Wednesday, August 17, 2011

हम से बिछड़ गए…


जो ख्याल थे न कयास थे वही लोग हम से बिछड़ गए
मेरी ज़िन्दगी की जो आस थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.


जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल, वही लोग हैं मेरे हमसफ़र
मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.


मुझे लम्हा भर की रफाकतों के अजाब और सतायेंगे
मेरी उम्र भर की जो प्यास थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.


ये ख्याल सारे हैं आरजी, ये गुलाब सारे हैं कागज़ी,
गुले आरज़ू की जो बास थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.


जिन्हें कर सका न कबूल मैं, वो शरीक राहे सफ़र हुए
जो मेरी तलब मेरी आस थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.


ये जो रात दिन मेरे साथ हैं वो हैं अजनबी के अजनबी
वो जो धडकनों की एहसास थे वही लोग हमसे बिछड़ गए.

गुज़री है क्या इस दिल पे…


बहुत समझाता हूँ इसको पर ये कहाँ मानता है
गुज़री है क्या इस दिल पे, बस ये दिल जानता है.

कहाँ फरियाद करूं मैं के ज़माना ही बेवफा है
तड़प इस दिल की खुदा देखता है,खुदा जानता है.

मैं के बे-बस हूँ, मेरा दिल मेरे बस में नहीं है
दिले बेचैन को बहलाना अब मेरे बस में नहीं है.

नाज़ तेरे उठा उठा के गरीब दिल मैं हो गया
अब इस गरीब को कहाँ कोई पहचानता है.

बहुत समझाता हूँ इसको पर ये कहाँ मानता है
गुज़री है क्या इस दिल पे, बस ये दिल जानता है.

ज़माना ठोकरें देता है, महबूब ताने देता है
दिले बेकस ये दुनिया छोड़ के न जाने देता है.

मुहब्बत के चलन में खुद को ही मिट जाना होता है
“राज” मुहब्बत में दिल सिर्फ महबूब को ही मानता है.

बहुत समझाता हूँ इसको पर ये कहाँ मानता है
गुज़री है क्या इस दिल पे, बस ये दिल जानता है.

प्यार की आवाज़


नफ़रत मेरी फितरत नही, मैं प्यार की आवाज़ हूँ,
मैं अमन के दौर का एक अज़नबी आगाज़ हूँ

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फूल की खुशबू नही, ना हूँ शम्मा की रोशनी,
ना हूँ मैं आंधी कोई, ना हवा कोई खाश हूँ,

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कृष्ण सा ना दोस्त हूँ, ना बेरुखी का साज हूँ,
वक़्त का हूँ दास, और माता पिता की आस हूँ,

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ना हूँ मैं संसार की हर रस्म से वाकिफ,
ना ही मैं संसार की हर रस्म से अनजान हूँ,

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मैं हो नही सकता नदी के किनारों का फासला,
ना ही मैं सावन घटा, फूल-ओ-महक का साथ हूँ,

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रात जो पूछे अगर, तुम कौन हो मुसाफिर?
क्या कहूँगा, मुस्कुराया मन में ऐसा सोचकर,

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सोचा कह दूंगा सुनो, इंसान हूँ, हैरान हूँ,
जुगुनू की तरह ही सही, पर तेरा मेहमान हूँ,

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ना सोचो इतना खोकर मैं हूँ भी आखिर कौन?
पहचानो तो हूँ दोस्त, ना जानो तो अनजान हूँ.

अपना-बेगाना


ज़माना कौन सा बदला चुकाना चाहता है
के मेरी मौत हर अपना-बेगाना चाहता है.

मुहब्बत के सफ़र में पड़ गया हूँ मैं अकेला
मेरा महबूब भी पीछा छुड़ाना चाहता है.


मेरा दिल दिल है ये पत्थर नहीं है
किसी की जान ले, ये वो खंज़र नहीं है

ये दिल है, बस रिश्ते निभाना चाहता है
के मेरी मौत हर अपना-बेगाना चाहता है.

मैं था बदनाम मुझको ग़म नहीं था
न था कुछ पास फिर भी कम नहीं था

सनम मेरा बे-मुरव्वत सौदाई निकला

वफ़ा की उम्मीद की, नतीजा बेवफाई निकला

ज़माना बस झुकाना चाहता है
के मेरी मौत हर अपना-बेगाना चाहता है.



बीज़ नफ़रत का


तुम जो बोते हो बीज़ नफ़रत का गैरों के लिए
अपनों के लिए तुम प्यार कहाँ से लाओगे ?


जो तुम बिछाते हो कांटे सब की राहों में
अपने राहों में तुम फूल कहाँ से पाओगे ?


दूसरों का जो तुम छीनते हो चैन-ओ-अमन
जानो खुद तुम दिल का सुकून कैसे पाओगे ?


न होगा कोई तुम्हारा जब इस दुनिया में
सर धुनोगे, रोओगे और पछताओगे.


आज तुम मारते हो माँ के पेट में बेटियाँ
ज़रा सोचो कल तुम बहुएँ कहाँ से लाओगे ?


तमन्ना है बहुत आगे तलक जाने की
तुझे खबर भी है के बस क़ब्र ही तक जाओगे.

ग़र एहसास को समझो,
हम प्‍यार तुम्‍ही से करते है।
तुम समझो या न समझो,
हम प्‍यार तुम्‍ही से करते है।।

सिर्फ तुम


तुम्‍हरी यादो के सहारे,
हम यूँ ही जी रहे है।
कभी तुमको देख कर,
हम यूँ जी-जी कर मर रहे है।

ग़र एहसास को समझो,
हम प्‍यार तुम्‍ही से करते है।
तुम समझो या न समझो,
हम प्‍यार तुम्‍ही से करते है।।

तोड़ के सारे बंधन को,
रिश्‍तो को उन नातो को।
प्‍यार तुम्‍हारा पाने को,
हद से गुजर जाने को।।

इश्‍क की गहराई को,
कभी नापा नही जाता।
प्‍यार को ग़र समझो,
तो प्‍यार की गहराई को खुद नापो।।

हीर रांझा तो हम इतिहास है,
इश्क हमारा तुम्‍हारा सिर्फ आज है।
मेरे दिल के सपनो में आती हो सिर्फ तुम,
आ कर पता नही कब चली जाती हो तुम।।

प्‍यार के मौत


दूरियो के दौर में,
मजबूरियाँ नज़र आती है।
तेरे चाहत की तनहाई मे,
तेरी परछाई नज़र आती है।।

मजबूरी को समझ सको तो,
इश्‍क समझना असां होगा।
मतभेद दिखा कर दूरी हमसे,
हमें हटना आसां होगा।।

हम हट जायेगे मिट जायेगे,
यादो की कश्‍ती टूट जायेगी।
टूटा तागा जुड जाता है,
पर गांठ हृदय को चुभ जाती है।

इश्‍क की गहराई हमे मालूम नही,
नापने इश्‍क की गहराई को हम।
डूबना चाहते थे सागर मे ,
पर सागर को अपने गहराई का अभिमान था।।

सागर के अपने अभिमान से,
प्‍यार की गहराई मे मौत हो गई।
प्‍यार के मौत की पीड़ा आँसू,
सागर मे मिल मीत बन गई।।

सागर को अभिमान बड़ा कि,
प्‍यार तो उसकी गहराई मे है।
मार कर प्‍यार को सागर ने,
नष्‍ट किया उसकी तरूणाई को।।

इजहार नही करते हैं,


दिल के करीब है वो,
नजदीक आते नही।
छुप छुप कर वे,
नखरे दिखाते है वे।।

स्‍कूल की गलियो से,
कालेज के कैम्‍पस तक।
तुम्‍हारे प्‍यार की आस में,
चक्‍कर लगता था।।

ऐसा नही है कि तुम,
हमसे प्‍यार नही करते हो,
लगता है मुझको,
इजहार करने से डरते हो।।