफ़्त होती है साथ ही बताने में शर्म भी आती है.

शहर से मास्टर साहब आये तो यहाँ के नाम जान-सुन कर हैरान हो गए. उन्होंने गाँव के मुखिया बिगाड़ूसिंह को बुला कर इस पर चर्चा की कि ये भोंडे नाम ठीक नहीं है, इनको जमाने के हिसाब से बदला जाना चाहिए. पर मुखिया ने उनकी बात पर सहमति नहीं जताई. वह बोला, “ये तो हमारी पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा है, हम ग्राम देवता को नाराज नहीं कर सकते हैं.” मुखिया ने आगे यह भी कहा, “मास्टर जी, आप तो इन बच्चों को पढ़ाइए, नाम में क्या रखा है?”

मास्टरजी बहुत निराश हुए. आखिर सोचने लगे कि ’जालिम, निखतू, रोनी, झोटी, मतवा, ठेकवा कितने बेतुके नाम हैं, पर मर्जी गाँव वालों की.’ वे बड़ी कसक के साथ उन बच्चों को पढ़ाते रहे, साथ ही उनको नामों के महत्व को समझाते भी रहे.

ठेकवा जब जवान हो गया तो उसकी शादी हो गयी. आन गाँव से उसकी शिक्षित पत्नी आ गयी. उसे भी अपने पति का नाम बड़ा खराब लगता था. एक दिन उस नई नवेली ने शर्माते हुए ठेकवा से कहा, “अजी, आप अपना कोई अच्छा सा नाम बदलो, मुझे जब लोग ठेकवा की बीवी पुकारते हैं तो बहुत शरम आती है, पीहर में तो मेरी सहेलियां –भाभियाँ आपका नाम ठहाके लागाकर बोलती हैं, हंसती हैं.”

पत्नी की इस दारुण व्यथा को सुनकर ठेकवा द्रवित हो गया और बोला, “ठीक है मैं शहर की तरफ जाता हूँ और कोई अच्छा सा सार्थक नाम खोज कर आता हूँ.”

ठेकवा जब शहर की राह पर था तो रास्ते में उसे एक शवयात्रा में जाते हुए लोग मिले, उसने मृतक का नाम पूछा तो बताया गया “अमरसिंह.” वह सुनकर हँस पड़ा.

जब वह आगे बढ़ा तो एक औरत भीख मांग रही थी, ठेकवा ने उसका नाम पूछ लिया. उसने बताया “लक्ष्मी”, विरोधाभासी नाम सुनते हुए जब वह और आगे गया तो एक अंधे व्यक्ति से टकरा गया, उसका नाम पूछा तो उसने बताया कि उसका नाम नयनसुख है. ठेकवा वहीं से घर लौट पड़ा और घर आकर अपनी प्यारी पत्नी को नामों के बारे में समझाते हुए बोला,
“जो मर गए वो थे अमरसिंह, लक्ष्मी मांगे भीख,
नयनसुख को दीखे नाहीं, मैं ठेकवा ही ठीक.”
अजब गाँव की परम्परा आज भी जारी है.

Wednesday, January 16, 2013

शेर और चूड़ी

शेर और चूड़ी
एक जंगल में एक बूढ़ा शेर रहता था7 शेर इतना अधिक बूढ़ा हो चुका था कि उसमें शिकार करने की भी ताकत नहीं रही थी7 एक दिन बूढ़ा शेर जंगल में शिकार की तलाश में घूम रहा था, तो उसे कोई चमकती हुई चीज दिखाई दी7 शेर ने उसे उठाकर देखा तो यह एक सोने की चूड़ी थी7 शेर ने सोचा इसे किसी आदमी को दिखा कर लालच में फसाया जा सकता है7 इस से आदमी का स्वादिष्ट मीट भी खाने को मिल सकता है7 यह सोच कर शेर जंगल के बिच में नदी के किनारे रास्ते में एक पेड़ के नीचे बैठ कर किसी यात्री का इंतजार करने लगा7 कुछ ही देर में एक आदमी उस रास्ते से गुजर रहा था तो शेर ने आवाज दे कर कहा "अरे भाई यह सोने की चूड़ी लेलो " मेरी यह किसी कम की नहीं है, तुम्हारे कोई काम आ जाएगी7 राही ने लेने से इंकार कर दिया तो शेर ने कहा ठीक है अगर तुम नहीं लेना चाहते हो तो में किसी और को दे देता हूँ, यह कह कर शेर वहां से जाने लगा तो यात्री ने सोचा अगर शेर ने मुझे खाना ही होता तो वह मुझे वैसे ही मार  कर खा सकता था7 यात्री ने शेर से कहा में यह चूड़ी लेने को तयार हूँ7 शेर ख़ुशी से मुड़ा और चूड़ी जमीं पर रखते हुए बोला ठीक है ये ले जाओ7 यात्री लालच में पड़ कर चूड़ी लेने आगे बढ़ा7 जैसे ही यात्री ने चूड़ी उठाने को हाथ आगे बढाया शेर ने छलांग मार कर यात्री को दबोच लिया और मार कर खा गया7  इस तरह यात्री का अंत हो गया7 इस लिए कहते हैं कि लालच बुरी बला है7
दरख़्त रानी
पुराने ज़माने में किसी गाँव में एक बूढ़ा आदमी रहता था. उसकी शादी को 20 साल हो गए थे पर वह औलाद की दौलत से महरूम था. भगवान की कृपा से बूढ़े की औरत का पाँव भारी था. नई-नई चीज़ें खाने को उसका जी चाहता था. बूढ़ा भी अपनी बिसात के मुताबिक़ उसे खाने की चीज़ें ला कर देता था.
एक रोज़ बूढ़े की बीवी को खट्टे-मीठे बेर खाने की बहुत ख़्वाहिश हुई. गरमी के मौसम में बेर कहाँ मिलते हैं. फिर भी बूढ़ा बेरों की तलाश में जंगलों में भटकता रहा. एक दिन जंगलों में इधर-उधर बेर तलाश करते हुए वह एक तालाब के किनारे पहुँचा तो एक बेर की झाड़ी नजऱ आई. बूढ़े को बहुत खुशी हुई. वह अपने दोनों हाथों से बेर इक_े करने लगा.अभी झोली भर बेर ही तोड़े थे कि एक आदमख़ोर मगरमच्छ ने अपना बड़ा सा मुँह पानी से ऊपर निकाला और ज़ोर से साँस खींची. उसके साँस लेने से एक ज़ोरदार आँधी चली और बूढ़ा कमज़ोरी की वजह से अपने को न संभाल पाया और तालाब में आ गिरा. बूढ़ा अपने को संभालते हुए किनारे तक पहुँचना ही चाहता था कि मगरमच्छ ने इसके पाँव ही पकड़ लिए. बूढ़ा उससे कहने लगा,''भाई खट्टे-मीठे बेरों की तलाश में मेरे पाँव घिस गए और फिर जब बेर मिले तो मेरे रास्ते में तू रोड़ा बनता है.ÓÓ
''तेरी यह मक्कारी मुझपर कोई असर नहीं करेगी. बहुत दिनों से इंसान का गोश्त खाने को नहीं मिला. तेरी करारी ह़ड्डियों को चबाने में मुझे बहुत मज़ा आएगा. आज मैं तुझे खाऊँगा.ÓÓ मगरमच्छ ने लार टपकाते हुए कहा.
''क्यों. मुझे तू क्यों खाएगाÓÓ
''इसलिए क्योंकि तूने मुझसे बगैर इजाज़त लिए मेरे बेर लिए हैं.ÓÓ
''भाई मैं यह बेर बहुत मजबूरी में ले रहा हूँ. मेरी बीवी की हालत कुछ ऐसी है. मैं और मेरी बीवी अब और ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते.ÓÓ बूढ़े की बात सुनकर मगरमच्छ समझ गया.
''ओहÓÓ अगर यह बात है तो मैं तुझे नहीं खाऊँगा. तू अपनी राह ले लेकिन मेरी एक शर्त है. ''क्या शर्तÓÓ है. बूढ़े ने पूछा.
''अगर लड़का होगा तो तेरा और लड़की हुई तो मेरी.ÓÓ
''मंजूरÓÓ कहकर वह बेरों की झोली संभालते हुए चल दिया. वह अपने दिल में सोचने लगा कि मगरमच्छ उसे फिर कहाँ मिलेगा और अगर उसके यहाँ लड़का पैदा हुआ तो फिर तो परेशानी की कोई बात ही नहीं.
बूढ़ा अपनी बीवी की आव भगत में कोई कमी नहीं करता था. दिन पर लगा कर उड़ते रहे और एक दिन बूढ़े के घर एक खूबसूरत और बहुत तंदरूस्त लड़की पैदा हुई. बच्ची को देखकर उसे मगरमच्छ की बात याद आई तो वह काँप उठा. लड़की का रंग गुलाब के फूल की तरह था. उसकी आँखे हीरों की तरह चमकदार थीं. वह परियों की तरह हसीन और मासूम थी. ऐसी मन्नतों और मुरादों की लड़की मगरमच्छ के पेट में जाए यह सोचकर बूढ़ा दुख से काँपने लगा. उसने सोचा कि अब वह कभी तालाब के किनारे नहीं जाएगा.
बारिश का मौसम आया और नदी में बाढ़ आ गई. मगरमच्छ पानी में बह कर तालाब से निकल कर खेत में आ गया. अब उसे आसानी से शिकार मिलने लगा. एक दिन बूढ़ा खेत से सब्ज़ी तोड़कर ला रहा था तो रास्ते में मगरमच्छ ने उसे रोककर सवाल किया.
''क्यों बे बुडढ़े! मुझसे छुपता क्यों है? तू मुझसे छुप कर कहाँ भागेगा. सीधी तरह बता तेरे यहाँ लड़की हुई या लड़का.ÓÓ
''लड़की हुई है.ÓÓ बूढ़े ने सहमी हुई आवाज़ में कहा.
''तो फिर वह मेरी है. मेरी अमानत को अब तक तूने अपने पास क्यों रखा है. क्या तू अमानत में ख़्यानत करना चाहता है.ÓÓ
''इतनी छोटी बच्ची को तुझे कैसे दे दूँ?ÓÓ बूढ़े ने कहा.
''चौदह साल पहले तूने मुझसे वादा किया था. क्या वह अब भी बच्ची है. तू बाप की नजऱ से देखता है वह अगर बूढ़ी भी हो जाएगी तब भी वह बच्ची ही रहेगी. तू मुझे अब और बेवकूफ़ नहीं बना सकता. मैं तुझे चैन से रहने नहीं दूंगा. देख! अगर तूने लड़की को कल ही लाकर मुझे नहीं दिया तो मैं तुम तीनों को एक-एक कर ख़्तम कर दूँगा.ÓÓ मगरमच्छ ने कहा.
''वह मेरी बेटी है. अपना खून तुझे मैं कैसे दे दूँ? लोग क्या कहेंगे?ÓÓ बूढ़े ने सवाल किया.''लोग क्या कहेंगे वह मैं नहीं जानता. तू क्या कहता है? वादा ख़िलाफ़ी करना चाहता है?ÓÓ मगरमच्छ ने गुस्से से चिल्लाकर कहा.
''नहीं नहीं! यह बात नहीं है. मै चाहता हूँ कि मेरी बेटी को इस बात का पता न चले. और...ÓÓ बूढ़ा कहते-कहते रुक गया. ''तू क्या चाहता है बोल.ÓÓ मगरमच्छ ने कहा.''मेरी लड़की को कमल का फूल बहुत पसंद है. तू अपनी पीठ पर एक कमल का फूल रखकर तालाब के अंदर पानी के नीचे बैठे रहना. जब लड़की खुशी से इसे लेने जाएगी तो इसे तू ले जाना.ÓÓ मगरमच्छ को यह तरकीब पसंद आई.दूसरे दिन जब बूढ़े ने अपनी बीवी को बताया तो लड़की की माँ परेशान हो गई. वह अपने आपको कोस रही थी कि क्यों उसने बेर खाने की ख़्वाहिश की. आज उसकी बेटी मौत के मुँह में जा रही थी. भगवान उसे मौत क्यों नहीं देता. उसका दिल रो रहा था लेकिन वह लड़की से कह रही थी, ''बेटी! कितने दिन हुए नानी के घर तू नहीं गई. वह तुझे याद कर रही है. तू आज अपने बाप के साथ नानी के घर जाएगी. दो दिन रहकर वापस आ जाना.ÓÓ
ननिहाल जाने की बात सुनकर बेटी को खुशी हुई. उसके लिए मामू का घर जन्नत से कुछ कम नहीं था. वहाँ की हर चीज़ उसे पसंद थी. वहाँ का चाँद खूबसूरत था. वहाँ के फूल खूबसूरत और फल रसीले थे. नानी के घर जाने की ख़बर सुनकर वह खुशी से नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई थी. बूढ़ा उसे लेकर जंगल और नाले पार करता हुआ उस तालाब के किनारे पहुँचा और बेटी को तालाब के किनारे बैठा कर बोला, ''बेटी तू यहाँ बैठी रह. मैं अभी आया.ÓÓ बूढ़ा चला गया लेकिन वापस नहीं आया.
उधर बेटी को एक बेहद खूबसूरत कमल का फूल नजऱ आया. वह सोचने लगी कि इतना खूबसूरत कमल तालाब के बिल्कुल किनारे खिला है लेकिन उसे अभी तक किसी ने हाथ नहीं लगाया! हो सकता है किसी की नजऱ उस पर न पड़ी हो. बूढे की बेटी धीरे से पानी के अंदर गई. कमल के फूल की तरफ हाथ बढ़ाते ही कमल थोड़ा आगे खिसक गया. लड़की डर कर अपने बाप को पुकारने लगी.
घुटने पानी हुआ है बाबा कमल खिसकता जाता है
वह फिर आगे बढऩे लगी. कमल फिर से खिसक गया. लड़की चीख़ कर अपने बाप को पुकारने लगी.
छाती पानी हुआ है बाबा कमल खिसकता जाता है
बाप वहाँ होता तो जवाब देता. उसे डर लग रहा था वह सोच रही थी कि वापस चली जाए. उसी वक़्त बड़ी-बड़ी लाल आँखों वाला मगरमच्छ मुँह खोले पानी की सतह पर दिखाई दिया. बूढ़े की बेटी मगरमच्छ को सामने देखकर घबरा गई और चीखऩे लगी लेकिन उसकी चीख़ जंगल में गूंज कर रह गई पर उसका बाप वापस नहीं आया. मगरमच्छ उसको अपने बड़े-बड़े पंजों में पकड़ कर तालाब के दूसरे किनारे एक गुफा के अंदर ले गया और वहाँ लड़की को छोड़कर वापस आ गया.
लड़की की मासूमियत और खूबसूरती को देखकर उसे खाने का इरादा इस वक़्त उसने छोड़ दिया. राहगीर जो तालाब में नहाने या पानी पीने आते थे, उन्हें वह पेट भरकर खाता और उस आदमी के पास खाने का जो सामान होता उसे लाकर इस लड़की को देता. लड़की इस गुफा में पड़ी रहती. पर मगरमच्छ के डर से वह कुछ बोलती नहीं थी. इस तरह दिन गुजऱते गए. चारों तरफ इस तालाब का मगरमच्छ आदमखोर के नाम से मशहूर हो गया था. डर के मारे कोई राहगीर इस तालाब की तरफ़ नहीं आता था. मगरमच्छ भूख से बेकऱार होने लगा. उसने तालाब की बड़ी-बड़ी मच्छलियों को खाकर ख़त्म कर दिया. अब वह भूख के मारे मरने लगा. जंगल की गाय-बकरी भेड़ भी वह भूख की शिद्दत में खा गया. अब उसके डर से वहाँ कोई जानवर भी पानी पीने नहीं आता था. जब उसे ज़ोर की भूख सताने लगी तो वह बूढ़े की बेटी के कऱीब आकर उसे अपनी लाल और ललचाई आँखों से घूरने लगा. बूढ़े की बेटी समझ गई कि अब उसकी बारी थी. लेकिन मगरमच्छ ने उसे उस दिन नहीं खाया. सोचने लगा कि अब उसके दाँतों में धार नहीं थी. उन्हें लुहार से तेज़ कराने के बाद उस लड़की को खाएगा. यह सोचकर वह लुहार के पास चला गया.
इधर बूढ़े की बेटी अपनी जान बचाने की तरकीब सोचने लगी. गुफा में जितने सोने-चाँदी के ज़ेवरात मगरमच्छ ने लाकर रखे थे. उसने सबको इक_ा किया और एक टोकरी में रखकर सूखे पत्ते और छोटी-छोटी लकडिय़ों से उसे ढँक लिया और अपने जिस्म पर कीचड़ लेप कर अपनी सूरत एक अंधी बुढिय़ा जैसी बना ली और टोकरी कमर पर लादकर लाठी टेकते-टेकते जाने लगी. जैसे ही गुफा से बाहर निकली उसी वक़्त मगरमच्छ आ गया और दहाड़ कर पूछने लगा...''तू कौन है?ÓÓ बूढ़े की बेटी डर से काँपने लगी लेकिन बाद में ख़ुद को संभालते हुए कहने लगी...
मैं अँधी बूढ़ी हूँ हड्डियो की लड़ी हूँ
''मेरे बदन में क्या है जो तू खाएगा? तू अपनी गुफा को जा. वहाँ तेरे लिए एक तंदरूस्त लड़की मौजूद है. उसकी हड्डियाँ चबाने में तुझे मज़ा आएगा.ÓÓ
मगरमच्छ उसे पहचान न सका उसके मुँह में इंसानी गोश्त के मज़े को सोचकर पानी आ गया और वह तेज़ी से गुफा के अंदर चला गया. बूढ़े की बेटी उससे छुटका मिलते ही घबरा कर दौडऩे लगी और घने जंगल में गुम हो गई.
वह सोच रही थी कि जिस माँ-बाप ने उसे धोखा देकर मगरमच्छ के हवाले कर दिया. वह उनके पास नहीं जाएगी. वह यही कुछ सोचते हुए घने जंगल में चली जा रही थी कि उसे शेर की गरज सुनाई दी. उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. वह ख़ौफ़ के मारे इधर-उधर छुपने की जगह ढूंढने लगी. इतनी देर में एक हाथी के बराबर ऊँचा और बड़ा शेर उसके सामने आ गया. डर के मारे वह सामने एक बड़े बरगद के दरख़त के तने से चिपट गई और रो-रो कर मजबूरन दरख़्त से दरख्वास्त करने लगी...''ऐ दरख़्त तू फट जा मैं तुझमें समा जाऊँ और तू बंद हो जा.ÓÓ यह सुनते ही दरख़्त सचमुच फट गया और वह उसके अंदर चली गई और दरख़्त बंद हो गया.
एक दिन एक राजकुमार शिकार करने के लिए उसी जंगल में आया. वह दातुन के लिए एक शाख़ काटने लगा कि उसके कानों में ये आवाज़ आई...
राजकुमार धीरे काट कहीं मेरी आँख फूट न जाए
मेरी नाक काट न जाए मेरा हाथ टूट न जाए
यह सुरीली आवाज़ सनकर राजकुमार को हैरत हुई. और वह दातुन लिए बग़ैर राजमहल वापिस चला आया. वह रात भर उसी जादुई दरख़्त के बारे में सोचता रहा. राजमहल में राजकुमार की शादी की तैयारियाँ हो रही थीं. ज्योतिषी और पुरोहित राजकुमार को समझा रहे थे लेकिन राजकुमार की बस एक ही जि़द थी कि वह उसी दरख़्त से शादी करेगा. अगर उसकी शादी उस दरख़्त से नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगा. राजकुमार राजा की इकलौती औलाद था. उसकी नजऱ में शादी की अहमियत बेटे की जि़ंदगी से कम ही थी. इसलिए राजकुमार की ख़्वाहिश पूरी की गई. उसी दरख़्त के साथ उसकी शादी की रस्म अदा की गई.
राजकुमार ने उस दरख़्त को वहाँ से उखाड़कर अपने महल के पास बाग़ में लगवा लिया. बूढ़े की बेटी रात गए दरख़्त से निकलती और महल के अंदर जाकर सब काम पूरे करती और सुबह होते ही वापस दरख़्त के अंदर चली जाती. एक रोज़ राजकुमार ने छुपकर बूढ़े की बेटी के ये सब काम देखे. दूसरे दिन जब बूढ़े की बेटी दरख़्त से निकल कर महल के अंदर गई तो राजकुमार ने उस दरख़्त को आग लगाकर भस्म कर दिया.
बूढ़े की बेटी दौड़ती हुई आई और बोली,''आह. तुमने यह क्या किया?ÓÓ
इस पर राजकुमार ने कहा, ''इतना बड़ा महल है तुम इसमें रह सकती हो. इस खूबसूरत बाग़ में घूम सकती हो. बेवजह इस दरख़्त के अंधेरे में क्यों सड़ती रहती हो. और फिर मैं तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ मैंने तुम्हें अपनी रानी बना लिया है. मैं तुम्हारे बिना जी न सकूंगा.!ÓÓ
लड़की तो सिफऱ् मोहब्बत की भूखी थी. लड़की को लगा कि जैसे सारे जहाँ की खुशी उसे मिल गई हो. उस दिन के बाद दोनों राजमहल में हँसी खुशी रहने लगे.

झूलन प्यारे !!

झूलन प्यारे !!

एक रानी थी, बहुत दिनों से उसे कोई औलाद नहीं हुई. वह दिन रात इश्वर की प्रार्थना करती थी की उसे औलाद हो जाये. आखिरकार उसकी साधना सफल हुई और भगवान प्रसन्न हुए और उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया परन्तु उसमे एक यह समस्या थी की उसके पुत्र की उम्र शिफऱ् 12 साल होगी. इश्वर की महिमा रानी को एक बहुत ही सुन्दर पुत्र का जन्म हुआ. रानी बहुत खुश थी पुरे राज्य में उत्सव मनाया गया, भोज किया गया, उपहार बांटे गए, ब्राह्मणों को गाये दान दी गयी. रानी अपने पुत्र का लालन पालन बहुत प्यार से करने लगी. वह अपने पुत्र को हमेशा सोने झूले पर ही रखती थी, पुत्र झूले पर ही खाता, सोता और खेलता था. वह हमेशा झूले पर ही रहना पसंद करता था इसलिए रानी ने उसका नाम " झूलन प्यारे " रख दिया.
झूलन प्यारे बहुत नटखट, बहुत प्यारा बच्चा था. ऐसा प्यारा, ऐसा मोहक बच्चा आस पास के कई राज्यों में नहीं था. जो उसको देखता बस उसका हो हो जाता. उसकी बातें, उसकी हंसी, उसका भोलापन साबका दिल जीत लेता. रानी झूलन प्यारे की देख भाल में सब कुछ भूल गयी थी. झूलन प्यारे उसके कलेजे का टुकडा जो था, अब उसकी दुनिया झूलन ही था. रातों को झूलन को लोरी सुनाती, झूलन के रोने पर रोती थी और उसके हसने पर हंसती थी. झूलन को लेकर वह हजारों सपने देखती थी की कल वह इस राज्य का राजकुमार बनेगा , झूलन की शादी दुनिया की सबसे खुबशुरत राजकुमारी से करुँगी फिर इसका राज्याभिषेक होगा वह रजा बनेगा. हजारों सपने उसकी आँखों में तैर जाते. वह ख़ुशी से गदगद हो जाती. झूलन के प्यार में 11 साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला, सुख में समय जैसे थम जाता है, समय रुक जाता है , ऐसा लगता है जैसे अभी कल की बात हो, ऐसा लगता है जैसे की कही सपना तो नहीं देख रहा था.
रानी को जैसे ही यह एहसास होता की झूलन 12 साल ही रहेगा उसका कलेजा मुह का आ जाता, वह एक आंतरिक पीडा से तड़प जाती. वह रातों को अँधेरे में अकेले में बहुत रोती थी, एक अजनबी भय, एक अजनबी डर उसे खाए जा रहा था, यह सोच कर उसका दिल बैठ जाता. वह खुद को समझाती की इश्वर इतना निर्दयी नहीं हो सकता, उसका मन चाहता था की कोई उसको यह विश्वाश दिलाये की झूलन अब कही नहीं जायेगा, कोई झूठा दिलाशा ही दिला दे की झूलन की उम्र शिफऱ् 12 साल नहीं है..
धीरे धीरे करके 12 साल पुरे हो गए, आज का दिन रानी पर बहुत भरी पडऩे वाला था, आज झूलन प्यारे को जाना था. झूलन इसी का इंतजार कर रहा था पर वह माँ के सामने कैसे जाता. उसने रानी से कहा माँ मुझे भूख और प्यास लगी है और जैसे ही माँ कुछ लेने गयी झूलन झूले से उतरा और चल दिया भगवान के पास. जब रानी लौट कर आई और झूलन को झूले पर नहीं पाया तो रानी का मन अनहोनी के डर से घबरा गया, अनेको अजीबो गरीब ख्याल मन में आने लगे. पहले रानी ने महल में ढूंढा पर फिर वह हाँथ में रोटी और लोटे में पानी लिए हुए ही झूलन को धुधाने निकल पड़ी, रानी रोंती जाती थी और लोगों से पूछती जाती थी की क्या किसी ने मेरे झूलन प्यारे को देखा है,. पर किसी ने नहीं बताया की झूलन प्यारे कहा है. जाते जाते रास्ते नदी के किनारे रानी को चकवा और चकवी मिलते है , रानी ने उनसे पूछा की क्या उन लोगों ने मेरे झूलन प्यारे को कही जाते हुए देखा है . इस पर दोनों झल्ला कर कहते है की हमारे पास तुम्हारे झूलन को देखने के शिवा कोई कम नहीं है क्या की हम तुम्हारे झूलन को निहारते रहेंगे. इस पर रानी ने उन दोनों को श्राप दे दिया की आज के बाद तुम दोनों रत को एक साथ नहीं रह सकते. आज भी रानी के श्राप के कारन दोनों पछि नदी के इस पार और उस पर रहते है .

लालची बुढिया !!

लालची बुढिया !!
किसी गावं में एक सास और बहू रहती थी . सास बहुत दुस्ट थी और अपने बहू को बहुत सताती थी . बहू बेचारी सीधी साधी सास के अत्याचारों को सहती रहती थी . एक दिन तीज का त्यौहार था बहू अपने पति की लम्बी उम्र के लिए ब्रत थी . मुहल्ले की सभी औरते अच्छे अच्छे पकवान बना रही थी . नए नए कपड़े पहन कर और सज सवार कर मन्दिर जाने की तैयारी कर रही थी .
पर सास ने अपनी बहू से कहा - अरे कलमुही तू बैठे बैठे यहाँ क्या कर रही है जा खेत में मक्का लगा है , कौवे और तोते फसल नस्ट कर रहे है जा कर उन्हें उडा. बहू ने कहा माँ आज मेरा ब्रत है मै तो पूजा की तैयारी कर रही थी, आज मुझे मन्दिर जाना है . सास ने कहा - तू सज सज सवर कर मन्दिर जा कर क्या करेगी, कौन सा जग जित लेगी , बहू को गालिया देने लगी .
बहू बेचारी क्या करती मन मार कर जाना पड़ा लेकिन उसे रोना आ रहा था उसकी आँखे भर आई , वह और औरतों को मन्दिर जाते देख रही थी , औरतें मंगल गीत गा रही थी . उसके सब अरमान पलकों से टपक रहे थे . वह आज सजना चाहती थी , अपने पति के नाम की चुडिया पहनना चाहती थी , माग में अपने पति के नाम का सिंदूर लगाना चाहती थी और वह साड़ी पहनना चाहती थी जो उसके पति ने उसे अपनी पहली कमाई पर दिया था, आज उसके लिए मंगल कामना इश्वर के चरणों में जा कर करना चाहती थी . वह अन्दर ही अन्दर रो रही थी और खेत की तरफ़ जा रही थी , खेत पर पंहुच कर , को - कागा - को , यहाँ ना आ , मेरा ना खा - कही और जा जा कहती जा रही थी .
उसी समय पृथिवी पर शंकर और पार्वती जी भ्र्मद करने निकले थे , पार्वती जी को बहू का रोना देख कर ह्रयद भर आया और उन्होंने शिव जी से कहा की नाथ देखिये तो कोई अबला नारी रो रही है . रूप बदल कर शंकर और पार्वती जी बहू के पास पंहुचे और पूछा की बेटी क्या बात है ? क्यू रो रही हो ? क्या कस्ट है तुम्हे तो वह बोली की मै अपनी किस्मत पर रो रही हूँ . आज तीज का ब्रत है गाव की सारी औरते पूजा पाठ कर रही है और मेरी सास ने मुझे यहाँ कौवे उडऩे के लिए भेज दिया है और मै अभागी यहाँ कौवे उडा रही हूँ . भोले बाबा को बहू पर दया आ गई उन्होंने बहू को ढेर सारे गहने और चंडी और सोने के सिक्के दे कर कर कहा की तुम धर जाओ और अपनी पूजा करो , मै तुम्हरे खेत की देख भाल करूँगा .जब बहू धर पहुँची तो बहू के पास इतना धन देख कर आश्चय चकित रह गई . बहू ने सारी बात सास को बता दी . सास बहू से अच्छे से बोली अच्छा तू जा कर पूजा कर ले और अगले साल मै जाउंगी खेत की रखवाली करने जाउनी .
अगले साल जब तीज आई बुढिया तैयार हो कर खेत पर पहुँच गई और खूब तेज तेज रोने लगी , ठीक उसी समय शंकर और पार्वती उधर से गुजर रहे थे और उन्होंने ने पूछा की क्या बात है तो उस बुढिया ने बताया की मेरी बहू मुझे बहुत परेशान करती है और उसने आज भी उसने मुझे खेत की रखवाली के लिए भेज दिया जबकि आज मेरा ब्रत है . भगवान शंकर उस बुढिया को समझ गए और उन्होंने ने कहा तुम घर जाओ , तो बुढिया ने कहा की आपने मुझे कुछ दिया नही तो भोले बाबा ने कहा की धर जाओ तुम्हे मिल जायेगा . जब वह घर पहुची तो उसके पुरे शरीर में छाले पड़ गए . बुढिया बहू को गलिया देने लगी . बहू ने पूछा तो बुढिया ने पुरी कहानी बताई , तब बहू ने कहा की भगवान हमेशा सरल, सच्चे और भोले भाले लोगों की ही सहायता करते है , लालची लोगो की नही .

बुद्धिमान राधा

बुद्धिमान राधा
भोला एक गरीब मल्लाह था। वह प्रतिदिन सुबह से शाम तक अपनी नाव से राहगीरों को नदी के इस पार से उस पार तथा उस पार से इस पार पहुँचाया करता था। इससे जो कुछ आदमनी होती, उसी से वह अपना गुजर-बसर करता। भोला की एक बेटी थी- राधा। राधा एक मेहनती व बुद्धिमान लङकी थी। अपनी कक्षा में वह हमेशा प्रथम आती थी। भोला अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। वह उसके लिए हमेशा उसकी पसंद की कोई न कोई चीज अवश्य लाया करता था।

भोला की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसकी अकेले की कमाई से घर के खर्चे पूरे नहीं पङते थे, अतः उसकी पत्नी बाँस की टोकरियाँ बनाया करती थी। राधा चूँकि समझदार लङकी थी और अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को वह भली-भाँति समझती थी, अतः स्कूल से आते ही वह टोकरियाँ बनाने में जुट जाती थी। जब टोकरियाँ बनकर तैयार हो जाती, तो भोला उन्हें नदी पार के बाजार में बेच आता। इससे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती। इस प्रकार जिन्दगी आराम से कट रही थी।

भोला के पङौस में एक रामू नाम का आदमी रहता था। वह बङा ही ईर्ष्यालु और लालची स्वभाव का आदमी था। पिछले दिनों उसने भी एक नई नाव खरीद ली थी। अब सारे राहगीर उसकी नई नाव में बैठने लगे। भोला की पुरानी-जर्ज़र नाव में कोई नहीं बैठता था, अतः वह उदास रहता था। वह घाट पर जाता तो रोज़ था, पर बहुधा शाम को खाली हाथ ही घर लौटता था। घर की आर्थिक स्थिति बिगङने लगी। भोला को उपाय नहीं सूझ रहा था। राधा जब अपने पिता को उदास देखती, तो उसे बहुत दुःख होता।
एक दिन राधा को एक उपाय सूझा। वह अपने बचत के पैसों से एक सुन्दर-सा मुलायम कालीन खरीद लायी। दूसरे दिन वह मुँह-अंधेरे उठी और पास के बगीचे से रंग-बिरंगे खुश्बूदार फूल चुन लायी। फिर वह घाट पर गई और अपनी नाव में नया कालीन बिछाकर तथा उसे फूलों से सजाकर चुपचाप घर लौट आई। घाट से उसका घर मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर था। उसने किसी को कुछ नहीं बताया। भोला जब घाट पर पहुँचा तो उसने अपनी नाव को नई-नवेली दुल्हन की तरह सजा हुआ पाया। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह सोचने लगा, यह किसका काम हो सकता है? तभी दो-चार राहगीर आकर उसकी नाव में बैठ गये और नाव खोलने की जिद्द करने लगे। भोला ने जैसे ही नाव खोली, दो-चार राहगीर और आ गये। नाव चल पङी। दिनभर भोला के मन में यही उधेङबुन चलती रही कि उसकी नाव को किसने सजाया होगा? आज उसके कई फेरे हुए। वह बहुत खुश था। शाम को जब वह घर लौटा तो राधा के लिए ढ़ेर सारी मिठाई लेता आया। आते ही उसने राधा से पूछा- "क्या नाव को तुमने सजाया था?"
राधा गर्व से बोली- "हाँ पिताजी! मैंने ही सजाया था। कोई दूसरा हमारी नाव को क्यों सजायेगा?"
"और वह नया कालीन?"
"वह मैंने खरीदा था।"
"लेकिन तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?"
"मेरे गुल्लक से..।"
भोला आगे कुछ नहीं पूछ सका। उसका गला रुँध गया और छाती भर आई। आगे बढकर उसने राधा का माथा चूम लिया।
सारे राहगीर अब फिर से भोला की नाव में बैठने लगे। उसकी आमदनी फिर बढने लगी। राधा सुबह उठते ही रोज़ अपनी नाव को फूलों से सजा आया करती थी। भोला जब साँझ को घर लौटता, तो उसके लिए रोज कोई न कोई उपहार अवश्य लाता। वह किसी न किसी बहाने हमेशा राधा की तरफ करता रहता था। और राधा की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। उनकी गाङी फिर से पटरी पर लौट आयी।

अब रामू घाट पर बैठा दिनभर टापता रहता, पर उसकी नाव में कोई भी राहगीर नहीं बैठता। जबकि भोला की नाव हमेशा लदी ही रहती थी। यह देखकर रामू भोला से ईर्ष्या करने लगा। उसने भोला से बदला लेने की सोची। एक दिन वह रात को चुपके-से उठा और घाट पर जाकर भोला की नाव खोल आया।

सुबह राधा जब सजावट के लिए फूल लेकर घाट पर पहुँची तो वहाँ उनकी नाव नहीं थी। वह घबरायी हुई घर आयी और सारी बात भोला को बतायी। भोला भी घबराया हुआ घाट पर पहुँचा, पर उसकी नाव का कहीं अता-पता नहीं था। वह बेदम-सा होकर वहीं बैठ गया। नाव उसके लिए नाव नहीं, बल्कि उसके जीने का सहारा थी; परम मित्र थी; उसकी जिन्दगी थी। वह घुटनों पर सिर रखकर सिसकने लगा। राधा ने उसे ढाढ़स बँधाया।
दो दिन तक भोला ने कुछ नहीं खाया। राधा के बार-बार समझाने पर भी वह दो-चार ग्रास खाकर ही उठ जाता। नाव ने उसकी भूख-प्यास सब हर ली थी। आज जब राधा उठी तो देखा, भोला का शरीर बुखार से तप रहा था। उसने तुरन्त डॉक्टर को बुलाने का फैसला किया। मल्लाहों की बस्ती में कोई डॉक्टर नहीं था, अतः वह नदी पार के डॉक्टर को बुलाने चल दी।

जब वह घाट पर पहुँची तो देखा, वहाँ सिर्फ रामू की नाव ही थी। वह चुपचाप जाकर नाव में बैठ गई, क्योंकि वह जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास पहुँचना चाहती थी। नाव चल पङीँ। आज पानी का बहाव थोङा तेज था। नाव डगमगाती हुई चल रही थी। थोङी ही देर बाद नाव घाट पर पहुँच गई। ईर्ष्यावश रामू ने राधा से डेढ गुना किराया लिया। राधा ने इस समय बहस करना उचित नहीं समझा। वह उतरते ही डॉक्टर के पास गई और अपनी सारी व्यथा कह सुनायी। डॉक्टर साहब भोला को जानते थे, अतः तुरन्त साथ हो लिए। वे दोनों घाट पर पहुँचे तो वही रामू की नाव तैयार थी। दोनों चुपचाप बैठ गये। पानी का बहाव काफी बढ गया था। सभी मल्लाहों ने छुट्टी कर दी थी, पर लालची रामू ने कोई परवाह नहीं की।
नदी के बीच में आते-आते नाव नशे में धुत्त शराबी की तरह लङखङाने लगी। तेज लहरें रह-रहकर नाव का रुख मोङ रही थी। रामू ने पूरा दम-खम लगा दिया, पर नाव नियंत्रित नहीं हुई। वह पसीने-पसीने हो गया। सारे राहगीर घबरा गये। इसी बीच एक तेज लहर ने नाव को एक ओर झुका दिया। रामू एकदम से नदी में गिर पङा और लहर के साथ बहने लगा। सारे राहगीर चीखने-चिल्लाने लगे। उधर रामू मदद के लिए चिल्ला रहा था। अब राधा के चुप बैठने का समय नहीं था। उसने तुरन्त पतवार थाम ली और राहगीरों का हौंसला बढाती हुई बोली- "घबराइये मत! कुछ नहीं होगा। आप झुकाव की विपरित दिशा में खिसक जाऐं और नाव को कसकर पकङ लें।"
राहगीरों ने ऐसा ही किया। एक क्षण में नाव संतुलित होकर सीधी हो गई। तभी एक सज्जन ने उठकर राधा के हाथ से पतवार छीन ली और पूरे जोर-जोश के साथ नाव खेने लगा। सबने राहत की साँस ली। उधर रामू पानी में हाथ-पाँव मार रहा था और बराबर मदद के लिए चिल्लाये जा रहा था। संयोग से नाव में एक धोबी भी बैठा था। राधा की नज़र उसकी कपङों की गठरी पर पङी। उसने बिना एक पल गँवाये राहगीरों की मदद से कपङो में गाँठ लगाकर एक रस्सी बनायी और नदी में डाल दी। बहाव के साथ रस्सी रामू तक पहुँच गई। रामू ने जैसे ही रस्सी को पकङा, राहगीरों ने उसे खींच लिया और रामू को डूबने से बचा लिया। नाव में आते ही रामू राधा के पैरों में गिर पङा और उससे माफी माँगने लगा। राधा पीछे हटकर बोली- "अरे..रे.! यह आप क्या कर रहें हैं दादा? मेरे पैरों में गिरकर आप मुझे लज्जित न करें। आदमी ही आदमी के काम आया करता है। आपको बचाना तो मेरा फ़र्ज था।"
यह सुनकर रामू ने उसे दिल से लगा लिया। पाश्चाताप के आँसुओं ने उसके मन का सारा मैल धो दिया। नाव के घाट पर पहुँचते ही राहगीरों ने राधा को कंधों पर उठा लिया और उसकी जय-जयकार करने लगे।
रोज एक-एक पैसे के लिए झगङने वाले रामू ने आज किसी से भी किराया नहीं लिया।

राधा डॉक्टर को लेकर तुरन्त घर पहुँची। डॉक्टर ने जाँच कर भोला को दवाई दे दी। जब पैसों की बात चली, तो डॉक्टर साहब ने साफ मना कर दिया, बोले- "आज तुम्हारी ही दी हुई यह जिन्दगी अगर तुम्हारे इतनी ही काम न आ सके, तो मेरे जीने को धिक्कार है!"
"पर डॉक्टर साहब! यह तो आपका पेशा है!"
"तो क्या हुआ? आदमी ही आदमी के काम आता है। जिन्दगी का क्या भरोसा कब उठ जाए? आज से मैं भी गरीब-बेसहारा लोगों का मुफ्त में ईलाज किया करूंगा।"
और वे अपना बैग उठाकर चल दिए।

शाम तक जब भोला का ज्वर उतर गया, तो वह राधा के मना करने के बावजूद टोकरियाँ बनाने लगा। तभी रामू आया और भोला के पैरों में गिरकर माफी माँगने लगा। भोला अवाक् रह गया। सोचा, यह आदमी आज एकदम से कैसे बदल गया? रामू कहने लगा, "भैया! मैंने तुम्हारा बहुत नुकसान किया। मुझे माफ कर दो भैया! तुम्हारी नाव को मैंने ही खोला था और वह रातों-रात बहकर समुद्र में जा गिरी थी।" और फिर उसने भोला को आज की सारी घटना बतायी कि कैसे आज राधा ने उन्हें मौत के मुँह से बचा लिया था। भोला ने राधा की तरफ देखा, वह मुस्कुरा रही थी। भोला ने रामू को गले से लगा लिया। रामू ने अपनी नाव भोला को दे दी। आज राधा की सूझबूझ और उसके सदव्यवहार ने रामू का दिल जीत लिया था। वह कहने, "भैया! क्या पङा इस ईर्ष्या-द्वेष में। एक दिन यों ही मर जायेंगे। आज से प्रेम-भाईचारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रहेंगे। यही जीवन का सार है।"

जिस किसी ने भी यह घटना सुनी, वह राधा की बुद्धिमानी और उसकी सूझबूझ की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।