Saturday, November 2, 2013

बूढ़ा पेड़.

करीब एक साल पहले..
वो बूढ़ा पेड़..
अक्सर खटखटाता था...
सामने वाली खिड़की...
बहुत पुराना राब्ता था...
उस घर से...
एक बुढ़िया थी जो रोज़ उसकी कमर में...
बाँध देती थी कुछ दुआएँ...
रोली से इक रिश्ते का निशान छोड़ के जाती थी...
बहुत दिन जब बुढ़िया नहीं आई...
तब शाख बढ़ा कर खिड़की खटखटाने लगा...
बुढ़िया बीमार थी...
जब जब वो खाँसती...
पेड़ तस्दीक़ करता, कहीं दुआओं का कमरबन्द...
कमज़ोर तो नहीं पड़ रहा...
एक साल हुआ वो बुढ़िया नहीं रही...
अब पेड़ पर भी नयी कोपलें नहीं आती थी...
आज काटा जा रहा है...
तो एक भी आँसू नहीं निकला...
क्यूंकी उस खिड़की से झाँककर देखा था उसने...
नयी पीढ़ी है...
इसे बूढ़े रिश्ते नहीं...
बस स्पेस चाहिए...

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