कब से धरा कर रही तलाश
कब छाओगे तुम पलाश?
कब अपने मखमली लवों से
तुम मेरा श्रृंगार करोगे?
कब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी मेरी माँग भरोगे?
बोला पलाश, मत हो उदास
मैं यहीं हूँ तेरे आस-पास
बस चलने दे फागुनी बयार और
सज जाने दे अमलताश
तब अपने मखमली लवों से
मैं तेरा श्रृंगार करूँगा
तब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी तेरी माँग भरूँगा।
फिर मौसम ने ली अंगड़ाई
फागुनी हवा इठलाती आई
झूम उठा तब सुर्ख पलाश और
झर-झर बरसा अमलताश।
नभ भी मुस्काया हर्षाया,
कुछ और धरा के पास आया
शरमाई धरा, मुस्काई धरा
नभ को छूने बढ़ आई धरा।
दूर क्षितिज पर जैसे ही
सूरज ने पर्वत को छुआ
सुरमई शाम के आँचल में
नभ और धरा का मिलन हुआ।
पतझड़ के पत्ते झूम-झूम
तब चूम धरा को उड़ने लगे
मखमली पलाश के गेसू फिर
माँग धरा की भरने लगे।
साँझ हुई तब सिंदूरी थी
माँग धरा की सिंदूरी
सिंदूरी सूरज - पर्वत
नभ भी हो आया सिंदूरी।
पर सूना था सिंदूरी पलाश और
सिसक रहा था अमलताश
पतझड़ के काँधे सर रख कर
स्थिर पलाश
करके अपना सर्वस्व वार
निःशब्द खड़ा बस रहा निहार।
इस मिलन - विदा की बेला में
सूरज, पर्वत, पतझड़, फागुन
नव वधू धरा, हर्षित आकाश
कहते थे सब मिल बार-बार
तुम धन्य पलाश, धन्य अमलताश
बोला पलाश अलविदा धरा
अलविदा धरा, अलविदा आकाश।
कब छाओगे तुम पलाश?
कब अपने मखमली लवों से
तुम मेरा श्रृंगार करोगे?
कब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी मेरी माँग भरोगे?
बोला पलाश, मत हो उदास
मैं यहीं हूँ तेरे आस-पास
बस चलने दे फागुनी बयार और
सज जाने दे अमलताश
तब अपने मखमली लवों से
मैं तेरा श्रृंगार करूँगा
तब अपने सिंदूरी रंग से
सूनी तेरी माँग भरूँगा।
फिर मौसम ने ली अंगड़ाई
फागुनी हवा इठलाती आई
झूम उठा तब सुर्ख पलाश और
झर-झर बरसा अमलताश।
नभ भी मुस्काया हर्षाया,
कुछ और धरा के पास आया
शरमाई धरा, मुस्काई धरा
नभ को छूने बढ़ आई धरा।
दूर क्षितिज पर जैसे ही
सूरज ने पर्वत को छुआ
सुरमई शाम के आँचल में
नभ और धरा का मिलन हुआ।
पतझड़ के पत्ते झूम-झूम
तब चूम धरा को उड़ने लगे
मखमली पलाश के गेसू फिर
माँग धरा की भरने लगे।
साँझ हुई तब सिंदूरी थी
माँग धरा की सिंदूरी
सिंदूरी सूरज - पर्वत
नभ भी हो आया सिंदूरी।
पर सूना था सिंदूरी पलाश और
सिसक रहा था अमलताश
पतझड़ के काँधे सर रख कर
स्थिर पलाश
करके अपना सर्वस्व वार
निःशब्द खड़ा बस रहा निहार।
इस मिलन - विदा की बेला में
सूरज, पर्वत, पतझड़, फागुन
नव वधू धरा, हर्षित आकाश
कहते थे सब मिल बार-बार
तुम धन्य पलाश, धन्य अमलताश
बोला पलाश अलविदा धरा
अलविदा धरा, अलविदा आकाश।








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