














बचपन का मतलब होता है मौज-मस्ती और खेल-कूद के दिन, जहाँ बच्चा किताबों के माध्यम से ज्ञान अन्वेषण करता है. बाल अवस्था में बच्चा सुख-दुःख से अनजान कभी अपनी किताबों से भरे बस्ते से जूझता है तो कभी अध्यापक द्वारा दिए गए होमवर्क से, कभी खेल के मैदान में क्रिकेट की गेंद से जूझता तो कभी अपने दोस्तों के मनोभावों में बहकर क्रोध का पात्र बनता है. बचपन मासूम होता है, एक बच्चे के लिए उसका घर और स्कूल ही उसका संसार होता है.
जब हम बालिग अवस्था में कदम रखते हैं तो जीवन यापन करने के नए आयाम ढूँढने लगते हैं. रोज़ी-रोटी के संसाधनों की प्राप्ति के लिए हम नौकरी करते हैं और मौज-मस्ती के दिन ज़िम्मेदारी में तब्दील हो जाते हैं. परिवार का उत्तरदायित्व आपके कंधों पर आ जाता है और आप सामाजिक बंधनों से बंध जाते हैं. तब हम अपने बचपन की तरफ तरसी नजरों से देखते हैं और सोचते हैं