डगमगपुर का
भोंदूराम नाम के अनुरूप ही भोंदू था। यही भोंदूपन उसके निखट्टू होने का
कारण भी था। वह जो भी काम करता उसमें उसमें घाटा ही होता।
एक दिन भोंदूराम के पिता ने उसे सलाह दी कि दूसरे गांव में जाकर व्यापार करो। शायद तुम्हारे दिन फिर जाएं। भोंदूराम के पिता खाते-पीते व्यापारी थे। पिता ने भोंदूराम को व्यापार करने के लिए पचास अशर्फियां दीं। एक पोटली में अशर्फियां रख कर वह व्यापार करने चल दिया।
उधर चकमागढ़ का ठग चालाक सिंह कई दिनों से शिकार की तलाश में था। उसका घर गांव के शुरू में ही था। रात काफी होने लगी थी। भोंदूराम चलते-चलते थक गया। सामने चालाक सिंह का घर देखकर वह रुक गया। सोचने लगा कि यहां थोड़ी देर रुक कर आगे चलूंगा। ' खट-खट ' की आवाज सुनकर चालाक सिंह ने दरवाजा खोला। भोंदूराम ने उसे अपने आने का कारण बताया। चालाक सिंह को लगा कि बिना जाल बिछाए शिकार आ फंसा था। चालाकसिंह ने भोंदूराम को घर बुलाया और कहा। '
' भई , एक बड़ा सौदा तो मैं तुम्हें कौड़ि़यों के दाम में दे सकता हूं , अगर तुम चाहो तो। '
कैसा सौदा ? भोंदूराम ने उत्सुक होते हुए पूछा।
' बात ऐसी है कि कुछ दिन पहले मैंने एक बहुत बड़ा मोती एक मछुआरे ने खरीदा था , लेकिन गलती से वह सामने वाले कुएं में गिर गया। मैंने उसे बाहर निकालने की बहुत कोशिश की। लेकिन निकाल न सका। सैकड़ों अशर्फियां का वह मोती तुम निकाल लो। बदले में सिर्फ पचास अशर्फियां दे देना। '
' सिर्फ पचास अशर्फियां। '
' हां , सिर्फ पचास। '
भोंदूराम को सौदा बहुत सस्ता लगा। उसने अधीर होते हुए कहा , ' ठीक है। ' मुझे तुम्हारा सौदा मंजूर है। चलो जल्दी से मुझे बड़ा मोती दिखा दो। '
चालाक सिंह भोंदूराम को कुएं के पास ले गया। रात गहरा चुकी थी। पूर्णिमा का चांद आकाश में चमक रहा था। चांद की परछाई को कुएं के पानी में दिखाता हुआ चालाक सिंह बोला , ' वो देखो सामने , है न कितना बड़ा और चमकीला मोती। '
' हां भाई , इतना बड़ा मोती तो मैंने आज तक नहीं देखा। ये लो पचास अशर्फियां और ये मोती मुझे दे दो। ' जल्दी से पचास अशर्फियां की थैली उसने चालाक सिंह को दे दी।
चालाक सिंह अशर्फियां ठग कर मुस्कराता हुआ वहां से चला गया।
भोंदूराम रात भर बड़ी बाल्टी में रस्सी बांधकर मोती को निकालने की कोशिश करता रहा। थक कर चूर होने के बाद वह चालाक सिंह के घर जाकर सो गया।
सुबह जब भोंदूराम उठा , तो मोती कुएं से गायब था। उसने गुस्से में चालाक सिंह से कहा , ' तुमने मोती कुएं में से निकाल लिया है। '
नहीं भाई। दिन की तेज रोशनी में मोती दिखाई नहीं देता। रात को फिर दिख जाएगा। ' चालाक सिंह ने फिर चालाकी दिखाते हुए कहा। भोंदूराम को चालाक सिंह की बात पर भरोसा हो गया था , लेकिन कुछ दिनों के बाद जब उसे मोती टूटा हुआ नजर आया तो उसने चालाक सिंह से इस बारे में पूछा।
चालाक सिंह ने कहा , ' लगता है तुम्हारी बाल्टी की चोट से मोती के किनारे टूट गए हैं। '
' हां ऐसा हो सकता है। ' पंद्रह दिन बाद अमावस्या आ गई थी। मोती कुएं में नहीं था। भोंदूराम माथा पीटता हुआ वापस घर लौट गया। उधर चालाक सिंह थैली में रखी अशर्फि यों को बार-बार गिन कर खुश हो रहा था।
एक दिन भोंदूराम के पिता ने उसे सलाह दी कि दूसरे गांव में जाकर व्यापार करो। शायद तुम्हारे दिन फिर जाएं। भोंदूराम के पिता खाते-पीते व्यापारी थे। पिता ने भोंदूराम को व्यापार करने के लिए पचास अशर्फियां दीं। एक पोटली में अशर्फियां रख कर वह व्यापार करने चल दिया।
उधर चकमागढ़ का ठग चालाक सिंह कई दिनों से शिकार की तलाश में था। उसका घर गांव के शुरू में ही था। रात काफी होने लगी थी। भोंदूराम चलते-चलते थक गया। सामने चालाक सिंह का घर देखकर वह रुक गया। सोचने लगा कि यहां थोड़ी देर रुक कर आगे चलूंगा। ' खट-खट ' की आवाज सुनकर चालाक सिंह ने दरवाजा खोला। भोंदूराम ने उसे अपने आने का कारण बताया। चालाक सिंह को लगा कि बिना जाल बिछाए शिकार आ फंसा था। चालाकसिंह ने भोंदूराम को घर बुलाया और कहा। '
' भई , एक बड़ा सौदा तो मैं तुम्हें कौड़ि़यों के दाम में दे सकता हूं , अगर तुम चाहो तो। '
कैसा सौदा ? भोंदूराम ने उत्सुक होते हुए पूछा।
' बात ऐसी है कि कुछ दिन पहले मैंने एक बहुत बड़ा मोती एक मछुआरे ने खरीदा था , लेकिन गलती से वह सामने वाले कुएं में गिर गया। मैंने उसे बाहर निकालने की बहुत कोशिश की। लेकिन निकाल न सका। सैकड़ों अशर्फियां का वह मोती तुम निकाल लो। बदले में सिर्फ पचास अशर्फियां दे देना। '
' सिर्फ पचास अशर्फियां। '
' हां , सिर्फ पचास। '
भोंदूराम को सौदा बहुत सस्ता लगा। उसने अधीर होते हुए कहा , ' ठीक है। ' मुझे तुम्हारा सौदा मंजूर है। चलो जल्दी से मुझे बड़ा मोती दिखा दो। '
चालाक सिंह भोंदूराम को कुएं के पास ले गया। रात गहरा चुकी थी। पूर्णिमा का चांद आकाश में चमक रहा था। चांद की परछाई को कुएं के पानी में दिखाता हुआ चालाक सिंह बोला , ' वो देखो सामने , है न कितना बड़ा और चमकीला मोती। '
' हां भाई , इतना बड़ा मोती तो मैंने आज तक नहीं देखा। ये लो पचास अशर्फियां और ये मोती मुझे दे दो। ' जल्दी से पचास अशर्फियां की थैली उसने चालाक सिंह को दे दी।
चालाक सिंह अशर्फियां ठग कर मुस्कराता हुआ वहां से चला गया।
भोंदूराम रात भर बड़ी बाल्टी में रस्सी बांधकर मोती को निकालने की कोशिश करता रहा। थक कर चूर होने के बाद वह चालाक सिंह के घर जाकर सो गया।
सुबह जब भोंदूराम उठा , तो मोती कुएं से गायब था। उसने गुस्से में चालाक सिंह से कहा , ' तुमने मोती कुएं में से निकाल लिया है। '
नहीं भाई। दिन की तेज रोशनी में मोती दिखाई नहीं देता। रात को फिर दिख जाएगा। ' चालाक सिंह ने फिर चालाकी दिखाते हुए कहा। भोंदूराम को चालाक सिंह की बात पर भरोसा हो गया था , लेकिन कुछ दिनों के बाद जब उसे मोती टूटा हुआ नजर आया तो उसने चालाक सिंह से इस बारे में पूछा।
चालाक सिंह ने कहा , ' लगता है तुम्हारी बाल्टी की चोट से मोती के किनारे टूट गए हैं। '
' हां ऐसा हो सकता है। ' पंद्रह दिन बाद अमावस्या आ गई थी। मोती कुएं में नहीं था। भोंदूराम माथा पीटता हुआ वापस घर लौट गया। उधर चालाक सिंह थैली में रखी अशर्फि यों को बार-बार गिन कर खुश हो रहा था।
