Saturday, November 2, 2013

एक लड़का

एक लड़का था मेरे कॉलेज में ,
वो शायद मुझपे मरता था …
मुझसे बस एक बार बातें करने को
बड़े बहाने करता था ...

मेरे नाम कि कसमें खाता था
मेरे घर के चक्कर लगाता था
मेरे आसपास होने से , उसके चेहरे का रंग बदल जाता था
मेरा ज़िक्र होने पर वो , चौकन्ना सा हो जाता था ...

कितने ही ख़त उसने लिखे थे मुझको
जिनको मैंने उसके सामने , बड़ी अदा से फाड़ा था
उससे बेहतर कई हैं , मेरी मोहब्बत में
कितनी बार उसको ये जताया था …

उसके सामने जाने मैं इतनी बेरहम क्यों बन जाती थी
उसको दर्द पहुंचाकर खुद बड़ा मुस्कुराती थी
उस दिन हमने उसका बड़ा मज़ाक उड़ाया था ,
रो दिया था उसने जब मैंने अपनी शादी का कार्ड भिजवाया था …

आज उन बातों को दस साल बीत चुके हैं
अल्हड़पन कि बातों को गम्भीर मुद्दे घेर चुके हैं ,
पर वो लड़का जाने क्यों मुझे , अब भी याद आ जाता है
उसके याद आते ही कुछ , मेरे अंतर मन से खो जाता है …

उसके बेपनाह इश्क़ ने ही तो मुझे गुरूर दिलवाया था
एक मामूली सी शक्ल को उसने , हसीन महसूस करवाया था
उसके बाद किसी को मुझमे कुछ ख़ास नज़र नहीं आया
ना मैं किसी का चाँद , ना किसी का नूर ,
इन सब अल्फ़ाज़ों से तो बस उसी ने मुझे सजाया था ...

वो मेरा बचपना था , या ये मेरी खुदगर्ज़ी है
क्यों उसे ही चाहती हूँ अब , जिससे मुझे पहले इनक़ार था
ये भी मुमकिन है कि वो मुझको भूल गया हो लेकिन ,
मेरे ज़हन से वो जाता नहीं .......

ये वो ही मेरा पहला प्यार था..

बूढ़ा पेड़.

करीब एक साल पहले..
वो बूढ़ा पेड़..
अक्सर खटखटाता था...
सामने वाली खिड़की...
बहुत पुराना राब्ता था...
उस घर से...
एक बुढ़िया थी जो रोज़ उसकी कमर में...
बाँध देती थी कुछ दुआएँ...
रोली से इक रिश्ते का निशान छोड़ के जाती थी...
बहुत दिन जब बुढ़िया नहीं आई...
तब शाख बढ़ा कर खिड़की खटखटाने लगा...
बुढ़िया बीमार थी...
जब जब वो खाँसती...
पेड़ तस्दीक़ करता, कहीं दुआओं का कमरबन्द...
कमज़ोर तो नहीं पड़ रहा...
एक साल हुआ वो बुढ़िया नहीं रही...
अब पेड़ पर भी नयी कोपलें नहीं आती थी...
आज काटा जा रहा है...
तो एक भी आँसू नहीं निकला...
क्यूंकी उस खिड़की से झाँककर देखा था उसने...
नयी पीढ़ी है...
इसे बूढ़े रिश्ते नहीं...
बस स्पेस चाहिए...