Wednesday, August 17, 2011

प्यार की आवाज़


नफ़रत मेरी फितरत नही, मैं प्यार की आवाज़ हूँ,
मैं अमन के दौर का एक अज़नबी आगाज़ हूँ

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फूल की खुशबू नही, ना हूँ शम्मा की रोशनी,
ना हूँ मैं आंधी कोई, ना हवा कोई खाश हूँ,

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कृष्ण सा ना दोस्त हूँ, ना बेरुखी का साज हूँ,
वक़्त का हूँ दास, और माता पिता की आस हूँ,

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ना हूँ मैं संसार की हर रस्म से वाकिफ,
ना ही मैं संसार की हर रस्म से अनजान हूँ,

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मैं हो नही सकता नदी के किनारों का फासला,
ना ही मैं सावन घटा, फूल-ओ-महक का साथ हूँ,

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रात जो पूछे अगर, तुम कौन हो मुसाफिर?
क्या कहूँगा, मुस्कुराया मन में ऐसा सोचकर,

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सोचा कह दूंगा सुनो, इंसान हूँ, हैरान हूँ,
जुगुनू की तरह ही सही, पर तेरा मेहमान हूँ,

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ना सोचो इतना खोकर मैं हूँ भी आखिर कौन?
पहचानो तो हूँ दोस्त, ना जानो तो अनजान हूँ.

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