Saturday, February 16, 2013

कुएं में गिरा मोती

डगमगपुर का भोंदूराम नाम के अनुरूप ही भोंदू था। यही भोंदूपन उसके निखट्टू होने का कारण भी था। वह जो भी काम करता उसमें उसमें घाटा ही होता।
एक दिन भोंदूराम के पिता ने उसे सलाह दी कि दूसरे गांव में जाकर व्यापार करो। शायद तुम्हारे दिन फिर जाएं। भोंदूराम के पिता खाते-पीते व्यापारी थे। पिता ने भोंदूराम को व्यापार करने के लिए पचास अशर्फियां दीं। एक पोटली में अशर्फियां रख कर वह व्यापार करने चल दिया।
उधर चकमागढ़ का ठग चालाक सिंह कई दिनों से शिकार की तलाश में था। उसका घर गांव के शुरू में ही था। रात काफी होने लगी थी। भोंदूराम चलते-चलते थक गया। सामने चालाक सिंह का घर देखकर वह रुक गया। सोचने लगा कि यहां थोड़ी देर रुक कर आगे चलूंगा। ' खट-खट ' की आवाज सुनकर चालाक सिंह ने दरवाजा खोला। भोंदूराम ने उसे अपने आने का कारण बताया। चालाक सिंह को लगा कि बिना जाल बिछाए शिकार आ फंसा था। चालाकसिंह ने भोंदूराम को घर बुलाया और कहा। '
' भई , एक बड़ा सौदा तो मैं तुम्हें कौड़ि़यों के दाम में दे सकता हूं , अगर तुम चाहो तो। '
कैसा सौदा ? भोंदूराम ने उत्सुक होते हुए पूछा।  

' बात ऐसी है कि कुछ दिन पहले मैंने एक बहुत बड़ा मोती एक मछुआरे ने खरीदा था , लेकिन गलती से वह सामने वाले कुएं में गिर गया। मैंने उसे बाहर निकालने की बहुत कोशिश की। लेकिन निकाल न सका। सैकड़ों अशर्फियां का वह मोती तुम निकाल लो। बदले में सिर्फ पचास अशर्फियां दे देना। '
' सिर्फ पचास अशर्फियां। '
' हां , सिर्फ पचास। '
भोंदूराम को सौदा बहुत सस्ता लगा। उसने अधीर होते हुए कहा , ' ठीक है। ' मुझे तुम्हारा सौदा मंजूर है। चलो जल्दी से मुझे बड़ा मोती दिखा दो। '
चालाक सिंह भोंदूराम को कुएं के पास ले गया। रात गहरा चुकी थी। पूर्णिमा का चांद आकाश में चमक रहा था। चांद की परछाई को कुएं के पानी में दिखाता हुआ चालाक सिंह बोला , ' वो देखो सामने , है न कितना बड़ा और चमकीला मोती। '
' हां भाई , इतना बड़ा मोती तो मैंने आज तक नहीं देखा। ये लो पचास अशर्फियां और ये मोती मुझे दे दो। ' जल्दी से पचास अशर्फियां की थैली उसने चालाक सिंह को दे दी।
चालाक सिंह अशर्फियां ठग कर मुस्कराता हुआ वहां से चला गया।
भोंदूराम रात भर बड़ी बाल्टी में रस्सी बांधकर मोती को निकालने की कोशिश करता रहा। थक कर चूर होने के बाद वह चालाक सिंह के घर जाकर सो गया।
सुबह जब भोंदूराम उठा , तो मोती कुएं से गायब था। उसने गुस्से में चालाक सिंह से कहा , ' तुमने मोती कुएं में से निकाल लिया है। '
नहीं भाई। दिन की तेज रोशनी में मोती दिखाई नहीं देता। रात को फिर दिख जाएगा। ' चालाक सिंह ने फिर चालाकी दिखाते हुए कहा। भोंदूराम को चालाक सिंह की बात पर भरोसा हो गया था , लेकिन कुछ दिनों के बाद जब उसे मोती टूटा हुआ नजर आया तो उसने चालाक सिंह से इस बारे में पूछा।
चालाक सिंह ने कहा , ' लगता है तुम्हारी बाल्टी की चोट से मोती के किनारे टूट गए हैं। '
' हां ऐसा हो सकता है। ' पंद्रह दिन बाद अमावस्या आ गई थी। मोती कुएं में नहीं था। भोंदूराम माथा पीटता हुआ वापस घर लौट गया। उधर चालाक सिंह थैली में रखी अशर्फि यों को बार-बार गिन कर खुश हो रहा था। 

लालची बुढिया !!


किसी गावं में एक सास और बहू रहती थी . सास बहुत दुस्ट थी और अपने बहू को बहुत सताती थी . बहू बेचारी सीधी साधी सास के अत्याचारों को सहती रहती थी . एक दिन तीज का त्यौहार था बहू अपने पति की लम्बी उम्र के लिए ब्रत थी . मुहल्ले की सभी औरते अच्छे अच्छे पकवान बना रही थी . नए नए कपड़े पहन कर और सज सवार कर मन्दिर जाने की तैयारी कर रही थी .
पर सास ने अपनी बहू से कहा - अरे कलमुही तू बैठे बैठे यहाँ क्या कर रही है जा खेत में मक्का लगा है , कौवे और तोते फसल नस्ट कर रहे है जा कर उन्हें उडा. बहू ने कहा माँ आज मेरा ब्रत है मै तो पूजा की तैयारी कर रही थी, आज मुझे मन्दिर जाना है . सास ने कहा - तू सज सज सवर कर मन्दिर जा कर क्या करेगी, कौन सा जग जित लेगी , बहू को गालिया देने लगी .
बहू बेचारी क्या करती मन मार कर जाना पड़ा लेकिन उसे रोना आ रहा था उसकी आँखे भर आई , वह और औरतों को मन्दिर जाते देख रही थी , औरतें मंगल गीत गा रही थी . उसके सब अरमान पलकों से टपक रहे थे . वह आज सजना चाहती थी , अपने पति के नाम की चुडिया पहनना चाहती थी , माग में अपने पति के नाम का सिंदूर लगाना चाहती थी और वह साड़ी पहनना चाहती थी जो उसके पति ने उसे अपनी पहली कमाई पर दिया था, आज उसके लिए मंगल कामना इश्वर के चरणों में जा कर करना चाहती थी . वह अन्दर ही अन्दर रो रही थी और खेत की तरफ़ जा रही थी , खेत पर पंहुच कर , को - कागा - को , यहाँ ना आ , मेरा ना खा - कही और जा जा कहती जा रही थी .
उसी समय पृथिवी पर शंकर और पार्वती जी भ्र्मद करने निकले थे , पार्वती जी को बहू का रोना देख कर ह्रयद भर आया और उन्होंने शिव जी से कहा की नाथ देखिये तो कोई अबला नारी रो रही है . रूप बदल कर शंकर और पार्वती जी बहू के पास पंहुचे और पूछा की बेटी क्या बात है ? क्यू रो रही हो ? क्या कस्ट है तुम्हे तो वह बोली की मै अपनी किस्मत पर रो रही हूँ . आज तीज का ब्रत है गाव की सारी औरते पूजा पाठ कर रही है और मेरी सास ने मुझे यहाँ कौवे उडऩे के लिए भेज दिया है और मै अभागी यहाँ कौवे उडा रही हूँ . भोले बाबा को बहू पर दया आ गई उन्होंने बहू को ढेर सारे गहने और चंडी और सोने के सिक्के दे कर कर कहा की तुम धर जाओ और अपनी पूजा करो , मै तुम्हरे खेत की देख भाल करूँगा .जब बहू धर पहुँची तो बहू के पास इतना धन देख कर आश्चय चकित रह गई . बहू ने सारी बात सास को बता दी . सास बहू से अच्छे से बोली अच्छा तू जा कर पूजा कर ले और अगले साल मै जाउंगी खेत की रखवाली करने जाउनी .
अगले साल जब तीज आई बुढिया तैयार हो कर खेत पर पहुँच गई और खूब तेज तेज रोने लगी , ठीक उसी समय शंकर और पार्वती उधर से गुजर रहे थे और उन्होंने ने पूछा की क्या बात है तो उस बुढिया ने बताया की मेरी बहू मुझे बहुत परेशान करती है और उसने आज भी उसने मुझे खेत की रखवाली के लिए भेज दिया जबकि आज मेरा ब्रत है . भगवान शंकर उस बुढिया को समझ गए और उन्होंने ने कहा तुम घर जाओ , तो बुढिया ने कहा की आपने मुझे कुछ दिया नही तो भोले बाबा ने कहा की धर जाओ तुम्हे मिल जायेगा . जब वह घर पहुची तो उसके पुरे शरीर में छाले पड़ गए . बुढिया बहू को गलिया देने लगी . बहू ने पूछा तो बुढिया ने पुरी कहानी बताई , तब बहू ने कहा की भगवान हमेशा सरल, सच्चे और भोले भाले लोगों की ही सहायता करते है , लालची लोगो की नही .

बुद्धिमान राधा

बुद्धिमान राधा
भोला एक गरीब मल्लाह था। वह प्रतिदिन सुबह से शाम तक अपनी नाव से राहगीरों को नदी के इस पार से उस पार तथा उस पार से इस पार पहुँचाया करता था। इससे जो कुछ आदमनी होती, उसी से वह अपना गुजर-बसर करता। भोला की एक बेटी थी- राधा। राधा एक मेहनती व बुद्धिमान लङकी थी। अपनी कक्षा में वह हमेशा प्रथम आती थी। भोला अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। वह उसके लिए हमेशा उसकी पसंद की कोई न कोई चीज अवश्य लाया करता था।

भोला की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसकी अकेले की कमाई से घर के खर्चे पूरे नहीं पङते थे, अतः उसकी पत्नी बाँस की टोकरियाँ बनाया करती थी। राधा चूँकि समझदार लङकी थी और अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को वह भली-भाँति समझती थी, अतः स्कूल से आते ही वह टोकरियाँ बनाने में जुट जाती थी। जब टोकरियाँ बनकर तैयार हो जाती, तो भोला उन्हें नदी पार के बाजार में बेच आता। इससे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती। इस प्रकार जिन्दगी आराम से कट रही थी।

भोला के पङौस में एक रामू नाम का आदमी रहता था। वह बङा ही ईर्ष्यालु और लालची स्वभाव का आदमी था। पिछले दिनों उसने भी एक नई नाव खरीद ली थी। अब सारे राहगीर उसकी नई नाव में बैठने लगे। भोला की पुरानी-जर्ज़र नाव में कोई नहीं बैठता था, अतः वह उदास रहता था। वह घाट पर जाता तो रोज़ था, पर बहुधा शाम को खाली हाथ ही घर लौटता था। घर की आर्थिक स्थिति बिगङने लगी। भोला को उपाय नहीं सूझ रहा था। राधा जब अपने पिता को उदास देखती, तो उसे बहुत दुःख होता।
एक दिन राधा को एक उपाय सूझा। वह अपने बचत के पैसों से एक सुन्दर-सा मुलायम कालीन खरीद लायी। दूसरे दिन वह मुँह-अंधेरे उठी और पास के बगीचे से रंग-बिरंगे खुश्बूदार फूल चुन लायी। फिर वह घाट पर गई और अपनी नाव में नया कालीन बिछाकर तथा उसे फूलों से सजाकर चुपचाप घर लौट आई। घाट से उसका घर मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर था। उसने किसी को कुछ नहीं बताया। भोला जब घाट पर पहुँचा तो उसने अपनी नाव को नई-नवेली दुल्हन की तरह सजा हुआ पाया। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह सोचने लगा, यह किसका काम हो सकता है? तभी दो-चार राहगीर आकर उसकी नाव में बैठ गये और नाव खोलने की जिद्द करने लगे। भोला ने जैसे ही नाव खोली, दो-चार राहगीर और आ गये। नाव चल पङी। दिनभर भोला के मन में यही उधेङबुन चलती रही कि उसकी नाव को किसने सजाया होगा? आज उसके कई फेरे हुए। वह बहुत खुश था। शाम को जब वह घर लौटा तो राधा के लिए ढ़ेर सारी मिठाई लेता आया। आते ही उसने राधा से पूछा- "क्या नाव को तुमने सजाया था?"
राधा गर्व से बोली- "हाँ पिताजी! मैंने ही सजाया था। कोई दूसरा हमारी नाव को क्यों सजायेगा?"
"और वह नया कालीन?"
"वह मैंने खरीदा था।"
"लेकिन तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?"
"मेरे गुल्लक से..।"
भोला आगे कुछ नहीं पूछ सका। उसका गला रुँध गया और छाती भर आई। आगे बढकर उसने राधा का माथा चूम लिया।
सारे राहगीर अब फिर से भोला की नाव में बैठने लगे। उसकी आमदनी फिर बढने लगी। राधा सुबह उठते ही रोज़ अपनी नाव को फूलों से सजा आया करती थी। भोला जब साँझ को घर लौटता, तो उसके लिए रोज कोई न कोई उपहार अवश्य लाता। वह किसी न किसी बहाने हमेशा राधा की तरफ करता रहता था। और राधा की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। उनकी गाङी फिर से पटरी पर लौट आयी।

अब रामू घाट पर बैठा दिनभर टापता रहता, पर उसकी नाव में कोई भी राहगीर नहीं बैठता। जबकि भोला की नाव हमेशा लदी ही रहती थी। यह देखकर रामू भोला से ईर्ष्या करने लगा। उसने भोला से बदला लेने की सोची। एक दिन वह रात को चुपके-से उठा और घाट पर जाकर भोला की नाव खोल आया।

सुबह राधा जब सजावट के लिए फूल लेकर घाट पर पहुँची तो वहाँ उनकी नाव नहीं थी। वह घबरायी हुई घर आयी और सारी बात भोला को बतायी। भोला भी घबराया हुआ घाट पर पहुँचा, पर उसकी नाव का कहीं अता-पता नहीं था। वह बेदम-सा होकर वहीं बैठ गया। नाव उसके लिए नाव नहीं, बल्कि उसके जीने का सहारा थी; परम मित्र थी; उसकी जिन्दगी थी। वह घुटनों पर सिर रखकर सिसकने लगा। राधा ने उसे ढाढ़स बँधाया।
दो दिन तक भोला ने कुछ नहीं खाया। राधा के बार-बार समझाने पर भी वह दो-चार ग्रास खाकर ही उठ जाता। नाव ने उसकी भूख-प्यास सब हर ली थी। आज जब राधा उठी तो देखा, भोला का शरीर बुखार से तप रहा था। उसने तुरन्त डॉक्टर को बुलाने का फैसला किया। मल्लाहों की बस्ती में कोई डॉक्टर नहीं था, अतः वह नदी पार के डॉक्टर को बुलाने चल दी।

जब वह घाट पर पहुँची तो देखा, वहाँ सिर्फ रामू की नाव ही थी। वह चुपचाप जाकर नाव में बैठ गई, क्योंकि वह जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास पहुँचना चाहती थी। नाव चल पङीँ। आज पानी का बहाव थोङा तेज था। नाव डगमगाती हुई चल रही थी। थोङी ही देर बाद नाव घाट पर पहुँच गई। ईर्ष्यावश रामू ने राधा से डेढ गुना किराया लिया। राधा ने इस समय बहस करना उचित नहीं समझा। वह उतरते ही डॉक्टर के पास गई और अपनी सारी व्यथा कह सुनायी। डॉक्टर साहब भोला को जानते थे, अतः तुरन्त साथ हो लिए। वे दोनों घाट पर पहुँचे तो वही रामू की नाव तैयार थी। दोनों चुपचाप बैठ गये। पानी का बहाव काफी बढ गया था। सभी मल्लाहों ने छुट्टी कर दी थी, पर लालची रामू ने कोई परवाह नहीं की।
नदी के बीच में आते-आते नाव नशे में धुत्त शराबी की तरह लङखङाने लगी। तेज लहरें रह-रहकर नाव का रुख मोङ रही थी। रामू ने पूरा दम-खम लगा दिया, पर नाव नियंत्रित नहीं हुई। वह पसीने-पसीने हो गया। सारे राहगीर घबरा गये। इसी बीच एक तेज लहर ने नाव को एक ओर झुका दिया। रामू एकदम से नदी में गिर पङा और लहर के साथ बहने लगा। सारे राहगीर चीखने-चिल्लाने लगे। उधर रामू मदद के लिए चिल्ला रहा था। अब राधा के चुप बैठने का समय नहीं था। उसने तुरन्त पतवार थाम ली और राहगीरों का हौंसला बढाती हुई बोली- "घबराइये मत! कुछ नहीं होगा। आप झुकाव की विपरित दिशा में खिसक जाऐं और नाव को कसकर पकङ लें।"
राहगीरों ने ऐसा ही किया। एक क्षण में नाव संतुलित होकर सीधी हो गई। तभी एक सज्जन ने उठकर राधा के हाथ से पतवार छीन ली और पूरे जोर-जोश के साथ नाव खेने लगा। सबने राहत की साँस ली। उधर रामू पानी में हाथ-पाँव मार रहा था और बराबर मदद के लिए चिल्लाये जा रहा था। संयोग से नाव में एक धोबी भी बैठा था। राधा की नज़र उसकी कपङों की गठरी पर पङी। उसने बिना एक पल गँवाये राहगीरों की मदद से कपङो में गाँठ लगाकर एक रस्सी बनायी और नदी में डाल दी। बहाव के साथ रस्सी रामू तक पहुँच गई। रामू ने जैसे ही रस्सी को पकङा, राहगीरों ने उसे खींच लिया और रामू को डूबने से बचा लिया। नाव में आते ही रामू राधा के पैरों में गिर पङा और उससे माफी माँगने लगा। राधा पीछे हटकर बोली- "अरे..रे.! यह आप क्या कर रहें हैं दादा? मेरे पैरों में गिरकर आप मुझे लज्जित न करें। आदमी ही आदमी के काम आया करता है। आपको बचाना तो मेरा फ़र्ज था।"
यह सुनकर रामू ने उसे दिल से लगा लिया। पाश्चाताप के आँसुओं ने उसके मन का सारा मैल धो दिया। नाव के घाट पर पहुँचते ही राहगीरों ने राधा को कंधों पर उठा लिया और उसकी जय-जयकार करने लगे।
रोज एक-एक पैसे के लिए झगङने वाले रामू ने आज किसी से भी किराया नहीं लिया।

राधा डॉक्टर को लेकर तुरन्त घर पहुँची। डॉक्टर ने जाँच कर भोला को दवाई दे दी। जब पैसों की बात चली, तो डॉक्टर साहब ने साफ मना कर दिया, बोले- "आज तुम्हारी ही दी हुई यह जिन्दगी अगर तुम्हारे इतनी ही काम न आ सके, तो मेरे जीने को धिक्कार है!"
"पर डॉक्टर साहब! यह तो आपका पेशा है!"
"तो क्या हुआ? आदमी ही आदमी के काम आता है। जिन्दगी का क्या भरोसा कब उठ जाए? आज से मैं भी गरीब-बेसहारा लोगों का मुफ्त में ईलाज किया करूंगा।"
और वे अपना बैग उठाकर चल दिए।

शाम तक जब भोला का ज्वर उतर गया, तो वह राधा के मना करने के बावजूद टोकरियाँ बनाने लगा। तभी रामू आया और भोला के पैरों में गिरकर माफी माँगने लगा। भोला अवाक् रह गया। सोचा, यह आदमी आज एकदम से कैसे बदल गया? रामू कहने लगा, "भैया! मैंने तुम्हारा बहुत नुकसान किया। मुझे माफ कर दो भैया! तुम्हारी नाव को मैंने ही खोला था और वह रातों-रात बहकर समुद्र में जा गिरी थी।" और फिर उसने भोला को आज की सारी घटना बतायी कि कैसे आज राधा ने उन्हें मौत के मुँह से बचा लिया था। भोला ने राधा की तरफ देखा, वह मुस्कुरा रही थी। भोला ने रामू को गले से लगा लिया। रामू ने अपनी नाव भोला को दे दी। आज राधा की सूझबूझ और उसके सदव्यवहार ने रामू का दिल जीत लिया था। वह कहने, "भैया! क्या पङा इस ईर्ष्या-द्वेष में। एक दिन यों ही मर जायेंगे। आज से प्रेम-भाईचारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रहेंगे। यही जीवन का सार है।"

जिस किसी ने भी यह घटना सुनी, वह राधा की बुद्धिमानी और उसकी सूझबूझ की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।

Friday, February 15, 2013

अजीब मौत

खुद से टकराया
गिरा
और मर गया
मौत अजीब थी
लेकिन
आगे की दास्तां और भी अजीब थी
अपनी ही लाश के पास बैठा
वो शख़्स देर तक
फूट-फूटकर रोता रहा...रोता रहा
और जब थक गया
तो
उसका जनाज़ा सजाने लगा
फिर कब्र खोदी
और ख़ुद की लाश को
दफ़न कर दिया
आंखों में सूनापन लिए
भटक रहा है
इसी शहर में
कभी-कभी शहर का शोर
उसके जेहन तक उतरता हो शायद
और धीरे-धीरे
उसकी आंखों से निकला सूनापन
शहर में फैलता जा रहा है
नतीज़ा किसको पता है?
हां कुछ लोग
ज़रूर ख़ुद से टकरा रहे हैं
हां कुछ वैसे ही मरे जा रहे हैं
और अपने कंधों पर
अपनी लाशों को उठाए
शहरवालों की तादाद
गुजरते दिन के साथ
बढ़ती जा रही है
धीरे-धीरे
सूनापन
बढ़ता जा रहा है
जेहन में....शहर में... हर कहीं
कहते हैं...
दुनिया बदल रही है......

पिता

पिता जब बहुत बड़े हो गये
और बूढ़े
तो चीज़ें उन्हें छोटी दिखने लगीं
बहुत-बहुत छोटी

आख़िरकार पिता को
लेना पड़ा चश्मा

चश्मे से चीज़ें
उन्हें बड़ी दिखाई देनी लगीं
पर चीज़ें
जितनी थीं और
जिस रूप में
ठीक वैसा
उतना देखना चाहते थे पिता

वे बुढ़ापे में
देखना चाहते थे
हमें अपने बेटे के रूप में
बच्चों को 'बच्चे' के रूप में
जबकि हम
उनके चश्मे से 'बाप' दिखने लगे थे
और बच्चे 'सयाने'

मां को कैसा लगता होगा?

मां को कैसा लगता होगा?
जन्मा होगा जब कोई फूल
सारे दुःख भूली होगी
देख अपने लाल का मुंह ।

मां को कैसा लगता होगा?
बढ़ते हुए बच्चों को देख
हर सपने पूरी करने को
होगी तत्पर मिट जाने को।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे हुए होंगे जब बड़े
और सफल हो जीवन में
नाम कमाएं होंगे ख़ूब ।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे समझ कर उनको बोझ
गिनने लगे निवाले रोज़
देते होंगे ताने रोज़।

मां को कैसा लगता होगा?
करके याद बातें पुरानी
देने को सारे सुख उनको
पहनी फटा और पी पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
होगी जब जाने की बारी
चाहा होगा पी ले थोड़ा
बच्चों के हाथों से पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
जा बसने में बच्चों से दूर
टकटकी बांधें देखती होगी
उसी प्यार से भरपूर।

मां को कैसा लगता होगा?
मां को कैसा लगता होगा?

एक सपना






आज मरने के अट्ठारह साल बाद
बाबा, भईया को सपना दिखाए हैं
कि नहीं मिल रहा आजकल उनको
टाईम से खाना पानी.


उस सपने को 1 साल हो गया है
तब से माँ, जग जाती है रोज सबेरे
बिना नागा
चढ़ाती है बाबा की फोटो पर फूल
बना के पहली रोटी
रख देती है, तुलसी के चौरा पर
चिरई कऊआ के खाने के लिए
बाबूजी गाँव के पच्छिम वाले पीपल पर फिर से कलसा टांग आए हैं...

Monday, February 4, 2013

कैसा बचपन कैसी शिक्षा

कैसा बचपन कैसी शिक्षा

सुना था तीसरा नेत्र है आदमी का
शिक्षा ही, आधार है देश की तरक्की का
अनेक प्रयास किए गए शिक्षा का स्तर बढ़ाने का,
अनिवार्य हुई शिक्षा बच्चों के लिए...
शिक्षा का स्तर बढ़ा, बनाई गई तरह-तरह की योजनाएँ
लेकिन आज भी, बच्चे पढ़ते हैं,
सरकारी कागजों पर
विद्यालयों का रास्ता नहीं देख पाते बहुत से बच्चे,
शिक्षा के ठेकेदार बैठते हैं होटलों में,
बाते करते हैं अनिवार्य बाल शिक्षा की
और उन्हीं के जूते टेबल को
साफ़ करता दस वर्ष का बच्चा
निकल जाता है
प्रदेश का पुस्तक मेला, बहुत बड़ा पुस्तक मेला,
विविध भाषा की रंग-बिरंगी पुस्तकें
एक किशोरी बारह वर्ष की,
आँखों में कैशोर्य के सपने,
मैले-कुचैले कपड़े पहने,
हाथों में चिर-परिचित-
पीढिय़ों से चली आ रही विरासत
झाड़ू ......झाड़ू लगाते-लगाते पुस्तक देखती
ललचाई नजऱों से
फिर थोड़ा स्पर्श करती, डरते-डरते चित्र देखती,
पढऩे का प्रयास कराती शायद ...
शायद उसे पता नहीं था अपने अधिकार का 
कार्यशाला ज़ारी है, नई शिक्षा पद्धति पर
प्रश्न था ........
कैसे हो बच्चों का मूल्यांकन?
बहुत से गुरुजन प्रस्तुत कर रहे थे अपने-अपने कर्म
लोग नाश्ता करते हैं और
नाश्ता कराता है लगभग आठ वर्ष का एक मासूम ....
बरतन धोता है
उसकी नजऱ बरतन पर कम
मैदान में खेलते बच्चों पर ही टिकी है .......
सब चले गए, अब वह खाली है
दो बच्चे उसी के उम्र के,
खेल रहे थे बास्केट बाल
वह बच्चा दौड़ता है उन्हीं के साथ
और आनंदित होता है
शायद छू लेना चाहता है, बॉल केवल एक बार
एक मासूम सा बच्चा चाय देता है स्कूल में
खोया-खोया सा रहता है 
शायद स्कूल में आकर बैठ जाता है किसी कक्षा में
क्या यही अधिकार है शिक्षा का
सारा देश भरा पडा है
बाल शिक्षा के अधिकार के विज्ञापनों से 
पर सब सारहीन .......!
यह कैसा बचपन और कैसी शिक्षा है? ......