Meri mohabbat ki saza bemisaal di usne, udaas rehne ki aadat daal di usne, maine jab bhi apna bnaana chaha usko, baato-baato me baat hi taal di usne
Monday, September 17, 2012
Top of The World Slideshow Slideshow
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Tuesday, September 11, 2012
हमशक्ल चेहरे
अक्सर यह बात सुनाई देती हैं कि कई बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों की कहानी एक जैसी है। तो जनाब सिर्फ कहानी ही नहीं, कलाकार भी एक जैसे ही हैं। न सिर्फ अपनी प्रतिभा के मामले में, बल्कि शक्ल-सूरत से भी। आपने शायद कभी गौर न किया हो, लेकिन यह सच है। कौन, किसका है हमशक्ल, आइए जरा हम भी कुछ चेहरों को टटोलें, गुंजन शर्मा के साथ..
चेहरे
कहते हैं कि दुनिया में एक ही शक्ल के सात इंसान होते हैं। लेकिन शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जिसने अपने हमशक्ल सात इंसानों को देखा हो। यह भी कहा जाता है कि बड़े-बुजुर्ग जो कहावतें कह गए हैं, उनमें कुछ ना कुछ सच्चाई तो जरूर है। भले ही हममें से किसी ने अपनी शक्ल के सात इंसानों को न देखा हो, लेकिन एक या दो हमशक्लों को तो जरूर ही देखा होगा और अगर नहीं भी देखा है, तो आज हम आपको उन सितारों से बताते हैं, जिनके कम से कम एक या दो हमशक्ल तो जरूर ही हैं। बॉलीवुड और हॉलीवुड के ये सितारे चेहरे-मोहरे, हाव-भाव, पर्सनैलिटी के अलावा स्टारडम के हिसाब से भी एक-दूसरे से बहुत मेल खाते हैं। आइए देखें उन सितारों की एक झलक और जाने क्या कुछ खास है उनके चेहरों में..कैटरीना कैफ-कामिला बैले
हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों ही इंडस्ट्री में कैट की हमशक्ल एक्ट्रेस मौजूद हैं। लेकिन अगर बात उनकी परफेक्ट हमशक्ल की आती है तो हॉलीवुड अभिनेत्री ‘कामिला बैले’ एक अच्छा उदाहरण है। बॉलीवुड और हॉलीवुड ब्यूटी कैटरीना कैफ और कामिला बैले के नाम के साथ उनके चेहरे भी खूब मिलते हैं। दोनों ही अदाकारा खूबसूरती के मामले में एक दूसरे के बराबर ही हैं। ऐसा लगता है जैसे ये दोनों जुड़वा बहनें हो। कामिला के अलावा बॉलीवुड इंडस्ट्री में कैट की हमशक्ल अदाकारा हैं ‘जरीन खान’ जो चेहरे-मोहरे और पर्सनैलिटी वाइज कैटरीना की तरह दिखती हैं। दरअसल जरीन खान ने बॉलीवुड इंडस्ट्री में अपनी पहचान कैट की हमशक्ल के रूप में ही बनाई।
ऐश्वर्या राय-एंजलीना जोली
विश्व सुंदरियों में विख्यात हॉलीवुड और बॉलीवुड अभिनेत्री एंजलिना जोली और ऐश्वर्या राय में बहुत सारी समानताएं हैं। उनके नाम के पहले अक्षर से लेकर नेमफेम तक सब कुछ एक जैसा ही है। ऐश्वर्या राय अगर बॉलीवुड इंडस्ट्री की चार्म हैं तो अमेरिकन एक्ट्रेस एंजलीना जॉली हॉलीवुड की शान हैं। दोनों ही अपने जॉन की फेमश और बेहतरीन अदाकारा हैं। लेकिन इन सिमिलैरिटी के अलावा उनकी सबसे खास बात यह है कि उनके चेहरे भी एक दूसरे से काफी मेल खाते हैं। जरा गौर से देखिए, ऐश्वर्या और एंजलीना के चेहरे को आप खुद-बखुद हकीकत से वाकिफ हो जाएंगे। ऐश्वर्या के हमशक्ल की लिस्ट यहां खत्म नहीं होती। ऐश्वर्या का चेहरा स्पेन की सेक्सियेस्ट रिपोर्टर ‘सारा कारबोनेरो’ से भी बहुत मेल खाता है। वहीं बॉलीवुड में भी उनकी हमशक्ल के चर्चे तब सुनने में आए, जब सलमान खान ने ऐश्वर्या से ब्रेकअप के बाद उनकी हमशक्ल ‘स्नेहा उल्लाल’ को ‘लक्की’ फिल्म में अपने अपोजिट लीड रोल दिया।
आमिर खान-टॉम हैंक्स
हालांकि टॉम हैंक्स आमिर खान से उम्र में बड़े हैं, लेकिन उनकी पुरानी फिल्में ‘स्प्लैश’ और ‘यू हैव गॉट मेल’ देखें तो दोनों के चेहरे एक दूसरे से काफी मिलते-जुलते हैं। दोनों ही महान कलाकारों में से एक हैं। एक मिस्टर परफेक्शनिस्ट हैं तो दूसरा ऑस्कर विनर। ऑस्कर विनर टॉम हैंक्स और मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान में काफी समानताएं हैं। जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती हैं। हैंक्स जहां हॉलीवुड के सुपर स्टार्स की एक मजबूत कड़ी हैं, वहीं आमिर खान हिंदी फिल्म इंडस्ड्री के दिलों की धड़कन हैं। दोनों की कद-काठी और चेहरा काफी मेल खाता है।
ऋतिक रोशन-ब्रैडली कूपर
बॉलीवुड के सबसे हॉटेस्ट एंड सेक्सी हीरो ऋतिक रोशन और अमेरिकीफिल्म, थियेटर और टेलीवीजन एक्टर ‘ब्रैडली कूपर’ को अगर ध्यान से देखें तो उनकी पर्सनैलिटी के साथ-साथ उनकी आंखें, ठोड़ी और उनके फेसियल एक्सप्रेशन ऋतिक रोशन से काफी मेल खाते हैं। ब्रैडली को पीपल मैगजीन ने ‘सेक्सियेस्ट मैन अलाइव’ से सम्मानित किया है, तो वहीं ऋतिक ने विश्व के सबसे ‘सेक्सी मैन’ होने का खिताब हासिल किया है। दोनों ही अभिनेता युवा दिलों की धड़कन हैं। इसके अलावा बॉलीवुड स्टार ‘हर्मन बवेजा’ का चेहरा भी ऋतिक से बहुत हद तक मिलता है। फिल्म ‘2050’ से डेब्यू करने वाले हर्मन ने चेहरे के साथ ऋतिक के स्टाइल को भी कापी करने की कोशिश की।
करीना कपूर-पेरिस हिल्टन
करीना ने जब से अपना स्लिम फिगर पाया तब से वह हॉट और सेक्सी तो दिखने ही लगी हैं, उसके साथ ही उनमें एक और बदलाव आया है। स्लिम ट्रिम दिखने वाली बेबो ने बॉडी वर्कआउट के साथ अपने दांतों को भी ठीक करवाया है। दांतों के ट्रीटमेंट के बाद बेबो के चेहरे में काफी बदलाव देखने को मिला। उनके फिगर के साथ जब उनके चेहरे में बदलाव आया तो एक दिलचस्प बात पता चली कि बेबो अमेरिकी मॉडल पेरिस हिल्टन की तरह दिखने लगी हैं। कंट्रोवर्शियल पेरिस हिल्टन हॉलीवुड इंडस्ट्री का जहां जाना-माना नाम हैं, वहीं करीना कपूर बॉलीवुड की सुपर सेक्सेसफुल अभिनेत्री हैं।
रणबीर-सिल्वेस्टर स्टैलॉन
हॉलीवुड के महानायक सिल्वेस्टर के चेहरे-मोहरे को देखें तो उनका चेहरा बॉलीवुड के रॉकस्टार रणबीर कपूर से मिलता है। स्टैलॉन की पुरानी फिल्मों को देखें और आज के रणबीर को तो दोनों के चेहरे में बहुत सी समानताएं हैं जैसे उनकी आंखें, उनकी स्माइल जो उन्हें एक दूसरे को हमशक्ल कहने को मजबूर करती हैं।
शाहिद कपूर-टॉम क्रूज
बॉलीवुड के चॉकलेटी हीरो शाहिद कपूर और हॉलीवुड स्टार टॉम क्रूज का स्टाइल और शक्ल दोनों ही काफी मिलते-जुलते हैं। 2011 में आई फिल्म ‘मौसम’ में एयरफोर्स ऑफिसर की यूनिफार्म में तो शाहिद काफी हद तक ‘टॉप गन’ फिल्म में दिख रहे टॉम क्रूज से मेल खाते दिख रहे हैं। जिसके लिए शाहिद को उनकी कोस्टार सोनम ने कांप्लीमेंट भी दे डाला। सोनम ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि शाहिद लुक्स ए लाइक टॉम क्रूज। बॉलीवुड में शाहिद को लिटिल टॉम क्रूज भी कहा जाता है।
बिपाशा बसु-सोफिया लॉरेन
बॉलीवुड की सेक्सियेस्ट लेडी बिपाशा बसु नैन-नक्श में 60 के दशक की इटेलियन एक्ट्रेस सोफिया लॉरेन से मेल खाते हैं। उनकी आंखें और होंठ हूबहू लॉरेन की कापी लगते हैं। लॉरेन भी अपने समय में विश्वस्तरीय ब्यूटीफुल एंड सेक्स सिंबल अपील रखने वाली अभिनेत्रियों में शुमार थी। इसके अलावा न्यूकमर एक्ट्रेस ‘निधि गिल’ की पर्सनैलिटी और शक्ल काफी हद तक बिपाशा से मिलती है, जिसके कारण निधि-बिपाशा-‘द ब्लैक ब्यूटी’ फिल्म में काम कर रही हैं। यह फिल्म बिपाशा के जीवन से प्रभावित है।
राखी सावंत-हाइफा वहेब
आइटम गर्ल और बड़बोली राखी सावंत अपने चेहरे की सर्जरी के बाद काफी हद तक लेबनिज सिंगर हाइफा वहेब की कापी दिखने लगी हैं। इन दोनों में एक और खासियत है जो एक दूसरे से काफी मिलती है वो है इनका बड़बोलापन और उग्र स्वभाव।
अनुष्का शर्मा-नाजिया हसन
सुपरस्टार यंग लेडी अनुष्का शर्मा का चेहरा मशहूर पाकिस्तानी सिंगर ‘नाजिया हसन’ की याद दिलाता है। नाजिया ने 1980 में ‘कुर्बानी’ फिल्म में ‘आप जैसा कोई’ गीत गाकर स्टारडम को छुआ था। भले ही आज नाजिया हमारे बीच नहीं हो लेकिन अनुष्का के चेहरे में उनकी झलक हमें उनकी याद दिला ही देती है।
Monday, September 10, 2012
धर्म का मायाजाल
धर्म का मायाजाल
mukesh chandra
धर्म भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। आम हो या खास, हर इंसान की धर्म में गहरी आस्था है। भगवान ही नहीं, हमारी आस्था पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों में भी है। तभी तो हम मानते हैं कि गाय और पीपल के पत्ते में हमारे 84 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। दिन की शुरूआत हम ईश्वर की प्रार्थना से करते हैं और रात्रि में भगवान को धन्यवाद देकर बिस्तर पर सोने पहुंचते हैं कि उनकी कृपा से दिन अच्छा बीता। लेकिन धार्मिक होने की इसी वजह ने इसे अंधविश्वासी लोगों की दुनिया में भी बदल दिया है। साधु-संतों के पीछे लंबी लाइनें लगती हैं, आस्था में डूबे उनके लाखों श्रद्धालु अपने श्रद्धेय के एक इशारे पर कुछ भी कर डालने को उतारू हो जाते हैं। हाल यह है कि अगर कोई गरीब है और भोजन की भी बमुश्किल जुगाड़ कर पाता है, वह भी धर्म के नाम पर कुछ भी देने-करने को तैयार हो जाता है। धर्म और बाबाओं के नाम पर भारत में किसी को लूटना सबसे आसान है। इसी आस्था का दुरुपयोग करते हुए यहां के बाबाओं ने भगवान के नाम का सहारा लेकर कई बार बाबाओं और ऋषियों के पवित्र कार्यों को अपमानित किया है। कुछ समय पहले एक बाबा के सेक्स रैकेट चलाने का मामला सामने आया था। हर तरह के अपराधों में इनमें से कुछ बाबाओं की लिप्तता पाई जाती रही है। कुछ बाबा तो काले धन को सफेद करने का अवैध कारोबार संचालित कर रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि सभी बाबा इस तरह के नहीं। कइयों का आचरण बेहद शुद्ध है और वह अपने भक्तों के कल्याण में समर्पित हैं। कई बार बाबाओं का नाम लेकर कई गैरसामाजिक लोग इस पवित्र जिम्मेदारी को दूषित करते हैं। धर्म के कारोबारी सरीखे बाबाओं के पास इतना धन है जितना कोई सोच भी नहीं सकता। हाल ही में ब्रह्मलीन हुए बाबा जय गुरुदेव की अकूत संपत्ति से फिर अनुमान लगा कि बाबाओं के पास कितनी दौलत है। पिछले दिनों पुट्टापर्थी के साईं बाबा का भी बड़ा खजाना था। कहा जाने लगा है कि पढ़ना-लिखना बेकार है, अच्छा है बाबा बन जाना। जिस देश में इंजीनियर और अन्य पढ़े-लिखे बेरोजगार हों, यह बात गलत नहीं लगती।
प्रस्तुत है करोड़-अरबपति बाबाओं पर मुकेश चंद्र श्रीवास्तव की एक रिपोर्ट—
माता अमृतानंदमयी
जादू की झप्पी से आध्यात्मिक अनुभूति और स्नेह बांटने वाली को उनके भक्त प्रेम से अम्मा कहकर पुकारते हैं। समर्थक कहते हैं कि माता का निश्छल प्रेम उन्हें सभी आध्यात्मिक नेताओं से अलग करता है। 27 सितम्बर, 1953 को केरल के एक छोटे से गांव आल्लपाड में एक गरीब मछुआरे परिवार में जन्मी माता अमृतानंदमयी एक गरीब परिवार से हैं. अम्मा जब छ: माह की हुईं तभी इन्होंने बोलना व चलना सीख लिया था और तीन वर्ष की होते-होते भक्तिगीत गाना भी। धीरे धीरे माता अमृतानंदमयी लोगों के बीच लोकप्रिय होती गईं। माता अमृतानंदमयी ने 1987 से अपने अनुयायियों के अनुग्रह पर देश-विदेश के आयोजनों में शामिल होना शुरू किया। देश-विदेश के विभिन्न संगठनों में हिस्सा लेनी वाली माता अमृतानंदमयी ने माता अमृतानंदमयी मठ, माता अमृतानंदमयी सेंटर, अम्मा-यूरोप, अम्मा-जापान, अम्मा-केन्या, अम्मा-आॅस्ट्रेलिया आदि की स्थापना की है। यह सभी संगठन संयुक्त रूप से एम्ब्रेसिंग द वर्ल्ड के रूप में जाने जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार मां अमृतानंदमयी की दौलत करीब 400 करोड़ की है। माता अमृतानंदमयी को बड़ी मात्रा में अनुयायियों से दान में धन मिलता है।राम रहीम
सन्त गुरमीत राम रहीम सिंह को उनके भक्त भगवान मानते हैं। डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक संत गुरमीत राम रहीम सिंह भी कुख्यात बाबाओं की सूची में शामिल किए जाते हैं। कभी सिखों के गुरु की हत्या तो कभी बलात्कार जैसे मामलों में लिप्त होने तक के उन पर आरोप लगे हैं। पंद्रह अगस्त, 1967 को राजस्थान के गंगानगर में जन्मे राम रहीम के माता-पिता संत शाह सतराम जी के भक्त थे। 23 सितम्बर, 1990 को संत शाह सतराम जी ने घोषणा की कि गुरमीत राम रहीम सिंह ही उनके आध्यात्मिक कार्यों को आगे बढ़ाएंगे और तब से गुरमीत राम रहीम सिंह ने देश में अपनी शिक्षा देनी शुरू कर दी। संत गुरुमीत राम रहीम की संपत्ति करीब 300 करोड़ से भी ज्यादा है। जगह-जगह सत्संगों के अलावा माना जाता है कि काफी धन इनके पास गैर-कानूनी तरीके से भी इकठ्ठा किया गया है।ईसाई धर्मगुरु पाल दिनाकरण
पाल दिनाकरण का कृपा कारोबार आजकल चर्चा में है। बिजनेस ब्लेसिंग नामक इस कारोबार से वह लोगों से धन लेते हैं। अगर आप कोई बिजनेस शुरू करना चाहते हैं या अपने बिजनेस पर कृपा चाहते हैं तो अलग से पैसे दीजिए, आपको कृपा मिल जाएगी। वह 2008 में अपने पिता की बनाई गई कारुण्या यूनिवर्सिटी और जीसस कॉल्स नामक संस्था के सर्वेसर्वा हैं। पॉल दिनाकरन अपने प्रवचनों से ईसा मसीह की कृपा बरसाने का दावा करते हैं और इस काम में उनके परिवार के बाकी सदस्य भी शामिल हैं। ईसा मसीह की महिमा गाते-गाते पॉल ने लाखों लोगों को क्रिश्चियन बनने के लिए भी प्रेरित किया है। पॉल दिनाकरन का सालाना टर्नओवर पांच हजार करोड़ से ज्यादा का है। वह भारत सरकार की अल्पसंख्यक शिक्षा संबंधी निगरानी समिति के सदस्य भी हैं। पॉल का एक 24 घंटे का चैनल रेनबो भी है जिसके जरिए उनकी सभाओं का प्रसारण करीब नौ देशों के टीवी चैनलों पर होता है। पॉल जीसस काल्स मिनिस्ट्री के नाम पर मैरिज ब्यूरो, जॉब ब्यूरो और अन्य कार्य भी करते हैं। पॉल की वेबसाइट पर आॅनलाइन डोनेशन की मांग की जाती है।श्रीश्री रविशंकर
श्रीश्री रविशंकर आध्यामिक नेता एवं मानवतावादी धर्मगुरु हैं। श्री रविशंकर चार साल की उम्र में ही भगवदगीता के श्लोकों का पाठ कर लेते थे। बचपन में ही उन्होंने ध्यान करना शुरू कर दिया था. रविशंकर लोगों को सुदर्शन क्रिया सिखाते हैं। इसे सिखाने के कोर्स की फीस हर देश में अलग-अलग है। इसके बारे में वो कहते हैं कि 1982 में दस दिवसीय मौन के दौरान कर्नाटक के भद्रा नदी के तीरे लयबद्ध सांस लेने की क्रिया एक कविता या एक प्रेरणा की तरह उनके जेहन में उत्पन्न हुई। उन्होंने इसे सीखा और दूसरों को सिखाना शुरू किया। 1982 में श्रीश्री रविशंकर ने आर्ट आफ लिविंग की स्थापना की। यह शिक्षा और मानवता के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करती है। उन्होंने 1997 में इंटरनेशनल एसोसियेशन फार ह्यूमन वैल्यू की स्थापना की जिसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर उन मूल्यों को फैलाना है जो लोगों को आपस में जोड़ती हैं। श्री श्री रविशंकर की संपत्ति 500 करोड़ से भी ज्यादा की है। आरोप उन पर भी हैं कि वह सत्ता के मददगार का काम करते हैं।निर्मल बाबा
बाबा जी, मुझे गाड़ी दिला दीजिए.. बाबा जी मैंने जो विश मांगी है, वह भी पूरी कर दीजिए.. बाबा जी मेरा वर्क टार्गेट पूरा करने का आशीर्वाद दें.. बाबा जी मेरी परीक्षा चल रही है, अच्छे मार्क्स दिला दें.. मुझे अच्छा घर दिला दें.. अच्छी नौकरी दिला दें.. रितू से शादी करा दें.. देश के 36 चैनलों पर सिर्फ एक व्यक्ति से यह इच्छा पूरी करने को कहा जा रहा हैै, वह हैं निर्मल बाबा। निर्मलजीत सिंह नरूला नामक यह व्यक्ति निर्मल बाबा कैसे बना, यह आज भी रहस्य है। निर्मल बाबा की आय के दो स्रोत हैं, पहला निर्मल दरबार के समागम में भाग लेने के लिए निबंधन शुल्क और दूसरा दसवंद। निबंधन शुल्क दो हजार रुपये प्रति व्यक्ति (दो वर्ष से ऊपर के भक्त का भी पूरा पैसा) लगता है जबकि दसवंद (इसकी राशि पूर्णिमा के पहले जमा करनी होती है) है अपनी आय का 10वां हिस्सा। बाबा विभिन्न शहरों में अकूत संपत्ति के मालिक हैंऔर खुद स्वीकार करते है कि 259 करोड़ की संपत्ति उनके पास है। हालांकि अनुमान तो कई गुना और का है। उनके विरुद्ध कई मामलों में जांच शुरू हुई है।बाबा रामदेव
योग गुरू के नाम से प्रसिद्ध बाबा रामदेव की दिलचस्पी आजकल देश की राजनीति में बढ़ गई है। वह विदेशों में जमा काले धन को भारत वापस मंगाने के लिए अभियान चलाए हुए हैं। हालांकि उनकी अकूत संपत्ति भी चर्चित रही है। पिछले वित्त वर्ष में बाबा रामदेव ने दिव्य योग मंदिर और पतंजलि योगपीठ का कुल टर्नओवर 1100 करोड़ रुपए था। इसके अलावा भी बाबा के कई प्रोजेक्ट हैं जिनपर करोड़ो रुपया लगा है। बाबा की हरिद्वार में दिव्य फामेर्सी से हर साल 50 करोड़ रुपए की आय होती है। बाबा रामदेव का 500 करोड़ की लागत से फूड पार्क भी आमदनी का अच्छा स्रोत बनने वाला है। बाबा रामदेव हर साल योग कैंप लगाते हैं जिससे हर साल कुल 25 करोड़ रुपए की कमाई होती है। इस कैंप में कुल 50,000 लोग शिरकत करते हैं और हर व्यक्ति 5,000 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस देता है। हर साल बाबा रामदेव की किताबों और सीडी की बिक्री से 2-3 करोड़ रुपए कमाई होती है। बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के नाम 34 कंपनियां है जिनका टर्नओवर 265 करोड़ रुपए हैं। सरकार की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, बालकृष्ण उत्तराखंड में पंजीकृत 23 कंपनियों के निदेशक हैं जिनका कारोबार 94.84 करोड़ रुपए है। इसके अलावा बालकृष्ण के नाम 5 कंपनियां उत्तरप्रदेश में पंजीकृत है जिनका कुल व्यापार 5 लाख रुपए है और 4 कंपनियां दिल्ली में रजिस्टर्ड हैं जिनका कुल कारोबार 163.06 करोड़ रुपए है जबकि पश्चिम बंगाल में भी एक कंपनी है जिसका कुल व्यापार 8 करोड़ रुपए है। इसके अलावा बालकृष्ण महाराष्ट्र की एक कंपनी में भी निदेशक हैं लेकिन इसके कारोबार के बारे में कोई जानकारी नहीं है। रामदेव भी कई जांच में फंसे हुए हैं।बाबा जय गुरुदेव
हाल ही में ब्रह्मलीन हुए बाबा जय गुरुदेव 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का साम्राज्य छोड़ गए हैं। बाबा टाट के वस्त्र धारण करने की नसीहत देते थे, लेकिन उनकी संपत्ति से ठाठ का अंदाज लगाया जा सकता है। बाबा के ट्रस्ट के मथुरा में आधा दर्जन से ज्यादा बैंक शाखाओं में खाते और एफडी हैं। एसबीआइ मंडी समिति ब्रांच के चालू खाते में एक अरब रुपए जमा हैं। कई अरब रुपए की एफडी भी हैं। अचल संपत्ति में ज्यादातर मथुरा-दिल्ली हाईवे पर एक तरफ साधना केंद्र से जुड़ी जमीनें हैं, तो दूसरी तरफ बाबा का आश्रम है। तीन सौ बीघे जमीन पर एक आश्रम इटावा के पास खितौरा में बन रहा है। ट्रस्ट के पास चार हजार एकड़ से ज्यादा जमीन है। जय गुरुदेव के ट्रस्ट के नाम से मथुरा में स्कूल और पेट्रोल पंप भी हैं। बाबा के आश्रम में दुनिया की सबसे महंगी गाड़ियों का लंबा काफिला है। इसमें पांच करोड़ से ज्यादा कीमत की लिमोजिन गाड़ी भी है। करोड़ों की प्लेमाउथ, ओल्ड स्कोडा, मर्सडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू सहित तमाम गाड़ियों की कीमत 150 करोड़ के आसपास है।महर्षि महेश योगी
विश्व के 150 देशों में भारत और यहां की संस्कृति का रुतबा कायम करवाने वाले महर्षि महेश योगी ने टीएम तकनीक से शिक्षा देकर विश्व को चकित कर दिया था। 12 जनवरी, 1918 को छत्तीसगढ़ में जन्मे महेश योगी का मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होंने तेरह वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 में उन्होंने टीएम तकनीक की शिक्षा देना आरम्भ की। देश से अधिक वह विदेश में लोकप्रिय थे। नीदरलैंड में तो उनके द्वारा बनाई गई मुद्रा राम का चलन भी है। नीदरलैंड की डच दुकानों में एक राम के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। ग्लोबल कंट्री आॅफ वर्ल्ड पीस के पास इतनी संपत्ति है जितना भारत के एक राज्य की वार्षिक कमाई। 250 अरब की संपत्ति के मालिक महर्षि महेश योगी कई कामों में पैसा लगाते थे जैसे शिक्षा और प्रॉपर्टी। उनके पास जो बेशुमार दौलत है उसमें से ज्यादातर पैसा धर्म के नाम पर ही कमाया गया है। योगी पर आरोप है कि शिक्षा के क्षेत्र में उनके साम्राज्य में दलाली की राशि की बड़ी भूमिका है।जयेन्द्र सरस्वती
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्राचीन मठ कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती देश के सबसे अमीर बाबाओं में गिने जाते हैं। संपत्ति और धार्मिक वजह से ज्यादा कांची कामकोटि के शंकराचार्य देश में अपनी राजनैतिक पकड़ के लिए जाने जाते हैं।चाहे कांग्रेस हो या भाजपा या कोई अन्य दल, उनके बीच वार्ता के लिए शंकराचार्य ने कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। वैसे भी हमारे देश में शंकराचार्यों की भूमिका हमेशा अहम रही है और कांची कामकोटि के शंकराचार्य की राजनैतिक भूमिका तो बहुत अहम है। जयेंद्र सरस्वती ने एक समय में बाबरी मस्जिद विवाद को हल करने में अगुआई की थी। जयेंद्र सरस्वती कई ट्रस्टों के मालिक भी हैं जिसकी संपत्ति अगर आंकी जाए को कई करोड़ होगी।
ओशो रजनीश
रजनीश चन्द्र मोहन एक विवादास्पद नए धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिए प्रसिद्ध हुए और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे। ओशो के नाम से मशहूर रजनीश ने दुनिया को जीने का नया रास्ता दिखाया। भोग से योग का रास्ता दिखाने वाले वह अनोखे संत थे। उनका कहना था, भोग इतना कर लो कि मन तृप्त हो जाए और आप स्वत: योग की ओर आकर्षित हो जाएंगे। 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश में जन्मे ओशो रजनीश को कई लोग सेक्स गुरु के नाम से भी जानते हैं। ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन की स्थापना कर उन्होंने अपनी शिक्षा को देश-विदेश में फैलाया। आज उनके भारत स्थित आश्रम में देश और विदेश से कई युवा आकर शरण लेते हैं तथा मनमाफिक जीवन जीते हैं। ओशो की दुनिया में सब मान्य है। ओशो अब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके ट्रस्ट की संपत्ति हजारों करोड़ों रुपये में है। यह संपत्ति भारत ही नहीं, अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में है।सत्य साईं बाबा
आन्ध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी गांव के एक आम मध्यमवर्गीय परिवार में 23 नवंबर, 1926 को जन्मे सत्यनारायण राजू ही आगे चलकर सत्य साईं बाबा बने। कहा जाता है कि 23 मई, 1940 को उनकी दिव्यता का लोगों को अहसास हुआ। सत्य साईं ने घर के सभी लोगों को बुलाया और चमत्कार दिखाने लगे। उन्होंने खुद को शिरडी वाले साईं बाबा का अवतार घोषित कर दिया। शिरडी के साईं बाबा, सत्य साईं की पैदाइश से आठ साल पहले ही ब्रह्मलीन हो चुके थे। खुद को शिरडी साईं बाबा का अवतार घोषित करने के बाद सत्य साई बाबा के पास श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। श्री सत्यसाईं ट्रस्ट की स्थापना कर सत्य साईं ने इसे दुनियाभर में फैला दिया। लोगों द्वारा धर्म के नाम पर सत्य साईं बाबा के पास इतना धन आने लगा जिसकी गिनती करना मुश्किल हो गया। 24 अप्रैल, 2011 को उनकी मृत्यु के पश्चात सत्य साईं बाबा ट्रस्ट के पास 40 हजार करोड़ की संपत्ति का आंकलन किया गया। यह वह धन है जो जनता के सामने खोला गया। अभी और ना जाने कितना धन पुट्टापर्थी की गुफाओं में गुम है। उनकी 400 करोड़ की संपत्ति थी। महाप्रयाण के बाद पता चला कि उनके यजुर मंदिर में 34.5 किलो सोना, 340 किलो चांदी और 1.90 करोड़ रुपए नकदी पड़ा था। बाबा के निधन के बाद मंदिर में जब पहली बार खजाने की खोज शुरू हुई तो 11.56 करोड़ रुपए, 98 किलो स्वणार्भूषण, 307 किलो चांदी के सामान मिले थे। वहां से मिले कुल संपत्ति का ब्यौरा अभी भी सार्वजनिक होना बाकी है। कहा जा रहा है कि सत्य साईं द्वारा छोड़ी गई कुल संपत्ति का मूल्य 40 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा है।संत आशाराम बापू
हमेशा विवादों में रहने वाले संत आसाराम बापू की छवि उनके भक्तों के बीच भगवान से भी ज्यादा है। भारत की सबसे ताकतवर शख्सियतों में से एक संत आसाराम बापू 17 अप्रैल, 1941 को जन्मे। उनके श्रद्धालुओं की संख्या देखते ही बनती है। विभाजित सिंध शहर में जन्मे संत आसाराम बापू के बचपन का नाम आसुमल शिरुमलानी था। वृंदावन के स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज से शिक्षा लेकर उन्होंने भक्ति की राह चुनी। आत्मबोध के लिए आसाराम बापू ने हिमालय की चोटी पर जाकर ध्यान किया और फिर देश में घूम-घूमकर सत्संग करने लगे। इनके सत्संगों से लोगों को मानसिक सुख मिलता है। देश-विदेश में आसाराम बापू ने 1300 से ज्यादा श्री योग वेदांत सेवा समितियों का गठन किया है। संत आसाराम बापू की वार्षिक कमाई का आंकड़ा 500 करोड़ के ऊपर है। वह साल में 15 करोड़ तो अपने सत्संग से ही कमा लेते हैं। आसाराम पर भी आरोप हैं, उनके पुत्र पर तो आश्रम में ही गलत कार्यों में लिप्त रहने का मामला उठा था।मोरारी बापू
वर्षों से देश में कथावाचक की भूमिका निभाने वाले मोरारी बापू धार्मिक गुरु हैं। अखंड रामायण और रामचरित मानस का पाठ करने वाले मोरारी बापू अपनी कथाओं में मुहावरों और शेरों का बखूबी प्रयोग करते हैं जिससे कथा रोचक हो जाती है। मोरारी बापू का जन्म 25 सितम्बर, 1946 के दिन महुआ के समीप तलगारजा (सौराष्ट्र) में वैष्णव परिवार में हुआ था। घर से स्कूल तक की 5 किलोमीटर की दूरी वह अपने दादा द्वारा रामायण सुनकर पूरी करते थे जिसकी वजह से उन्हें रामायण कंठस्थ हो गई थी। 14 वर्ष की आयु में मोरारी बापू ने पहली बार एक महीने तक रामायण का पाठ किया। इसके बाद से बापू देश-विदेश में रामायण की कथा का पाठ करने लगे। आज अमेरिका से लेकर केन्या और विश्व के कई अन्य देशों में मोरारी बापू रामायण का पाठ करते नजर आते हैं हालांकि इनके पास दुनिया भर में आश्रमों और ट्रस्ट का विशेष नेटवर्क नहीं है लेकिन फिर भी इनकी संपत्ति 300 करोड़ की आंकी जाती है जो इन्हें दान में मिली है।बारूद के ढेर पर दुनिया
बारूद के ढेर पर दुनिया
मुकेश चंद्र श्रीवास्तव
समूची दुनिया के देश हथियारों के दीवाने हैं। हथियार जुटाने की जैसे होड़ सी मची है। तरह-तरह के हथियार हैं, एक से बढ़कर एक मारक, पलक झपकते ही हजारों-लाखों लोगों और यहां तक कि शहरों तक को www.kuchhpal.bolgsot.inशिकार बना डालने वाले परमाणु, जैविक और रासायनिक अस्त्रों को आधुनिकतम बनाने के लिए बड़े-बड़े शोध हो रहे हैं। अपने नागरिकों की मूल समस्याओं के निराकरण का रास्ता ढूंढने के बजाए देश बड़ी राशि हथियारों की खरीद में खपा रहे हैं। भारत भी पीछे नहीं, पाकिस्तान जैसे प्रत्यक्ष और चीन सरीखे छिपे हुए दुश्मन से मुकाबला करने के लिए हमें बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। भारत ने परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल की और परमाणु विस्फोट के माध्यम से यह जगजाहिर हुआ, तब हमारे देश में दो तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। एक पक्ष का कहना था कि परमाणु बम बwww.journalistmukesh.blogspot.inनाने के क्षेत्र में उतरकर भारत ने बहुत बड़ी भूल की है। यह हमारी विश्व नीति के खिलाफ है। दूसरे पक्ष में बहुत थोड़े-से लोग थे। इनका कहना था कि परमाणु बम जरूरी हथियार हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा बजट पर खर्च कम हो जाता है। पाक के पास भी यह अस्त्र हैं इसलिये समानता के इस तर्क से भारत और पाकिस्तान के बीच अब युद्ध नहीं हो सकता। हथियारों की इस होड़ और भयावहता पर एक रिपोर्ट।
भारत से आगे पाक
स्वीडन की प्रतिष्ठित संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान के पास भारत से अधिक परमाणु हथियार हैं। भारत के पास 80 से 100 और पाकिस्तान के पास 90-110 परमाणु हथियार हैं। भारत और पाकिस्तान भी सैन्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए परमाणु हथियारों के जखीरे का विस्तार कर रहे हैं। भारत और पाकिस्तान लगातार ऐसे सिस्टम बना रहे हैं जिससे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल और विस्तार सैन्य जरुरतों के लिए किया जा सके। विश्व की आठ परमाणु शक्तियों के पास 19 हजार एटमी हथियार हैं।भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश
एक अध्ययन ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बताया है। वर्ष 2007 से 2011 के बीच की अवधि के इस अध्ययन के मुताबिक हथियारों के आयात में दक्षिण कोरिया दूसरे और पाकिस्तान व चीन तीसरे स्थान पर रहे। स्टॉकहोम इन्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2002-06 की पांच वर्ष की अवधि की तुलना में वर्ष 2007-11 की अवधि में दुनिया में 24 फीसदी अधिक हथियारों की खरीद फरोख्त हुई। इस अवधि में सभी पांच शीर्ष हथियार आयातक देश एशिया के हैं। आंकड़ों के मुताबिक एशियाई और ओशिनियाई देशों की हिस्सेदारी कुल आयात में 44 फीसदी रही जबकि यूरोपीय देशों ने 19 फीसदी, मध्य पूर्व ने 17 फीसदी और अमेरिकी देशों ने 11 फीसदी हथियारों का आयात किया। सबसे कम अफ्रीकी देशों ने नौ फीसदी हथियार आयात किए। दुनिया के कुल हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी रही और वह सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा। शनिवार को ही भारत ने बीस हजार करोड़ रुपये के रक्षा खरीद को स्वीकृति दी है। इसके तहत सतह से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों की आठ रेजीमेंट की जरूरतों की भी पूर्ति होगी।चीन ने बढ़ाया रक्षा बजट
चीन ने इस साल अपने रक्षा बजट में भारी भरकम 11. 2 फीसदी की बढ़ोतरी की है। चीन 2012 में 110 अरब डॉलर सेना के लिए खर्च करेगा। वह बजट का बड़ा हिस्सा सेना के आधुनिकीकरण में खर्च कर रहा है जिस वजह से उसके एशियाई पड़ोसी देशों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं और अमेरिका बार बार उसके इरादों के बारे में उससे पूछ रहा है। चीन ने रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी की घोषणा करते हुए कहा, हमारे देश में 1.3 अरब लोग रहते हैं। हमारा देश बड़ा है और बड़ा तट भी है लेकिन दूसरे देशों की तुलना में हमारे देश में सेना पर खर्च बहुत ही कम है। चीन की सीमित सेना उसकी संप्रभुता, सीमा और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए है। चीन दूसरे किसी भी देश के लिए कोई खतरा नहीं है।आजकल के युद्ध में प्रयुक्त बम
विखंडक बम : इसमें विशेष प्रकार के धातु के खोखले पात्र के भीतर विस्फोटक पदार्थ भरा होता है। जब यह वायुयान अथवा राकेट से गिराने पर पृथ्वी से टकराता है तो धमाके के साथ फट जाता है और इसके टुकड़ों से लोग घायल होते हैं। कभी-कभी यह वायुयान से गिराने पर पृथ्वी से कुछ ऊँचाई पर हवा में ही फट जाता है। इन बमों का कुल भार 2 किग्रा से लेकर 50 किग्रा तक होता है। साधारणतया ये बम बड़े क्षेत्रों में गिराए जाते हैं।विध्वंसक बम : इसका भार 50 किग्रा से लेकर 1,000 किग्रा तक होता है। इसमें साधारण विस्फोटक भरा रहता हे।
अग्नि बम :
ये घनी आबादी वाले शहरों तथा बड़े-बड़े कारखानों पर गिराए जाते हैं जिनसे
वे जलकर नष्ट हो जाते हैं। इसमें आग लगाने वाला पदार्थ एक विशेष प्रकार के
पलीते के साथ भरा होता है। आग लगाने के लिए फासफोरस, नेपाम और थर्माइट
इलेक्ट्रान जैसे रासायनिक यौगिक प्रयुक्त किए जाते हैं और तब इनके नाम
प्रयुक्त पदार्थ के अनुसार भी हो जाते हैं।
रासायनिक बम :
यह एक प्रकार का बैलून होता है जिसकी दीवार पतली होती है। यह विषैली
वस्तुओं से भरा हुआ होता है। यह बम जमीन अथवा जमीन से कुछ ऊपर हवा में
विस्फोट करता है तो विषैली वस्तुएँ, गैस, तरल या ठोस जो भी होती हैं, खोल
से बाहर निकलकर जमीन अथवा हवा में बिखर जाती हैं और कुछ ही क्षणों में उस
विस्फोट स्थल के आसपास बादल का रूप धारण कर लेती हैं।जीवाणु बम : इसका भार लगभग 75 क्रिग्रा तक होता है। इसमें कई कक्ष होते हैं। प्रत्येक कक्ष में जीवाणु, रोगग्रस्त कीड़े अथवा जुएँ भरे होते हैं। बम गिराने पर इसमें लगा फ्यूज जल उठता है और इसी समय इसके कक्षों का ढक्क्न, जो कब्जेदार होता है, झटके के साथ खुल जाता है और रोग फैलानेवाले जीवाणु हवा में बिखरकर फैल जाते हैं। यदि इस बम के खोल का ढक्कन जमीन से 30 फुट पर खुल जाता है तो ये जीवाणु लगभग 400 वर्ग मीटर में फैल जाते हैं। जिस क्षेत्र में जीवाणु बम गिराए जाते हैं उसमें मनुष्य, जीव जंतु और पेड़ पौधे आदि सभी रोग के शिकार हो सकते हैं क्योंकि सारा वातावरण दूषित हो जाता है।
विकिरण बम : यह रासायनिक बम की तरह होता है लेकिन इसका खोल कुछ पतला रहता है। इसके भीतर रेडियमधर्मी पदार्थ विस्फोटक पदार्थ के साथ भरा होता है। विस्फोट होने पर ये पदार्थ धूल की तरह हवा में मिल जाते हैं जिससे वहाँ की हवा रेडियमधर्मी पदार्थों से संदूषित हो जाती है। इस प्रकार वहाँ के लोग रेडियमधर्मी विकिरणजन्य रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।
भयावह घटनाएं
ल्ल रासायनिक अस्त्रों में प्रयुक्त रसायनों के दुष्प्रभाव की भयावहता का अनुमान हम भोपाल स्थित कीटनाशक दवाएं बनाने वाली फैक्टरी यूनियन कार्बाइड में दो दिसंबर 1984 को फॉस्जीन एवं मिसाइल आइसो साइनेट के रिसाव से लगा सकते हैं। इस हादसे में हजारों जानें चली गई थीं, हजारों लोग आज भी दुष्प्रभाव झेल रहे हैं।ल्ल 1995 में आम-सिनिक्रय नामक आतंकवादी संगठन ने जापान के टोक्यो शहर के सब-वे पर सेरिन नामक स्नायुतंत्र को प्रभावित करने वाली गैस का रिसाव कर हजारों लोगों को पलभर में घायल कर दिया।
ल्ल तानाशाह सद्दाम हुसैन के सिपहसालारों ने इराक में कुर्दों के विद्रोह को दबाने के लिए संभवतया ऐसे ही किसी रासायनिक हथियार का उपयोग कर हजारों कुर्दों की हत्या कर दी थी।
आठ सेकेंड में भारत पर परमाणु हमला
पाकिस्तानी सेना के एक जनरल ने वर्ष 2001 में ब्रिटेन के पूर्व
प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के पूर्व संचार निदेशक एलिस्टेयर कैंपबेल से
पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को लेकर भारत को याद दिलाने को कहा था। कैंपबेल
ने अपनी डायरी 'द बर्डन आॅफ पावर' में जिक्र किया है कि पाकिस्तान आठ
सेकेंड में भारत पर परमाणु हमला कर सकता है। भारत ने हालांकि कभी दावा नहीं
किया लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय मिसाइलों की जद में पाकिस्तान के
अधिकतर शहर हैं। चीन का परमाणु कार्यक्रम इतना दबा-छिपा है कि उसका अंदाजा
मुश्किल महसूस होता है।
परमाणु अस्त्र
नाभिकीय अस्त्र या परमाणु बम एक विस्फोटक युक्ति है जिसकी विध्वंसक शक्ति का आधार नाभिकीय अभिक्रिया होती है। यह नाभिकीय संलयन या नाभिकीय विखण्डन या इन दोनों प्रकार की नाभिकीय अभिक्रियों के सम्मिलन से बनाये जा सकते हैं। दोनो ही प्रकार की अभिक्रोंके परिणामस्वरूप थोड़े ही सामग्री से भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। आज का एक हजार किलो से थोड़ा बड़ा नाभिकीय हथियार इतनी उर्जा उत्पन्न कर सकता है जितनी कई अरब किलो के परम्परागत विस्फोटकों से ही उत्पन्न हो सकती है। नाभिकीय हथियार महाविनाशकारी हथियार कहे जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में सबसे अधिक शक्तिशाली विस्फोटक, जो प्रयुक्त हुआ था, उसका नाम ब्लॉकबस्टर था। इसके निर्माण में तब तक ज्ञात प्रबलतम विस्फोटक ट्राईनाइट्रीटोलीन का 11 टन प्रयुक्त हुआ था। इस विस्फोटक से 2000 गुना अधिक शक्तिशाली प्रथम परमाणु बम था जिसका विस्फोट टी. एन. टी. के 22,000 टन के विस्फोट के बराबर था। अब तो प्रथम परमाणु बम से अधिक शक्तिशाली परमाणु बम बने हैं। हाइड्रोजन बम भी परमाणु बम की एक किस्म है।
रासायनिक हथियार
शाब्दिक अर्थ ही बताता है कि रसायनों के प्रयोग से बने हथियारों की श्रेणी है रासायनिक हथियार। रासायनिक हथियार के रूप में क्लोरीन गैस का दुरुपयोग जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध के समय किया था। यह गैस आसानी से किसी भी फैक्टरी में साधारण नमक की सहायता से बनाई जा सकती है एवं इसका दुष्प्रभाव सीधा फेफड़े पर पड़ता है। यह गैस फेफड़े के ऊतकों को जलाकर नष्ट करती है। जर्मनी ने इस गैस की कई टन मात्रा को वायुमंडल में छोड़कर एक प्रकार के कृत्रिम बादल के निर्माण में सफलता प्राप्त की एवं हवा के बहाव के साथ इसे वे दुश्मन की ओर भेजने में सफल हुआ। इसकी भयावह मारक क्षमता को ध्यान में रखकर 1925 में इस जैसे विषैलै रसायनों और बीमारियां फैलाने जीवाणुओं को हथियार के रूप में दुरुपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए एक संधि पर विश्व के अधिकांश देशो ने हस्ताक्षर किए। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी में हिटलर के कुख्यात गैस चैम्बर्स ने खूब चर्चा बटोरी। आजकल वैज्ञानिकों का ध्यान कीटनाशक दवाओं में पाए जाने वाले बहुतेरे विषैले रसायनों को और प्रभावी हथियार के रूप में प्रयोग करने पर है। आजकल प्रयोग होने वालीं ‘सेरिन’ एवं ‘वीएक्स’जैसी जहरीली गैसें उपरोक्त एन्जाइम से प्रतिक्रिया कर उनके एसिटिलकोलीन को हटाने के कार्य में बाधा उत्पन्न करती हैं, परिणामस्वरूप पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु कुछ ही पलों में दम घुटने से हो जाती है।जैविक अस्त्र
इन्हें भी बेहद खतरनाक श्रेणी का अस्त्र माना जाता है। ये परमाणु बम एवं हाइड्रोजन बम से भी अधिक भयानक सिद्ध हुए हैं। ये ऐसे अस्त्र हैं जिन्हें छोड़ने पर किसी प्रकार का धमाका नहीं होता। जीवाणु अस्त्र में रोग फैलाने वाले जीवाणु होते हैं और जिस युद्ध में ये इस्तेमाल किए जाते हैं, वह बहुत वीभत्स एवं संहारक होता है। जीवाणुकर्मक या रोग पैदा करने वाले जीवों से यह बनाए जाते हैं। इनका प्रयोग दुश्मन की युद्ध करने की क्षमता घटाने के लिए होता हे। ये जीवाणु उचित वातावरण पाने पर बहुत कम समय में लाखों सैनिकों को रोगग्रस्त कर देते हैं। युद्धास्त्र के रूप में नाना प्रकार के जीवाणु प्रयोग में लाए जाते हैं और प्रत्येक प्रकार के जीवाणु अलग-अलग प्रकार के संक्रामक रोग फैलाते हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि ऐसे जैविक हथियारों से आक्रमण के लिए किसी अत्याधुनिक एवं मंहगे साधन की आवश्यकता नही होती। इन्हें तो बस जानवरों, पक्षियों, हवा, पानी, मनुष्य आदि किसी भी साधन से फैलाया जा सकता है।हर व्यक्ति के हिस्से दो बुलेट
प्रत्येक वर्ष विश्व भर में छोटे हथियारों के लिए गोले-बारूद का चार अरब डॉलर से अधिक का कारोबार होता है। दुनिया भर में हर साल 12 अरब बुलेट का उत्पादन किया जाता है, और अगर धरती पर रहने वाली कुल जनसंख्या के आधार पर इसका अनुपात निकाला जाए तो हर व्यक्ति के हिस्से दो बुलेट आती हैं।विश्व की जीडीपी का ढाई प्रतिशत खर्च : वर्ष 2011 में विश्व भर में सैन्य साजो-सामान पर 1.73 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जो कि साल 2010 के खर्चे में मात्र 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। ये खर्चा विश्व की जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और दुनिया में प्रति व्यक्ति ये 249 अमेरिकी डॉलर बैठता है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत,पाकिस्तान और इजराइल के पास कुल मिलाकर लगभग 19 हजार परमाणु हथियार हैं। साल 2011 की शुरूआत में ये आंकड़ा 20,530 था।
परमाणु अप्रसार संधि : परमाणु अप्रसार संधि (नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी) को एनपीटी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य विश्व भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है। 1 जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ। अभी इस संधि पह हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 190 है। जिसमें पांच के पास आण्विक हथियार हैं। ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फांस, रूस और चीन। सिर्फ चार संप्रभुता संपन्न देश इसके सदस्य नहीं हैं। ये हैं- भारत, इजरायल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। एनपीटी के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश की मान्यता नहीं दी गई है। जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है। इस संधि का प्रस्ताव आयरलैंड ने रखा था सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला राष्ट्र है फिनलैंड। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है जिसने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को यह दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त नहीं है क्योंकि भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था। उत्तरी कोरिया ने इस सन्धि पर हस्ताक्षर किये, इसका उलंघन किया और फिर इससे बाहर आ गया।
दुनिया के सैन्य खर्च में कम बढ़ोतरी : साल 2011 में विश्व भर में सैन्य साजो-सामान पर 1.73 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जोकि साल 2010 के खर्चे में मात्र 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी, ये खर्चा विश्व की जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और दुनिया में प्रति व्यक्ति ये 249 अमरीकी डॉलर बैठता है। अमरीका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान और इजराइल के पास कुल मिलाकर लगभग 19 हजार परमाणु हथियार हैं. साल 2011 की शुरूआत में ये आंकड़ा 20,530 था। आठ देशों ने 44,00 हथियारों को आॅपरेशन के लिए तैयार रखा है और इनमें से दो हजार उच्च आॅपरेशनल एलर्ट पर हैं। सैन्य खर्च का असर देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है और देश अपनी जनता की जरूरतों पर जरूरी खर्च भी करने में सक्षम नहीं हो पाते।
दुनिया का सबसे निराला ‘वैद्यनाथ धाम’
दुनिया का सबसे निराला ‘वैद्यनाथ धाम’
प्रस्तुति: मुकेश चंद्र श्रीवास्तव
संसार में विभिन्न देशों के भिन्न-भिन्न धर्मों के मानने वाले लोग रहते हैं। प्रत्येक धर्म के मानने वाले भक्त अपने-अपने ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं। सब धर्मों के अपने-अपने पवित्र तीर्थ स्थल हैं जहां पर वर्ष भर में भक्तजन एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते है। परन्तु बाबा वैद्यनाथ धाम की एक विशेषता यह है कि यहां श्रावण मास में मेला लगता है जिसमें लाखों नर-नारी एकत्र होते हैं। हालांकि यहां पर साल भर भक्तगण आते रहते है। बीबीसी लन्दन ने पिछले वर्ष एक सर्वे में इसका उल्लेख किया था और दावा किया है कि वैद्यनाथ धाम का मेला दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। यहां पर सावन में भोले के भक्तों का रेला लग जाता है। एक भोजपुरी फिल्म में महेंद्र कपूर का गाया गीत ‘हाथी ना घोड़ा ना कवनों सवारी, पैदल ही अईबों तोर दुआरी! हे भोले नाथ.....बोल बम के नारा बा इहे एक सहारा बा...’ खूब धूम मचाता है। इसके अलावा अन्य गायकों की भी जमकर कमाई होती है।
श्रावण मास में देश के भिन्न-भिन्न स्थानों के साथ-साथ विदेशों में शिव भक्तगण कांवर चढ़ाने के लिए बाबा वैद्यनाथ धाम में पहुंचते हैं। यह मेला सुल्तानगंज से प्रारम्भ होता है और बाबा वैद्यनाथ धाम से बासुकीनाथ तक आकर पूर्ण होता हैं। इस प्रकार यह मेला 140 किलोमीटर तक फैला होता है जो अपने आप में एक आश्चर्य की बात है। आश्चर्य की बात यह है कि यदि एक कांवरिया सुल्तानगंज में एक लोटा जल बाबा धाम पर चढ़ाने के लिए अपने आगे वाले कांवरियों को पास करता चला जाए तो हाथों हाथ देवघर पहुंच सकता है। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कितना बड़ा मेला लगाता है। सभी कांवरिया स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े भगवा रंग के कपड़े पहनकर चलते हैं। सुल्तानगंज से उनकी यात्रा शुरू होती है। वहां पर सब कांवरिये अपनी-अपनी कांवर में जल भरते हैं और अपने-अपने कांधे पर कांवर को रखकर सम्पूर्ण रास्ते में ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए आगे बढ़ते जाते है। सारे कांवरिये नंगे पैर एक-दूसरे को बम कहकर पुकारते हुए बढ़ते हैं। इस स्थान पर कोई ऊंच-नीच की भावना नजर नहीं आती। सबका खान-पान भी लगभग एक सा रहता है। सभी एक ही मंजिल की ओर बिना किसी भेद-भाव के बढ़ते नजर आते हैं। 110 किमी लंबा सफर तय करने के बाद प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरों को लौटते हैं। इतना बड़ा मेला बाबा वैद्यनाथ धाम की मर्यादा में चार चांद लगा देता है। नासिक, प्रयागराज, उज्जैन एवं हरिद्वार में 12 वर्षोें में कुम्भ का मेला लगता है। छ: वर्षों में अर्द्ध कुम्भी मेला लगता है। इन मेलों में भी इतनी संख्या में भक्त एकत्र नहीं होते जितने बाबा वैद्यनाथ धाम में श्रावण मास में कांवरिये एकत्र होकर वैद्यनाथ पर जल चढ़ाते हैं। इस श्रावणी मेले को सभी शिव भक्त बाबा वैद्यनाथ की अद्भुत लीला मानते हैं।
वैद्यों के वैद्य बाबा वैद्यनाथ
एक बार देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार अस्वस्थ हो गए। उनके अस्वस्थ होने से सभी देवी-देवता चिंतित हो गए। क्योंकि सबका इलाज करने वाला जब स्वयं हीं रोगी हो जाए और उसके पास अपनी बीमारी की कोई औषधि न हो तो दूसरों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। अंत में विवश होकर अश्विनी कुमार महादेव के पास आकर बोले, ‘प्रभु! आपके अतिरक्ति इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जो मुझे रोग से मुक्त कर सके।’अश्विनी कुमार की विनती सुनकर महादेव ने उनको रोगमुक्त कर दिया। तब महादेव का नाम वैद्यनाथ पड़ गया तथा कामदलिंग को वैद्यनाथ कहा जाने लगा। बाबा वैद्यनाथ धाम में संसार के कोने-कोने से लोग अपनी-अपनी चिन्ताएं, अपने-अपने दु:ख और तरह-तरह की कामनाएं लेकर आते हैं। उनकी कामनाएं पूरी होने पर दोबारा उनके दर्शन करने आते हैं। भगवान वैद्यनाथ सबकी कामनाएं पूरी करते हैं। उनके कष्टों को दूर करते हैं। सभी को जो उनकी शरण में आते हैं आश्रय देते हैं। कितना ही असाध्य से असाध्य रोग क्यों न हो जो बाबा वैद्यनाथ की शरण में आता है वह ठीक हो जाता है। यह भी बाबा वैद्यनाथ की एक अद्भुत लीला ही है।
श्री वैद्यनाथ महात्म्य
ज्योतिलिंगों की कुल संख्या बारह है- 1. सोमनाथ, 2. मल्लिकार्जुन, 3. महाकाल, 4. आेंकारेश्वर, 5. केदारनाथ, 6. भीमशंकर, 7. काशी विश्वनाथ वाराणसी, 8. त्रयम्बक, 9. नागेश, 10. रामेश्वरम्, 11. घुश्मेश, 12. वैद्यनाथ। बिहार प्रान्त के सन्थाल परगने में स्थित कामदलिंग वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यहां पर सती का हृदय गिरा था। इसलिए इसे हृदयपीठ भी कहते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार इसे शक्ति पीठ भी कहते हैं। वैद्यनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग की यात्रा करने वाले शिव भक्तों की सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना में एक कथा प्रचलित है। एक बार राक्षस राज रावण हिमालय पर जाकर भगवान शिव के दर्शन प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या करने लगा। उसने एक-एक करके अपने नौ सिर काटकर चढ़ा लिये। अब वह अपना अंतिम दसवां सिर काटकर चढ़ाने वाला ही था कि भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए। उन्होने उसके चढ़ाये हुये नौ सिरों को यथावत् जोड़ दिया और वर मांगने को कहा। रावण ने वर के रूप में उस शिवलिंग को अपनी राजधानी लंका ले जाने की आज्ञा मांगी जिस पर उसने अपने शीश काट काटकर चढ़ाये थे। भगवान शिव ने उसे लिंग ले जाने की आज्ञा तो दे दी परन्तु उसके साथ एक शर्त भी लगा दी कि यदि रास्ते में इसे कहीं रख दोगे तो यह वहीं अचल हो जायेगा। तुम इसे वहां से फिर उठा न सकोगे। रावण ने उनकी शर्त स्वीकार कर ली और शिवलिंग को लेकर लंका के लिए चल दिया। चलते-चलते एक जगह मार्ग में उसे लघुशंका की आवश्यकता होने लगी। वह उस शिवलिंग को एक अहीर के हाथों में थमाकर लधुशंका निवृत्ति के लिए चल पड़ा। उस अहीर को शिवलिंग का भार बहुत अधिक प्रतीत हुआ। वह उसके भार को संभाल न सका। विवश होकर रावण के लौटने से पहले ही उसने उसे वहीं भूमि पर रख दिया। रावण जब लौटकर आया तब फिर वह बहुत प्रयत्न करने के बाद भी उस शिवलिंग को न उठा सका। अंत में निरुपाय होकर उस शिवलिंग पर अपने अंगूठे का निशान लगाकर लंका लौट गया। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने वहां आकर उस शिवलिंग का पूजन किया। इस प्रकार वहां उसकी प्रतिष्ठा कर वे अपने अपने धामों को लौट गए। यहां ज्योतिर्लिंग श्री वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में एक बैजू नामक एक भील ने शिवलिंग की पूजा एवं अर्चना की तथा आजीवन इसका अनन्य सेवक बना रहा। पुराणों में बताया जाता है कि जो मनुष्य इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन कर लेता है उसे समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है। उस पर हमेशा भगवान शिवजी की कृपा बनी रहती है। दैविक, दैहिक, भौतिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। उसे परम शान्तिदायक शिवधाम की प्राप्ति होती है। ऐसा आदमी सदैव सभी के कल्याण और भलाई में लगा रहता है। हमें ऐसे आदमी का संग साथ अवश्य करना चाहिए।कांवर की परम्परा एवं श्रावण मास में कांवर की महिमा
कांवर चढ़ाने का प्रचलन कहते हैं त्रेता युग से प्रारम्भ हुआ था। भगवान राम ने त्रेता युग अवतार लिया था। उन्होंने भगवान शंकर पर कांवर चढ़ाई थी। तभी से यह परंपरा आज तक द्वापर और कलियुग में भी चली आ रही है। श्रावण मास में समुद्र मंथन का कार्य प्रारम्भ हुआ था जो पूरे मास चलता रहा समुद्र मंथन का कार्य देवता और असुरों ने मिलकर किया। इसलिए श्रावण मास में कावर चढ़ाने का विशेष महत्व माना जाता है। समुद्र मंथन में ऐरावत हाथी, उच्चश्रवा, लक्ष्मी, सरस्वती,कलश, चन्द्रमा, अमृत एवं हलाहल आदि 14 रत्न निकले थे। हलाहल को छोड़कर शेष 13 रत्नों को सुरों और असुरो ने आपस में बांट लिया था। हलाहल का पान भगवान शंकर ने किया। भगवान शंकर ने जहर को गले ही में रहने दिया था। इस लिए उन्हें नील कंठ भी कहा जाता है। विष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शंकर ने अपने सिर पर चंद्रमा को धारण कर लिया। विष की जलन को कम करने हेतु सभी देवता बाबा भोलेनाथ को गंगा जल चढ़ाने लगे। क्योेंकि भगवान शंकर ने श्रावण मास में विषपान किया था इसलिए शिव भक्त श्रावण मास को ही कांवर चढ़ाने का उत्तम मास मानते है। वैसे तो कांवर की महिमा बारहोें मास निराली है। कांवर में भगवान शिव विराजमान रहते है। बाबा वैद्यनाथ में शिव की विष ज्वाला को कम करने के लिए सबसे ज्यादा 12 महीने कांवर चढ़ाई जाती है। इसलिए यह बाबा वैद्यनाथ की एक अद्भुत लीला है।बोल बम का महत्व
बताया जाता है कि ‘बोल बम’ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के संक्षिप्त नाम से बना है। ‘बोल बम’ बोलने से बाबा वैद्यनाथ अपने भक्तों को कष्टों से रक्षा करते है, मन चहा वरदान प्रदान करते है, पंचाक्षरी मंत्र को ‘ओम नम: शिवाय’ की तरह दो अक्षर का नाम बम। एक महामंत्र है। इस मंत्र से केवल भगवान शंकर ही नहीं ब्रह्मा व विष्णु जी भी प्रसन्न हो जाते है। सारे रास्ते जब कांवरियां प्रेम से बोल बम का नारा लगाते है तो सारा वातावरण ‘बम’ मय हो जाता है। यह ऐसा प्रतीत होता है जैसे सारे शरीर में स्फूर्ति फै ल गई है। कांवरियें भाई एक दूसरे को बम कहकर ही पुकारते है।शिव शब्द की महिमा एवं उनके आठ नाम
भगवान शिव के हजारों नाम हैं परन्तु ज्योतिर्लिंगों की संख्या कुल बारह है। यदि हम शिव के नाम की महिमा पर विचार करने बैठें तो हम देखेंगे कि सृष्टि के प्रत्येक जीव-जन्तु, कंद-पत्थर इत्यादि में भगवान शिव का ध्वास मिलेगा। शिव शब्द दो वर्ण श और व से मिलकर बना है। संसार के किसी भी धर्म के प्राणी का हम नाम लें तो ज्ञात होता है कि उसमें वर्णों की कुल संख्या दो ही है। दो का अर्थ है शिव। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी शिवमय है। आओ इस बात की सच्चाई का पता लगायें।उदाहरण के तौर पर हम एक मुसलमान के नाम पर विचार करें जैसे ‘करीम’। इसमें वर्गों की कुल संख्या क+र+म अर्थात् 3 है। अब
3 को 9 से गुणा करें और गुणनफल को जोड़कर एक अंक बना लें। 3 गुणा 9 = 27, 2 + 7 = 9। अब इसमें एक जोड़कर 5 से भाग करें। भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री बाबा वैद्यनाथ जी हैं और इनके आठ नाम हैं जिनकी महिमा बड़ी निराली है। इनके आठ नाम निम्न प्रकार हैं-
1. आत्मलिंग- माता पार्वती द्वारा इनकी पूजा कैलाश पर्वत पर होती है जिसका उल्लेख शिव पुराण में आया है।
2. माघेश्वर लिंग- इस लिंग का नाम उनके नाम पर माघेश्वर लिंग पड़ा।
3. कामदलिंग- भगवान विष्णु ने इनकी उपासना अभीष्ट सिद्धि के लिए की थी। इसलिए इस लिंग का नाम कामद लिंग पड़ा।
4. रावणेश्वर लिंग- रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। और भगवान शंकर स्वयं भक्तवत्सल हैं इसलिए भगवान वैद्यनाथ रावणेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गए।
5. वैद्यनाथ लिंग- देवताओं के वैद्य श्री अश्विनी कुमार जी एक बार स्वंय बीमार पड़ गए। तीनों लोकों में चिन्ता व्याप्त हो गई। भगवान शंकर की शरण में जाने पर श्री अश्विनी कुमार रोगमुक्त हो गए। तभी से इस ज्योतिर्लिंग का नाम वैद्यो के वैद्य अर्थात् वैद्यलिंग पड़ा।
6. मर्गलिंग- मर्ग का अर्थ होता है सूर्य जैसा प्रकाशवान। चूंकि इसमें चन्द्रकान्त मणि का तेज है इसलिए इन्हें ‘मर्ग’ की संज्ञा मिली।
7. तत्पुरुष- तत्पुरुष का अर्थ होता है- ‘सर्वशक्तिमान,’ ‘सर्वोपरी।’ भगवान वैद्यनाथ हर प्रकार की कामना पूरी करने में समर्थ हैं इसलिए इनका नाम ‘तत्पुरुष लिंग’ पड़ा।
8. वामदेव या बैजूनाथ लिंग- जब कामना ज्योतिर्लिंग की स्थापना भगवान विष्णु द्वारा झारखंड की चिताभूमि में हुई थी तब बैजू नामव्य ग्वाले से भगवान विष्णु ने कहा था कि यदि तुम इस शिवलिंग पर प्रति दिन जल चढ़ाओगे तो तुम्हारी गायें दुगुना दूध देने लगेंगी। बैजू प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा अर्चना करने लगा। भगवान ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहा। बैजू बोला, भगवान! यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं तो अपने साथ मेरा नाम भी जोड़ दीजिए। श्री वैद्यनाथ ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्ध्यान हो गए। तभी से श्री वैद्यनाथ जी का नाम वैद्यनाथ पड़ गया। शिव पुराण में वर्णित एक श्लोक में लिखा है-
ऐतैरस्यमि शम्भु पूजयति यो नमामि:।
तस्मै सर्वे प्रदयात्यत्र वैद्यनाथे ने संशय:।।
उपरोक्त आठ नामों से जो भगवान वैद्यनाथ की पूजा अर्चना करते हैं उनकी हर
मनोकामना वैद्यनाथ पूरी करते हैं। ये अति सूक्ष्म आठ नाम गागर में सागर के
समान हैं, जो अपने आप में एक चमत्कार है और लीलाधर वैद्यनाथ की एक लीला।वैद्यनाथ धाम मंदिर
काफी वर्षों के बाद वैजनाथ नामक एक व्यक्ति को पशु चराते हुए इस शिवलिंग के दर्शन हुए। इसी के नाम से यह ज्योर्तिलिंग वैद्यनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि वैद्यनाथ धाम के मंदिरों का निर्माण देव शिल्पी विश्वर्मा ने किया है। मंदिर निर्माण के विषय में कथा है कि मंदिर बनाते समय जब देवी पार्वती के मंदिर का निर्माण विश्वकर्मा कर रहे थे। उस समय अचानक दिन निकल आने के कारण विश्वकर्मा को निर्माण कार्य बंद कर देना पड़ा जिससे पार्वती का मंदिर विष्णु एवं शिव के मंदिर से छोटा रह गया। इस मंदिर के प्रांगण में गंगा मैया, भैरव नाथ सहित कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं। मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन कुआं भी है।वैद्यनाथ धाम देवघर यात्रा
वैद्यनाथ धाम में यूं तो साल भर लोग शिव के नवम ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए आते हैं, किन्तु सावन एवं अश्विन मास में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुंचती है। यहां आने वाले श्रद्धालु भक्तों को ‘बम’ के नाम से पुकारा जाता है।देवघर कांवड़ यात्रा
देवघर में कांवड़ चढ़ाने का बड़ा ही महत्व है। श्रद्धालु भक्त सुल्तानगंज से गंगा का जल लेकर लगभग 106 किलोमीटर की दूरी की पैदल यात्रा करते हुए देवघर बाबाधाम की यात्रा करते हैं। रास्ते में कई धमर्शाला हैं जहां वह विश्राम करते हुए अपनी यात्रा पूरी करते हैं। कांवड़ चढ़ाने वाले इन बमों को सामान्य बम कहा जाता है। यह रास्ते भर बोल बम-बोल बम का नारा लगाते हैं।डाक बम
कुछ लोग सुल्तान गंज से गंगाजल लेकर डाकबम बनकर 24 घंटे में 106 किलोमीटर की दूरी तय कर बाबा के धाम पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं।दंड प्रणाम करने वाले बम
कुछ लोग अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए अपने घर से ही दंड प्रणाम करते हुए देवघर की यात्रा करते हैं। इनकी यात्रा काफी कष्टकारी एवं लंबी होती है।देवघर का महात्म्य
बाबा भोले नाथ अनाथों के नाथ हैं। यह औघड़ दानी कहे जाते हैं। श्रद्धा पूर्वक जो भी इनके द्वार पर पहुंचता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। कुछ लोग यहां अपनी मनोकामना मांगने आते हैं तो कुछ अपनी मनोकामनापूर्ण होने पर शिव का आभार प्रकट करने यहां आते हैं। बाबा वैद्यनाथ की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होती है। जिन कन्याओं की शादी में बाधा आ रही होती है, उसे शिव के इस द्वार पर कांवड़ चढ़ाने से उनकी शादी में आने वाली बाधा टल जाती है और जल्दी उनकी शादी हो जाती है। बाबा गरीबों की झोली भरते हैं। रोगी को रोग से मुक्ति देते हैं।देवघर का प्रसाद
बाबा वैद्यनाथ के मंदिर के चारों तरफ बाजार है जहां चूड़ा, पेड़ा, चीनी का बना ईलायची दाना, सिंदूर, माला आदि मिलता है। लोग प्रसाद स्वरूप इन चीजों को खरीदकर अपने घर ले जाते हैं। यहां से कुछ किलोमीटर दूर वासुकीनाथ के रास्ते में घोड़मारा नामक स्थान हैं जहां का पेड़ा अति स्वादिष्ट होता है। आप बाबाधाम की यात्रा करते समय अपने परिवार एवं कुटुम्ब के लिए प्रसाद के तौर पर यहां से पेड़ा खरीद सकते हैं।वासुकीनाथ देवघर
भगवान भोलेनाथ के गले में नाग की माला शोभा पाती है। नाग शिव का अभूषण है। शिव का सान्निध्य नागों को इसलिए प्राप्त है क्योंकि, वह शिव के उपासक माने जाते हैं। देवघर से लगभग 42 किलोमीटर दूर झारखंड प्रांत के दुमका जिले में स्थित भगवान शिव का मंदिर इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो नागराज वासुकी के नाम पर वासुकीनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। वासुकीनाथ का मंदिर भी वैद्यनाथ धाम मंदिर के समान ही आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र है। जिस प्रकार वैष्णों देवी के दर्शन के बाद भैरोनाथ का दर्शन किये बगैर यात्रा अधूरी मानी जाती है उसी तरह वैद्यनाथ धाम की यात्रा के बाद वासुकी बाबा का दर्शन आवश्यक माना जाता है।वासुकीनाथ से जुड़ी कथाएं
वासुकी नाथ से जुड़ी एक कथा है कि सागर मंथन के समय शिव ने नागराज वासुकी की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी भक्ति का आशीर्वाद दिया था। दंत कथाओं में कहा जाता है कि यह शिव लिंग नागराज वासुकी द्वारा स्थापित है। वर्षों पहले रात्रि के समय नाग इस शिवलिंग की पूजा किया करते हैं। रात्रि के समय बड़ी संख्या में नाग यहां आकर शिव जी को दुग्ध स्नान कराते थे। बाद में लोगों को जब इस स्थान का पता चला तब यहां वासुकी नाथ का मंदिर बनवाया गया। वासुकी नाथ से जुड़ी एक दूसरी कथा है कि इस क्षेत्र में एक शुद्र को कुष्ठ रोग हुआ। उसने रोग से मुक्ति के लिए शिव की उपासना की। शिव जी ने उसकी उपासना से प्रसन्न होकर उसे स्वप्न में बताया कि वासुकी नाथ के पंडित को अपने घर भोजन पर आमंत्रित करो। उनके भोजन करने से तुम्हें रोग से मुक्ति मिलेगी। स्वप्न में शिव के संदेश के अनुसार शुद्र पंडित के पास शिव का संदेश लेकर पहुंचा। पंडित ने उनके यहां भोजन करने से मना कर दिया। अगले दिन शिव जी ने पंडित से कहा कि वह शुद्र मेरा भक्त है अत: उसके घर भोजन करके उसे रोग से मुक्त होने में सहायता प्रदान करो। पंडित ने शिव जी से इस कार्य के लिए मना कर दिया। इस पर क्रोधित होकर शिव जी ने पंडित को भी कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। पंडित शिव जी के श्राप से कुपित हो गया और उन्होंने आवेश में आकर शिव को श्राप दे दिया कि उनके ऊपर भी वज्रपात होगा। शिव जी के श्राप से पंडित को कुष्ट रोग हो गया तथा पंडित के श्राप से शिव जी पर व्रजपात हुआ जिससे शिवलिग खंडित हो गया। इस घटना के बाद पंडित को काफी दु:ख हुआ कि उनके श्राप के कारण उनके भगवान को कष्ट उठाना पड़ा। पंडित ने इसके बाद शुद्र के घर भोजन करना स्वीकार किया. वहां की महारानी ने खंडित शिवलिंग को चांदी से मेढ़वा दिया।कांवरियों हेतु आवश्यक निर्देश
आवश्यक सामग्री-1. कांवर
2. दो जल पात्र
3. अगरबत्ती का पैकेट एवं दियासलाई
4. एक थैला
5. एक दरी व दो चादर
6. एक प्लास्टिक का टुकड़ा
7. टार्च एवं मोमबत्ती
8. एक तौलिया
नियम:
1. ब्रह्माचर्य का पालन करना।
2. मन, वचन, बुद्धि को शुद्ध रखते हुए भोले शंकर का स्मरण करते रहना।
3. सदा सत्य बोलना।
4. परोपकार एवं सेवा भावना रखना।
5. कांवर उठाने से पहले शौच, स्नान एवं भोजन से निवृत्त होना।
6. बम बम का नारा लगाना।
7. तेल, साबुन का प्रयोग वर्जित है।
8. जूते पहनना निषेध है।
9. कुत्ते से बचकर चलना चाहिए।
मार्ग विवरण
सुल्तान गंज से वैद्यनाथ धाम की दूरी का विवरण-
1. बाबा अजगैबी धाम से कमराय 6 किमी.
2. कमराय से मासूम गंज की दूरी 2 किमी.
3. मासूम गंज से असरगंज (धर्मशाला) 5 किमी.
4. असरगंज धर्मशाला से रणगांव धर्मशाला 5 किमी.
5. रणगांव से तारापुर 3 किमी.
6. तारापुर से माधोडीह 2 किमी.
7. माधोडीह से रामपुर धर्मशाला 5 किमी.
8. रामपुर से कुमरसार धर्मशाला 8 किमी.
9. कुमरसार से विश्वकर्मा टोला 4 किमी.
10. विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर 3 किमी.
11. महादेव नगर से चन्दन नगर 3 किमी.
12. चन्दन नगर से जिलेबिया मोड़ धर्मशाला 8 किमी.
13. जिलेबिया मोड़ से टगेश्वर नाथ 5 किमी.
14. टगेश्वर नाथ से सुइया धर्मशाला 3 किमी.
15. सुइया से शिवलो 2 किमी.
16. शिवलोक से अबरखिया धर्मशाला 6 किमी.
17. अबरखिया से कांवरिया धर्मशाला कोटरिया 8 किमी.
18. कांवरिया कोटरिया धर्मशाला से लक्ष्मण झूला 8 किमी.
19. लक्ष्मण झूला से इनावरण धर्मशाला 8 किमी.
20. इनावरण से भूलभुलैया नदी 3 किमी.
21. भूलभुलैया नदी से गोरयारी धर्मशाला 5 किमी.
22. गोरयारी से पटनिया धर्मशाला 5 किमी.
23. पटनिया धर्मशाला से कलकतिया धर्मशाला 3 किमी.
24. कलकतिया धर्मशाला से भूतबंगला 5 किमी.
25. भूतबंगला से दार्शनिया 1 किमी.
26. दार्शनिया से शिवगंगा बाबा मन्दिर की दूरी 1 किमी.
बाबा वैद्यनाथ धाम से प्रमुख धर्मशालाएं एवं होटल में ठहरने का स्थान
1. बसवाल धर्मशाला, कचहरी रोड
2. हरी धर्मशाला, मंदिर पथ में
3. कनोडिया धर्मशाला, गंगातट पर
4. केकैयी धर्मशाला
5. मारवाड़ी धर्मशाला, स्टेशन के पास
6. मारवाड़ी कांवर संघ.
7. बंगाली धर्मशाला, स्टेशन के पास
8. पाठक धर्मशाला, मंदिर के पास
9. गजाधर धर्मशाला, मानसरोवर के पास
10. कबूतर धर्मशाला, सब्जी बाजार
11. अग्रहरि धर्मशाला, सागढ़ी
12. केसरवानी आश्रम, श्यामगंज रोड
13. होटल यांत्रिक, टावर के निकट
14. होटल बसेरा टावर के निकट
15. होटल वैद्यनाथ, श्री दिगम्बर जैन मन्दिर मार्ग
16. होटल इन्द्रजाल, टावर के निकट
17. होटल भारती, जलसार रोड
18. होटल सरिता, जलसार रोड
19. होटल विजया, जलसार रोड
20. होटल रम्भा, जलसार रोड
21. होटल बाबाधाम, एस,एस,एस जलान रोड
22. होटल सुविधा, पालिका बाजार
23. होटल ग्रैण्ड, स्टेशन रोड
24. होटल ज्योति, मुख्य डाकघर के पीछे
25. होटल गुप्ता, जलसार रोड
26. होटल सम्राट, मारवाड़ी कांवर संघ के पास
27. होटल ड्रीमलैण्ड, विलियम्स टाउन
29. टूरिस्ट बंगला ने 1. बालक बालिका कॉलेज के पश्चिम में
Thursday, September 6, 2012
आगे-आगे ब्राह्मण
एक था ब्राह्मण और एक था बाबा। दोनों एक साथ यात्रा पर चले। गरमी का मौसम था। ऐन दोपहर का समय। दोनों को प्यास लगी, पर आसपास कहीं पानी था नहीं। भूख भी लगी थी। भूख-प्यास के बारे में सोचते-सोचते दोनों आगे बढ़े। रास्ते में एक बनिया मिला। बनिया भी भूखा-प्यासा था।
तीनों ने मिलकर तय किया कि चलें और कुछ मेहनत करें। जो भी मिल जाये, बराबरी से बाट लें। चलते-चलते रास्ते में गन्ने का एक खेत मिला। पहले ब्राह्मण खेत में पहुंचा और बोला, "नारायण, नारायण!"
गन्ने वाले किसान ने कहा, "पता नहीं, ये बम्मन-फम्मन कहां से चले आते हैं? यहां कोई भण्डार भरा है कि देते ही चले जायं!"
ब्राह्मण की टेर खाली गई और वह लौट आया।
बाद में बाबाजी खेत में पहुंचकर बोले, "अलख निरंजन! अलख निरंजन!" सुनकर किसान बोला, "अरे, इन बाबा-बैरागियों की तो कोई गिनती ही नहीं रही! किन-किन को दें और कितना दें!" बाबाजी भी खिसियाकर
लौट आए। अब बनिये की बारी आई। बनिया गन्ने के खेत में पहुंचा और किसान ने पूछा, "कहिए, पटेलबाबा! गुड़ बिकाऊ है?"
किसान बोला, "आइए, सेठजी! कितना गुड़ लेना है?"
बनिये ने कहा, "यही कोई सौ मन ले लेंगे।"
किसान बोला, "आइए, आइए, हम भाव तय कर लें।"
किसान और सेठ ने मिलकर भाव तय कर लिया और गुड़ तुलवाने का दिन भी ठहरा लिया। सबकुछ निपटा देने के बाद बनिये ने विदा ली। लेकिन कुछ ही देर बाद बनिया लौटा और बोला, "पटेलबाबा! यह जो सौदा तय हुआ, इसका कुछ बयाना तो दो!"
पटेल ने बीस बढ़िया गन्ने उखाड़कर बनिये को सौंप दिए। अब बंटवारे का काम शुरू हुआ। सबको बराबर-बराबर तो मिलना ही चाहिए।
लेकिन बनिये ने एक तरकीब सोच ली थी। वह अपने-आप बांटने बैठा। कुछ सोचने का-सा दिखावा करके बनिये ने कहा, "सुनो भैया! शास्त्र में लिखा है कि आगे-आगे ब्राह्मण। इसलिए ब्राह्मण को तो हमें आगे का ही हिस्सा देना चाहिए।"
यह कहकर बीसों गन्नों का ऊपर वाला हिस्सा काटकर ब्राह्मण को सौंप दिया। ब्राह्मण ने अपना हिस्सा खुशी-खुशी ले लिया।
फिर बनिये ने कहा, "नन्द सो कन्द! शास्त्र में कहा है कि बनिये को बीच का हिस्सा देना चाहिए।"
यह कहकर गन्नों के बीच वाले टुकड़े बनिये ने रख लिये।
अब गन्नों का निचला हिस्सा बचा।
बनिये ने कहा, "दाढ़ी सो फन्द! शास्त्र का वचन है कि बाबाजी को तो जड़ वाला हिस्सा ही देना चाहिए।"
बनिये ने बीच का बढ़िया हिस्सा अपने लिए रख लिया और ब्राह्मण को और बाबाजी को भी खुश कर दिया।
सब खुश होकर अपने-अपने घर चले गए।
चार चुहियां
चार चुहिया थीं। चारों आपस में सहेलियां थीं। एक रहती थी चक्की में, एक रहती थी दुकान में, एक रहती थी बाट में और एक रहती थी खेत में।
एक बार एक किसान अपनी बैलगाड़ी लेकर खेत पर जा रहा था। रास्ते से जाते समय बाट में रहने वाली चुहिया बैलगाड़ी के पहिये से कुचल गई और ऐसी कुचली कि गाड़ी के पहिए से चिपककर रह गई। गाड़ी खेत पर पहुंची। जब किसान गाड़ी में घास में पूले जमा रहे था, तभी खेत में रहने वाली चुहिया ने गाड़ी के पहिये से चिपकी चुहिया को देख लिया। उसने किसान के हाथ संदेसा भेजा:
ओ, किसान भैया
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई हैं।
सुनकर किसान चौंका। बोला, "अरे यहां यह कौन बोल रहा है? कोई आदमी तो यहां है नहीं।
इतने में चुहिया फिर बोली:
ओ, किसान भैया,
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई हैं।
किसान ने चारों तरफ देखा, बार-बार देखा, पर कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ा। किसान डर गया और अपनी बैलगाड़ी और पूले छोड़कर भाग खड़े हुआ।
घर आकर वह बनिये की दुकान पर तेल ख़रीदने गया। उसी दुकान में वह चुहिया भी रहती थी। तेले लेते-लेते किसान बोला, "सेठजी! आज तो गज़ब हो गया!"
सेठ ने पूछा, "क्या हो गया?"
किसान बोला, " मैं गाड़ी में पूले भर रहा था तभी खेत में से कोई बोला:
ओ, किसान भैया,
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई है।
दुकानवाली चुहिया अपने बिल में बैठी यह बात सुन रही थी। उसने बिल में से ही पूछा, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?"
सेठ और किसान दोनों एक साथ बोले, "अरे! यह कौन बोला?"
इतने में दुकानवाली चुहिया ने फिर पूछा, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?"
किसान बोला, "सेठ, भागो, भागो, भागो! इस दुकान में भी कोई है।" बस, सेठ और किसान दोनों दुकान सूनी छोड़कर भाग खड़े हुए।
घर पहुंचकर किसान ने अपनी घरवाली से कहा, "तुमने कुछ सुना? आज तो बस गज़ब ही हो गया। खेत में बैलगाड़ी खड़ी करके मैं उसमें पूले भर रहा था, तभी कोई बोला:
ओ, किसान भैया,
ओ पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई है।
मैं तो इतना डर गया कि गाड़ी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। अभी दुकान पर तेल ख़रीदने गया, तो वहां भी यही अनुभव हुआ। मैं सेठजी से कह रहा था कि आज खेत में कोई ऐसी-ऐसी बात कह रहा था। बात सुनकर मैं तो डरके मारे भाग निकला। उसी समय दुकान में से कोई बोला, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?’ दुकान में दूसरा कोई था नहीं। हम तो वहां से भाग आये। लगता है, जरूर कोई हमारे पीछे पड़ा है!"
इतने में चक्की वाली चुहिया चक्की की झाड़ू और सूप माथे पर रखकर बाहर आईं और आगंन में बैठकर बोली, "भैया! तुमको यह संदेसा किसने दिया था? मेरी बाटवाली सहेली मर गई और खेतवाली सहेली ने दुकानवाली और चक्कीवाली सहेली का संदेसा भेजा! हाय, हाय! ग़ज़ब हो गया!"
किसान चौंका। बोला, "बापरे बाप! यह तो खेत में रहने वाली चुहिया बोली थी। मैं बेकार ही डरा और भागा।"
किसान की घरवाली ने कहा, "आप तो बस, ऐसे ही हैं। चुहिया से भी डर जाते हैं।"
दो बाघ दो बाघिन
एक थे मियांजी। एक दिन वह सफर पर निकले। बीवी ने बड़े प्रेम से पराठे बना दिए। पराठों की पोटली बगल में दबाकर मियांजी चल पड़े। रास्ते में एक काठी का साथ हो गया। दोनों साथ-साथ चलने लगे। कुछ दूर जाने पर मियांजी ने पूछा, "भैया! आपका नाम क्या है?"
काठी बोला, "मियांसाहब, मेरा नाम तो बाघजी है।"
मियांजी मन-ही-मन बोले, ‘दुष्ट काठी मुझको डरा रहा है।’
इसी बीच काठी ने पूछा, "मियांसाहब, आपका नाम क्या है?"
मियां ने कहा, "मेरा नाम? मेरा नाम तो है दो बाघ, दो बाघिन, ऊपर दो-दो फू-फू और उन पर बिच्छू का टोकना।"
काठी समझ गया कि मियांजी कोरी डींग हांक रहे हैं! ठीक है, जब मौक़ा पड़ेगा, तो पता चल जायगा।
चलते-चलते रास्ते में बबूल की घनी झाड़ी आई। वहां बाघों और भेड़ियों को बड़ा डर था।
मियांसाहब बोले, "देखो भैया! साथ में रहना। यह घनी झाड़ी है। मुझे तो डर लगने लगा है।"
काठी ने कहा, "मियांजी, आप डरिये मत। मेरे साथ चले चलिए।"
काठी को पता चल गया कि मियांजी कितने बहादुर हैं। दोनों कुछ दूर आगे चले।
काठी ने हंसकर पूछा, "मियांजी! अपना नाम तो एक बार फिर बता दीजिए। मैं तो उसे भूल ही गया हूं।"
मियांजी कुछ नरम तो पड़ ही चुके थे, फिर भी थोड़े तनकर बोले, "मेरा नाम है—दो बाघ, दो बाघिन, ऊपर दो-दो फू-फू और उन पर बिच्छू का टोकना!
काठी ने कहा, "नाम तो आपका बड़ा ही बहादुरी-भरा है!"
इतने में दूर का एक बाघ दिखाई पड़ा। वह सो रहा था।
काठी ने कहा, "देखिए, वह बाघ सो रहा है।"
मियां बोले, "क्या कहा, बाघ है! तब तो हम मर गए। ओ खुदा!"
काठी ने कहा, "मियांजी! आप तो दो बाघ है, दो बाघिन, ऊपर दो-दो फू-फू और उन पर बिच्छू का टोकना-वोकना कुछ हैं न?"
मियां बोले, "अरे भैया! मैं न तो टोकना हूं, और न वोकना हूं। मैं तो बस, तुम्हारी गाय हूं। तुम मुझे इससे बचा लो। भैया! मेरा असल नाम तो मियां फुसकी है।"
इसी बीच बाघ उठ खड़ा हुआ और इनकी ओर झपटा। काठी ने अपनी तलवार के एक वार से बाघ को वहीं ढेर कर दिया। मियां तो उल्टे पैरों न जाने कितनी दूर भाग गए। बाद में दोनों फिर इकट्ठे हुए और आगे चलने लगे। रास्ते में एक नदी मिली। दोनों ने कहा, "अब हम यहां खाना खा लें।"
काठी तो बेचारा ग़रीब था। उसकी चादर के छोर में ज्वार की रोटी और मिर्च बंधी थी। उसे खोलकर वह खाने बैठा। मियांजी अच्छी हैसियत वाले थे और उनकी बीवी ने उनके लिए बढ़िया पराठे बनाकर रख दिये थे।
काठी ज्वार की रोटी चबाता था, बीच-बीच में मिर्च का टुकड़ा खा लेता था और पानी की मदद से रोटी के कौर गले के नीचे उतारता जाता था। मियांजी मौज के साथ पराठे खाते जाते थे और अपनी घरवाली की तारीफ़ करते जाते थे। काठी बेचारा देखता रहा। और करता ही क्या!
इसी बीच मियांजी बोले, "भैया, बाघजीभाई! आप यह क्या खा रहे हैं, और बीच-बीच में इतना पानी क्यो पी रहे हैं?"
काठी ने मन-ही-मन कहा, ‘हां, अब अच्छा मौक़ा मिला है।’
वह बोला, "मियांजी! यह तो मैं घटकमेवाला खा रहा हूं।"
मियां ने कहा, "यह घटकमेवाला तो हमने कभी खाया ही नहीं। सुनो बाघजीभाई! ये मेरे पराठे आप ले लो और अपना घटकमेवाला मुझे दे दो।",
दोनों ने आपस में अपना खाना बदल लिया। काठीभाई समझ गए कि उनको क्या खाना है। जैसे ही मियां के पराठे उनके हाथ में आए, वे उन्हें झटपट चटकर गए और पानी पीकर अपने पेट पर हाथ फेरने लगे।
उधर मियांजी घटकमेवाला खाने लगे। लेकिन ज्वार की सूखी रोटी और मिर्च उनके गले के नीचे कैसे उतरती? मियांजी ने बड़ी मुश्किल के साथ घूंट-घूंट पानी पीकर रोटी के दो-तीन कौर अपने गले के नीचे उतारे। बाद में मियां बोले, "काठीभैया! यह अपना घटकमेवाला तो आप अपने ही पास रखो, और मुझको मेरे पराठे लौटा दो।"
काठी ने कहा, "मियांजी, आपके पराठे तो अब मेरे पेट में पहुंच चुक हैं। आपको घटकमेवाला खाना हो, तो खा लो, नहीं तो नदी में बहा दो।"
सुनकर मियांजी का मुंह उतर गया और वे लौट पड़े।
मियांजी ने अपना रास्ता पकड़ा और काठीभाई अपने रास्ते चल दिए।
मोर और मोरनी
एक मोर था और एक मोरनी थी। दोनों दाने चुग रहे थे। इसी बीच वहां एक खेरा आया। खेरे को देखकर मोरनी ने कहा:
मैं ब्याती हूं जाल में,
मुझे डर किसका।
मोर तो बहुत सुन्दर है,
पर खेरा मेरे बस का।
यह कहकर मोरनी तो खेरे के साथ चली गई। मोर को बहुत बुरा लगा। उसने कहा, "मैं पक्षियों की पंचायत इकट्ठी करूंगा और उनसे न्याय करवाऊंगा।"
मोर चल पड़ा। रास्ते में उसे मुर्गा मिला।
मुर्गे ने पूछा, "मोर भैया, मोर भैया! कहां जा रहे हो?"
मोर ने कहा, "मोरनी खेरे के साथ चली गई है। पक्षियों की पंचायत बुलानी है। तुम भी आओगे न?"
मुर्गा बोला:
हम तो बड़-बड़ करते रहते हैं,
रंग हमारा भूरा है।
जबसे मोरनी गई है खेरे के घर,
खाया नहीं है हमने पेट भर।
मुर्गा मोर के साथ नहीं गया। मोर कुछ आगे बढ़ा तो उसे बया पक्षी मिला।
बया ने पूछा, "मोर भैया, मोर भैया! कहां जा रहे हो?"
मोर ने कहा, "मोरनी खेरे के साथ चली गई है। पक्षियों की पंचायत बुलानी है। तुम भी आओगे न?"
बया बोला:
हम तो बया कहलाते हैं,
कौन हमारी बराबरी कर सकता है?
जो अपनी औरत को बस में रखता है,
उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है?
इसलिए भैया, मैं तो नहीं आऊंगा।"
उदास चेहरा लेकर मोर बेचारा आगे बढ़ा। रास्ते में उसे एक तीतर मिला।
तीतर ने पूछा, "मोर भैया, मोर भैया! कहां जा रहे हो?"
मोर ने कहा, "मोरनी खेरे के साथ चली गई हैं। पक्षियों की पंचायत बुलानी है। झगड़ा मिटाने के लिए तुम भी आ रहे हो न?"
तीतर बोला:
हम तो तीतर कहलाते हैं,
हमारे सिर पर बड़ा काम है।
मोर भैया, मुझे फुरसत नहीं है,
मुझे करने हैं मेरे बेटे के लगनां।
मोर भैया आगे बढ़े और बगुला भैया के पास पहुंचे।
बगुले ने पूछा, "मोर भैया, मोर भैया! कहां जा रहे हो?"
मोर ने कहा, "मोरनी खेरे के साथ चली गई है। पक्षियों की पंचायत बुलानी है। भैया, थोड़ा समय निकालकर तुम भी आओ न?"
बगुला बोला:
हम बगुला कहलाते हैं,
गरदन हमारी टेढ़ी है।
तुम्हारा झगड़ा तुम जानो,
हमारे झगड़े से छुट्टी ले ली है।
मोर ने सोचा, ‘चलूं, अब मैं बाज के पास चलूं। बाज झगड़ा निपटा देगा।’
मोर आगे बढ़ा तो रास्ते में ही बाज मिल गया।
बाज ने पूछा, "मोर भैया! कहां जा रहे हो?"
मोर ने कहा, "मोरनी खेरे के साथ चली गई है। पक्षियों की पंचायत बुलानी है। पर कोई आता ही नहीं है। बाज भैया, तुम तो आओगे न?"
बाज बोला:
हम तो बाज कहलाते हैं,
सिर हमार गंजा है।
पक्षियों की सरकार कहे,
तो मैं खेरे का सिर तोड़ दूं।
बाज की बात सुनकर मोर खुश हो गया। बाज को अपने साथ लेकर मोर, तीतर, बया, बगुला सबके पास पहुंचा। पक्षियों की पंचायत बैठी। सबने बाज को खेरे को पेश करने का हुक्म दिया। बाज ने खेरे के कान पकड़े और उसे सबके सामने हाजिर कर दिया।
सबने कहा, "खेरा भैया, इस मोर को इसकी मोरनी दे दो।"
खेरा बोला, "मैं नहीं दूंगा।"
सबने कहा, "बाज भैया, इस मोर को इसकी मोरनी दिला दो।",
बाज बोला:
मैं तो बाज कहलाता हूं,
सिर मेरा गंजा है।
मोर को मोरनी दे दो,
नहीं तो तेरा सिर फोड़ दूंगा।
यह कहकर बाज खेरे के पीछे दौड़ा।
खेरा डरकर बोला, "भैया, लो, यह मोरनी। मैं मोर को दिये देता हूं।"
मोर को मोरनी मिल गई और पक्षियों की पंचायत बिखर गई।
लिखे के बाहर
एक बनिया था। भला था। भोला था, कुछ अलग-भला और कुछ पागल-सा था। एक छोटी-सी दुकान चलाता था। दाल, मुरमुरे, रेवड़ी जैसी चीज़ें बेचता था और शाम तक पेट के लायक कमाई कर लेता था।
एक दिन रात को दुकान बन्द करके वह अपने घर जा रहा था, तभी रास्ते में उसको कुछ चोर मिले। बनिये ने चोरों से पूछा, "इतनी रात-बीते आप लोग कहां जा रहे हैं? आप कौन हैं?"
चोर बोले, "भैया, हम तो व्यापारी हैं। आप हमें क्यों टोक रहे हैं?"
बनिये ने कहा, "लेकिन भाइयों, इतनी रात बीतने के बाद आप जा कहां रहे हैं?"
चोर बोले, "हम माल खरीदने जा रहे हैं।"
बनिये ने पूछा, "माल नक़द खरीदेंगे या उधार?"
चोर बोले, "न नक़द न उधार। पैसे तो देने ही नहीं हैं।"
बनिये ने कहा, "आपका यह व्यापार तो बहुत बढ़िया है। क्या आप मुझको अपने साथ ले चलेंगे?"
चोर बोले, "चलिए आप भी चलिए। आपको भी फ़ायदा ही होगा।"
बनिये ने कहा, "बात तो ठीक है। लेकिन पहले यह तो समझाइए कि यह व्यापार किस तरह किया जाय?"
चोर बोले, "सुनो, कागज़ पर लिख लो—किसी के घर के पिछवाड़े..."
बनिये ने कहा, "लिख लिया।"
चोर बोले, "लिखो—चुपचाप सेंध लगाना..."
बनिये ने कहा, लिख लिया।"
चोर बोले, "लिखो—फिर दबे पैरों घर में घुसना..."
बनिये ने कहा, "लिख लिया।"
चोर बोले, "लिखो—जो भी लेना हो, सो इकट्ठा करना..."
बनिये ने कहा, "लिख लिया।"
चोर बोले, "लिखो—न तो घर-मालिक को पूछना और न उसे पैसे देना..."
बनिये ने कहा, "लिख लिया।"
चोर बोले, "लिखो—जो भी माल मिले, लेकर घर पहुंच जाना।"
बनिये ने सारी बातें काग़ज पर लिख लीं और लिखा हुआ काग़ज जेब में रख लिया। बाद में सब चोरी करने चले। चोर एक घर में चोरी करने गये और बनिया दूसरे घर में चोरी करने पहुंचा। वहां उसने दियासिलाई जलाई और काग़ज पर लिखी बातें पढ़ लीं। कागज पर लिखा था:
किसी के घर के पिछवाड़े,
चुपचाप सेंध लगाना।
दबे पैरों में घुसना,
जो भी लेना हो, सो इकट्ठा करना।
न तो घर-मालिक को पूछना,
और न उसे पैसे ही देना।
जो भी माल मिले, लेकर घर पहुंच जाना।
बनिये ने ठीक वही किया, जो कागज में लिखा था। पहले पिछवाड़े सेंध लगाई, फिर दबे पैरों घर में घुसा, फिर दियासलाई जलाकर दीया जला लिया। फिर एक थैला खोजकर उसमें पीतल के छोटे-बड़े बरतन बड़ी बेफिकरी के साथ रखने लगा। रखते-रखते एक बड़ा तसला उसके हाथ से नीचे गिरा और सारा घर उसकी आवाज से गूंज उठा। आवाज़ सुनकर घर के सब लोग जाग गए।
सबने ‘चोर, चोर’ चिल्लाकर बनिये को पकड़ लिया और सब उसे मारने-पीटने लगे। बनिया तो गहरे सोच में पड़ गया। मार खाते-खाते उसने अपनी जेब मे रखा कागज निकाला और उसे जैसे-तैसे पढ़ डाला। फिर तो वह जोश में आ गया। जब सब लोग मारते-पीटते ही गये तो बनिया बोला:
भाइयों, यह तो लिखे के बाहर है,
भाइयो, यह तो लिखे के बाहर है!
बनिये की बात सुनकर सब सोच में पड़ गए। मारना-पीटना रोककर सबने पूछा, "यह तुम क्या कर रहे हो?"
बनिये ने कहा, "लीजिए, यह कागज देख लीजिए। इसमें कहीं मार खाने की बात लिखी है? आप तो यह लिखे के बाहर की बात कर रहे हैं।"
फिर तो घर के लोग सबकुछ समझ गये, और उन्होंने बनिये को अपने घर से बाहर निकाल दिया।"
बनिया और कौआ
एक कौआ था। वह रोज बनिये के बेटे के हाथ से पूड़ी छीनकर ले जाता था। उसने कौए को सबक सिखाने की सोची।
एक दिन बनिये ने अपने मुंह में दही भर लिया और वह गांव के बाहर खड़े बरगद के पेड़ के नीचे जाकर ऐसे लेट गया। मानो वह मर गया है। तभी वह कौआ उड़ता-उड़ता वहां आ पहुंचा कौए ने सोचा, यह बनिया तो मर गया है। इसलिए अब मैं इसके मुंह मे रखा हुआ दही खा लूं।’
जैसे ही कौए ने बनिए के मुंह में अपनी चोंच डाली, वैसे ही बनिये ने अपना मुंह जोर से बन्द कर लिया और कौए की चोंच को मजबूती से दबाया। कौए ने सोचा कि अब इससे छूट निकलने की कोई तरकीब खोजनी होगी। कौए ने बनिये से पूछा, "कौन, नन्दू काका हैं?"
बनिये ने विचार किया कि अगर जवाब दूंगा तो मुंह खुल जाएगा और कौआ उड़ जायगा। इसलिए जोर से दांत दबाकर बोला, "हूं...काका...हूं...।" इससे कौए की चोंच बुरी तरह दबी और कौआ अधमरा-सा हो गया!
फिर बनिये ने सोचा, ‘कौए को काफी सजा मिल चुकी है, इसलिए अब इसे छोड़ देना चाहिए।" उसने कौए को छोड़ दिया। इसके बाद कौआ बनिये के बेटे के हाथ से पूड़ी छीनना ही भूल गया।
ठण्डा टपका
एक बुढ़िया थी। वह एक झोपड़ी में रहती थी। बारिश के दिन थे। पानी बहुत बरसा। बुढ़िया की झोपड़ी में पानी चारों तरफ टपकने लगा और जगह-जगह पानी के गड्ढे भर गए।
एक दिन की बात है। रात को एक सिंह बुढ़िया की झोपड़ी के पिछवाड़े छिपकर खड़ा था। उसी समय बुढ़िया के पैर में ठोकर लगने से वह गड्ढे में गिर पड़ी। उसके कपड़े भीग गए। उसे ठण्ड लगने लगी। बुढ़िया बोली:
मैं शेर से नहीं डरती।
मैं बाघ से नहीं डरती।
मैं तो इस ठण्डे टपके से डरती हूं।
बुढ़िया की यह बात सुनकर सिंह सोचने लगा, ‘यह बुढ़िया शेर से नहीं डरती, बाघ से नहीं डरती और ठण्डे टपके से डरती है, तो वह ठण्डा टपका कैसा होगा?’
इतने में बुढ़िया की पीठ पर पानी की एक बड़ी-सी बूंद पड़ी। बुढ़िया परेशान होकर बोली:
मैं शेर से नहीं डरती।
मैं बाघ से नहीं डरती।
मैं तो इस ठण्डे टपके से डरती हूं।
बुढ़िया के मुंह से फिर वही बात सुनकर सिंह घबराया और ठण्डे टपके से बचने के लिए अपनी पूंछ उठाकर जंगल की तरफ दौडा।
रास्ते में उसे बरगद का एक पेड़ मिला। एक बन्दर थर-थर कांपता हुआ बरगद की एक डाल पर बैठा था। नीचे, बरगद के तने की आड़ मे, रात में रास्ता भूला हुआ एक मुसाफिर लेटा था।
सिंह को दौड़ता हुआ देखकर बन्दर ने पूछा, "सिंह भैया! जंगल के राजा होकर भी आज आप थर-थर कांपते हुए किधर दौड़े जा रहे है?"
सिंह ने कहा, "भैया! मैं तो ठण्डे टपके से डर रहा हूं, एक बुढ़िया कह रही थी: मैं शेर से नहीं डरती।
मैं बाघ से नहीं डरती।
मैं तो इस ठण्डे टपके से डरती हूं।
बुढ़िया की यह बात सुनकर मैं तो अपनी जान लेकर भाग खड़ा हुआ।"
सिंह की बात सुनकर बन्दर भी बहुत डर गया।
पेड़ के पास सिंह को खड़ा देखकर पेड़ के नीचे लेटे आदमी को डर लगा कि कहीं यह सिंह मुझे खा न ले। इसलिए उसने फुर्ती के साथ पेड़ पर चढ़ जाने का विचार किया। ज्योंही पेड़ की डाल पकड़कर वह पेड़ पर चढ़ने लगा कि, उसके एक हाथ में बन्दर की लटकती हुई ठण्डी- ठण्डी पूंछ आ गई। पूंछ के पकड़ते ही वह जोर से चौंका और यह मानकर कि ठण्डा टपका पहुंचा है, वह ज़ोर से चीखा और पेड़ पर से नीचे कूदा। आदमी के हाथ से पूंछ फिसल गई और एक धमाके की आवाज के साथ वह भी नीचे आ गिरा। जब बन्दर चीखा और आदमी धम्म-से नीचे गिरा, तो सिंह ने समझा कि ठण्डा टपका आ
पहुंचा है, उसने बन्दर को पकड़ लिया है। यह देखकर सिंह बहुत घबरा उठा और रात के अंधेरे में दौड़ता-दौड़ता बहुत दूर निकल गया।
उसी रात एक किसान की बकरी खो गई थी। किसान उसे खोजता हुआ जंगल मे घूम रहा था। अंधेरे मे सिंह उसके साथ टकरा गया टकराते ही उसे डर लगा कि ठण्डा टपका आ पहुंचा है, उधर किसान ने समझा कि उसकी बकरी ही उससे टकराई है। सिंह ठण्डे टपके के डर से कांपता हुआ एक तरफ खड़ा हो गया। किसान को लगा कि पास में जो जानवर खड़ा है, वह उसकी बकरी ही है, इसलिए वह लपककर उसके पास जा पहुंचा, उसे गालियां दीं, उसके कान पकड़े और दो-चार घूसें जड़ दिए । सिंह ने सोचा, ‘अब तो मैं बेमौत मरा। मैं इस ठण्डे टपके के हाथों से छूट नहीं पाउँगा।’ डर-ही-डर में उसने मार खा ली और एक भीगी बिल्ली की तरह किसान के साथ चलने लगा।
घर पहुंचकर किसान ने बकरी के खूंटे से उसे बांध दिया।
सबेरे उठकर जब किसान की पत्नी बकरी को दुहने के लिये उसके पास पहुंची, तो उसने बकरी की जगह सिंह को बंधा पाया। उसने किसान से सारी बात कही और जब दोनों को भरोसा हो गया कि खूटें से बकरी नहीं, सिंह बंधा है, तो उन्होंने छुरी लेकर सिंह के गले की रस्सी दूर से काट दी, और फिर दोनों अपने घर में घुस गए।
सिंह ने मन-ही-मन सोचा, ‘अच्छा ही हुआ, जो ठण्डे टपके से छुटकारा मिल गया!’
छह मूर्ख
एक अहीर था। उसके एक लड़का था। वह रोज गायें लेकर जंगल में जाता था। एक दिन जब वह जंगल की तरफ जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक ब्राह्मण मिला। ब्राह्मण चुटकी बजाता जाता था, और ‘राधाक्रष्ण’, ‘राधाक्रष्ण’ बोलता जाता था। चुटकी की आवाज सुनकर अहीर के लड़के को बड़ा अचंभा सा हुआ। उसने चुटकी की आवाज कभी सुनी ही नहीं थी। लड़के ने ब्राह्मण से पूछा, "महाराज, आप क्या बजा रहे हैं?” ब्राह्मण चालाक था। उसने तुरन्त ताड़ लिया। बोला, "अरे भैया! यह तो मेरी ‘फूलकी’ है। मैंने इसे पाला है।”
लड़के ने कहा, "महाराज, आप अपनी यह ‘फूलकी’ मुझे दे देंगे, तो मैं तो अपनी ‘लीलकी’ गाय आपको दे दूंगा।” ब्राह्मण को तो हां भर कहना था। उसने झटपट लड़के को चुटकी बजाना सिखा दिया, और वह गाय लेकर चला गया।
लड़का खुश होता होता घर पहुंचा। वहां आंगन में खाट पर दादाजी बैठे थे। उन्हें देखकर लड़के ने मौज-ही-मौज में चुटकी बजाते हुए कहा, "दादाजी, दादाजी! देखिए तो! अपनी लीलकी गाय देकर मैं यह फूलकी ले आया हूं। दादाजी! जरा सुनिए तो! यह कितनी अच्छी बजती है!”
दादाजी भी उस लड़के से कुछ कम नहीं थे। बोले, "अरे वाह, यह फूलकी तो बहुत ही बढ़िया दिखती है। फट-फट बजती है, और पट-पट बोलती है।” लड़के की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। जब ब्यालू का समय हुआ, तो लड़के ने पूछा, "मां, इस फूलकी को मैं कहां रख दूं? ”
मां बोली, "बेटे, इसे उस कुल्हड़ में रख दे। वह कुल्हड़ कुठले पर पड़ा है। ज़रा संभाल कर रखना।”
उस रात लड़के ने मौज-ही-मौज में दो गुना खाना खाया। लेकिन जब हाथ धोकर वह फूलकी लेने पहुंचा, तो उसे कुल्हड़ में फूलकी नहीं मिली। लड़के का चेहरा उतर गया। वह बोला, "मां-मां! मेरी फूलकी गुम हो गई।”
दादाजी ने कहा, "अभी-की-अभी कहां चली गई? लगता है कि कुल्हड़ ही उसे निगल गया! ”
सब एक साथ बोले, "इस कुल्हड़ को तो तपाना ही होगा। इसे तपाने पर ही फूलकी वापस आयेगी।”
आंगन में बड़ा-सा अलाव जलाया गया और उसमें कुल्हड़ डाल दिया गया। जब ज़ोर की आग जली, तो लड़के के हाथ सूख गए और चुटकी फिर बजने लगी।
लड़का बोला, "लो, यह मेरी फूलकी आ गई।” सुनकर सब खुश हो गए।
एक भूत का भैया था। जंगल मे रहता था, इसलिए उसने कभी कोई दीया देखा नही था। एक दिन वह एक बड़े गांव मे पहुंचा और एक अहीर के घर ठहरा। रात होने पर अहीर के घर में दीया जलाया गया। दीया देखकर भूत भाई गहरे सोच में पड़ गया।
उसने सोचा, ‘यह जगमगाने वाली चीज़ भला क्या है? ऐसी कोई चीज़ तो मैंने कभी नहीं देखी थी। यह तो कोई अजब-गजब सी चीज़ मालूम होती है। लेकिन यह इतनी बढ़िया चीज़ है कि मांगने पर भी कोई देगा नहीं। ठीक है, जब आधी रात होगी और सब सो जायेंगे, तो मैं इसे घास की उस ढेरी की आड़ में छिपा दूंगा और सुबह जाते समय इसे वहां से लेकर चला जाउंगा।’
सब सो गए। मेहमान धीमे से उठा और कुठले के पास पहुंचा। बड़ी सावधानी के साथ उसने मिटटी का दीया अपने हाथ में लिया और चुपचाप घास की ढेरी में रख दिया। बाद में वह इस तरह अपनी खटिया पर आकर सो गया कि किसी को कुछ पता ही न चले।
लेकिन थोड़ी ही देर मे वहां एक ज़बरदस्त होली-सी जल उठी। मेहमान धू-धू जल रही गंजी के पास पहुंचकर कुछ खोजने लगा। लोगों ने पूछा, "भैया, वहां तुम क्या खोज रहे हो? दूर हटो, दूर हटो, नहीं तो जल मरोगे।”
मेहमान बोला, "वाह! वहां तो मेरा अपना जगमगिया है। उसे मैंने वहीं छिपाया है।”
लोगों ने पूछा, "भैया, यह जगमगिया क्या चीज़ है?”
मूरख मेहमान ने कहा, "वही, जो रात उस कुठले पर रखा था। रात में वह जगमग जगमग हो रहा था, और बहुत ही खूबसूरत लग रहा था।”
सब बोले, "अभागे! तो यह आग तुमने ही लगाई थी! हम तो सोच रहे थे कि यह आग कौन लगा गया होगा?”
एक था ब्राह्मण और एक थी ब्राह्मणी। एक बार रात को उनके घर में चोर घुसे। आहट सुनकर ब्राह्मण ने ब्राह्मणी से कहा, "क्योंजी तुम कुछ सुनती हो? लगता है कि घर में चोर घुसे हैं।”
ब्राह्मणी बोली, "हां, लगता तो यही है। तुम कहो तो मैं ज़ोर से चिल्लाउं और सब पड़ोसियों को इकट्ठा कर लूं?”
ब्राह्मण ने कहा, "ठहरो। हम तो ब्राह्मण हैं! बिना मुहूर्त देखे कोई काम कर ही नहीं सकते। मुझे पंचांग निकालने दो और देखने दो कि आज चिल्लाने का मुहूर्त निकलता है या नहीं।”
ब्राह्मण पंचांग देखने लगा।
ब्राह्मणी ने पूछा, "क्यों कोई मुहूर्त निकल रहा है या नहीं?”
ब्राह्मण बोला, "भला, मुहूर्त कोई रास्ते में पड़ी चीज़ है? मुहूर्त तो निकल रहा है, आज से छह महीने बाद का। इसलिए छह महीने बाद सोचेंगे। अभी तो हम सो जायं।” फिर चोरों के लिए तो चिन्ता की कोई बात रहती ही क्यों? अपना ही घर मानकर उन्हें जो भी चुराना था, सो सब चुराकर ले गए।
छह महीने बीत गए। ब्राह्मण बोला, "अब आज हम बदमाश चोरों से निपट लेंगे। आज का मुहूर्त निकला है।”
जब आधी रात हुई, तो ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों ज़ोर ज़ोर से चीखने और चिल्लाने लगे, "दौड़ो- दौड़ो, घर में चोर घुसे हैं।”
यह सोचकर कि चोर ग़रीब ब्राह्मण को लूटकर चले जायंगे, पास-पड़ोस के लोग दौड़कर आए और पूछने लगे, "महाराज! बताइए, चोर कहां है?”
महाराज बोले, "भाइयो, चोर तो छह महीने पहले आए थे। पर ख़बर आज दे रहा हूं।”
लोगों ने कहा, "महाराज! आप तो हमें मूर्ख मालूम होते है। कहीं छह महीने बाद कोई ख़बर दी जाती है!”
ब्राह्मण बोला, "लेकिन भाइयो! जब मुहूर्त ही नहीं निकल रहा था तो मैं क्या करता!”
एक मुर्ख था। एक बार वह अपनी बहन के घर गया। बहन ने बड़ी उमंग के साथ भाई को ढोकले खिलाए। भाई को ‘ढोकले’ बहुत पसन्द आए। उसने बहन से पूछा, "इनका नाम क्या है?”
बहन ने कहा, "ढोकले।”
भाई ने सोचा कि घर पहुंचकर ढोकले बनवाउंगा और पेट भरकर
खाउंगा। वह मन-ही-मन ‘ढोकले-ढोकले’ की रट लगाता हुआ अपने घर की तरफ चला। उसे भरोसा था कि अगर रटूंगा नही, तो सब भूल जाउंगा।
रास्ते में एक छोटा-सा नाला पड़ा। उसे पार किए बिना आगे बढ़ा नहीं जा सकता था। पार करने की तरकीब सोची और पार भी कर लिया। लेकिन मन मे अचंभा-सा हुआ कि इसे मैंने कैसे पार कर लिया! इस सोच-विचार में वह ढोकले का नाम भूल गया, और इसके बदले ‘खूब पार किया’, ‘खूब पार किया’ ज़बान पर चढ़ गया। घर पहुंचकर घरवाली से कहा, "सुनो, जल्दी करो। मेरे लिए ‘खूब पार किया’ बना दो। मुझे तो ‘खूब पार किया’ ही खाना है। मेरी बहन ने बहुत मीठे ‘खूब पार किया’ बनाए थे।”
घरवाली सोच में पड़ गई, ‘अरे, यह ‘खूब पार किया’ क्या चीज़ है?’ बात उसकी समझ में आई नही। देर होती देखकर मूर्ख का गुस्सा बढ़ने लगा। बोला, "बनाती क्यों नही हो? बैठी क्यों हो?”
घरवाली ने कहा, ‘खूब पार किया’ कैसे बनता है, मैं तो जानती नहीं हूं। आपकी बहन जानती है, तो वापस उनके घर जाइए, और उनसे कहिए कि वे बना दें।” सुनकर उसका पारा चढ़ गया। पास ही में एक मोंगरी पड़ी थी। उसे उठाकर वह अपनी घरवाली को तड़ातड़ पीटने लगा। बेचारी को इस बुरी तरह पीटा कि उसके सारे बदन पर ‘ढोकले-ही-ढोकले’ उठ आये।
पास-पड़ोस के लोग दौड़कर इकट्ठे हो गये। मारनेवाले को उलहना देते हुए बोले, "अरे, अपनी घरवाली को कोई इस तरह पीटता है। देखो, इसके सारे बदन पर ढोकले-ही-ढोकले उठ आये हैं।”
मूर्ख बोला, "हां-हां, बस, ये...ये...ढोकले! मुझे तो ढोकले ही खाने हैं। मैं तो इनका नाम ही भूल गया था।”
सबने कहा, "मूर्ख कहीं का! ”
किसान का एक लड़का था। वह बड़ा मूर्ख था। एक बार अपने खेत से घर आ रहा था। रास्ते में उसे एक घोड़ीवाला मिला। घोड़ी देखकर लड़के ने चाहा कि वह उसे खरीद ले। उसने घोड़ीवाले से पूछा, "क्यों भाई, इस घोड़ी का क्या लोगे? तुमको जो लेना हो ले लो, पर यह घोड़ी मुझे देते जाओ।”
घोड़ीवाले ने कहा, "लड़के! इसके पूरे सौ रूपये लगेंगे।"
लड़का बोला, "मेरे पास सौ रूपये तो नहीं है, पचास रूपये हैं।"
घोड़ीवाले ने कहा, "तो तुम अपने घर का रास्ता नापो। यों मुफ्त में कोई घोड़ी पर कैसे बैठ सकता है?"
लड़का बोला, "भाई, अगर हम ऐसा करें कि मैं ये पचास रूपये तुमको नकद दे दूं, और बाकी के पचास के बदले तुमको तुम्हारी घोड़ी लौटा दूं तो कैसा रहे? बोलो, यह सौदा तुम्हें मंजूर है पचास रूपये हैं?"
बात घोड़ीवाले की समझ में आ गई। वह कोई भला आदमी तो था नहीं। पचास रूपये और घोड़ी दोनों लेकर वह वहां से बेखटके चल पड़ा। इधर यह लड़का भी बहुत खुश हो गया। वह टिक्- टिक् आवाज करता हुआ झूठ-मूठ ही घोड़ी को हांकने लगा। हांकते-हांकते अपने घर आया। घर पहुंचकर बोला, "पिताजी, पिताजी! मैंने आज एक घोड़ी खरीदी है।"
पिताजी ने पूछा, "वह घोड़ी कहां है?"
लड़का बोला, "पिताजी, बात यह हुई कि घोड़ी मैंने सौ रूपयों में खरीदी, लेकिन मेरे पास तो पचास रूपये ही थे। वह पचास रूपये मैंने घोड़ीवाले को चुका दिए, और बाकी के पचास रूपये के बदले मैंने उसे उसकी घोड़ी वापस दे दी। हम अपने सिर बेकार कर्ज क्यों रखें?"
बाप ने कहा, "वाह बेटे, वाह! तेरी अक्ल के क्या कहने!"
एक ब्राह्मण था। एक बार उसका एक भानजा बीमार पड़ा। भानजे के समाचार जानने के लिए वह उसके गांव गया। समाचार जान लेने के बाद जब वह वापस अपने घर आ रहा था, तो रास्ते में उसे एक मसखरा सेठ मिला। सेठ ने पूछा, "काका, आप कहां हो आए?"
ब्राह्मण बोला, "भानजा बीमार था, इसलिए मैं उसके समाचार लेने गया था।"
सेठ ने कहा, "आपने कुछ सुना है या नहीं? क्या नहाने की नौबत आई है?"
ब्राह्मण बोला, "नहीं भैया! मैं तो घर में सबको भला-चंगा छोड़कर गया था। इन दो दिनों में और क्या हो गया? तुम्हारी काकी तो अच्छी-भली है न?"
सेठ ने कहा, "अरे महाराज, बहुत ही बुरा हुआ। मेरी तो जीभ ही नहीं खुल रही। लेकिन मेरी काकी विधवा हो चुकी है। गजब हो गया है, महाराज, गजब हो गया है!"
ब्राह्मण बोला, "एं-एं! क्या तुम्हारी काकी विधवा हो गई है? यह तुम क्या कह रहे हो? वह तो खुब तगड़ी थी। वह विधवा कैसे हो गई?"
सेठ मन-ही-मन हंसते हुए आगे बढ़ गया। ब्राह्मण अपने घर की गली के नुक्कड़ के पास पहुंचा। पहुंचकर चादर माथे पर ओढ़ ली और जोर-जोर से रोने लगा। गली के लोग इकटठे हो गए। ब्राह्मण अपने आंगन में जाकर बैठा और लगातार रोता ही रहा।
घर के अन्दर से ब्राह्मण की बेटी बाहर आई। बोली, "पिताजी, अब आप रोना बन्द कर दीजिए। जो होना था, सो तो हो चुका है।"
पिताजी उठे और आंखे पोंछने लगे। तभी बेटी ने पूछा, "पिताजी, मेरे फुफेरे भैया तो बहुत ही भले चंगे थे। उनको अचानक क्या हो गया?"
पिताजी बोले, "बेटी! भानजा तो मेरा ठीक है। पर यह तो एक दूसरा ही गज़ब हुआ है। रास्ते में मुझे माधो हलवाई ने ख़बर दी कि यहां उसकी काकी विधवा हो गई है। बेटी, तेरी मां विधवा हो जाय,तो क्या मुझे रोना नहीं आयगा? हाय-हाय, यह तो गजब हो गया!"
बेटी बोली, "लेकिन पिताजी! जब आप मौजूद हैं, तो मेरी मां विधवा कैसे हो सकती है?"
पिताजी बोले, ‘’अरे हां, इस बात का तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा!"
चींटे ने ताटा रे, ताटा
एक राजा था। उसके तीन रानियां थीं। राजा का नसीब कि तीनों तोतली थीं। राजा ने चौथी रानी से ब्याह करने की बात सोची। अच्छा घर देखकर राजा ने सगाई कर ली। कन्या की तारीफ़ करते हुए किसी ने राजा से कहा था कि कन्या अच्छी रूपवती है, और बहुत अच्छे स्वभाव की है। राजा के मन में ब्याह की खुशी समाती नहीं थी।
राजा विवाह करने निकला। कन्या तोतली थी, लेकिन कन्या के मां-बाप बड़े चंट थे। उन्होंने कन्या को पहले से ही सिखा रखा था कि राजा कुछ भी क्यों न कहे, उसे एक शब्द भी बोलना नहीं है। राजा मन-ही-मन खुश हो रहे थे कि रानी मीठी-मीठी बातें करके उनका अच्छा मनोरंजन करेगी।
पर नई रानी तो गूंगी बनकर खड़ी रही। राजा ने बहुत चाहा कि रानी बोले, पर रानी क्यों बोलने लगी? उसने तो जैसे अपने होंठ सी लिए थे। राजा मन-ही-मन बोला, ‘यह तो कुएं में से निकलकर खाई में गिरने जैसा हुआ। तोतली को छोड़कर बोलती को लेने गये, तो यह गूंगी पुतली पल्ले पड़ी।’ राजा बहुत निराश हो गया।
एक दिन यह चौथी रानी बाड़े में उपले लेने गई। वहां एक चींटे ने उसे इतने ज़ोर से काटा कि रानी एकदम, चीख उठी, "मां, मुझे चींटे ने ताटा है,
चींटे ने।" राजा अपने झरोखे में बैठे थे। उन्होंने यह सुना। वह समझ गये कि चौथी रानी भी तोतली है।
राजा ने यह बात छिपाकर रखी थी कि उसकी चारों रानियां तोतली हैं। स्वयं अपनी ओर से राजा ने किसी को कुछ कहा नहीं था। लेकिन दीवान के मन में कुछ शंका पैदा हो गया। ठीक जानकारी पाने के लिए दीवान ने राजा से अकेले में पूछा, "राजाजी, गांव के लोग कहते हैं कि आपकी सब रानियां तोतली हैं। क्या यह सच है?"
राजा ने कहा, "दीवानजी! आपकी बात बिलकुल झूठी है।"
दीवान बोले, "आप मुझे भोजन के लिए न्यौते तो मैं साबित कर दूंगा।"
इस पर राजा ने दीवान को अपने महल में भोजन के लिए न्यौता। सब रानियों से कहा गया था कि कोई कुछ भी न बोले। राजा और दीवान दोनों आमने-सामने भोजन करने बैठे। तरह-तरह की रसोई बनाई गई थी। बड़ियां भी बनी हुई थीं।
दीवान ने बहुत कोशिश की कि रानियां कुछ बोलें, पर एक भी रानी बोली नहीं। आखिर दीवान थक गए, लेकिन इसी बीच उनको एक तरकीब सूझी। बड़ियां बहुत ही बढ़िया बनी थीं। बड़ी खाते-खाते दीवान ने उनकी खूब तारीफ शुरू कर दी। जब बड़ियों की बहुत तारीफ़ हुई, तो रानियां मन-ही-मन मारे खुशी के फूल उठीं। इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर दीवान ने पूछा, "ये बड़ियां किसने तली हैं?"
इस पर एक रानी बोली, "ये बइयां तो मैंने तइयां" (ये बड़ियां तो मैंने तली हैं)।
राजा के मना करने पर भी एक रानी बोल उठी ,थी, इसीलिए दूसरी ने सयानी बनकर उससे कहा, "मना तरने पर भी बोई त्यों?" (मना करने पर भी बोली क्यों)?
तीसरी रानी ने सोचा कि यह तो बहुत ही बुरा हुआ। राजा ने साफ़-
साफ़ कहा था कि कोई बोलना मत, फिर भी ये दो बोल उठीं! उसके मन में थोड़ा गुस्सा भी आया, और कुछ अधिक सयानी बनकर उलाहने-भरी आवाज़ में उसने कहा, "ये बोई तो बोई, पर आप त्यों बोई?" (ये बोलीं तो बोलीं, पर आप क्यों बोलीं?)
चौथी रानी ने सोचा कि ये तीनों रानियां मूर्ख हैं। राजा ने मना किया था, फिर भी ये बोलीं और दीवानजी को सब पता चल गया। उसके मन में थोड़ा अभिमान भी आ गया। दीवानजी को उसके भेद का पता नही चला, यह सोचकर वह मन-ही-मन खुश हो उठी, और खुशी-ही-खुशी में वह बोली, "मै तो बोई बी नहीं और चाई बी नहीं!"(मैं तो बोली भी नहीं और चाली भी नहीं)। सुनकर राजा और दीवान दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।
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