नफ़रत मेरी फितरत नही, मैं प्यार की आवाज़ हूँ,
मैं अमन के दौर का एक अज़नबी आगाज़ हूँ
.
फूल की खुशबू नही, ना हूँ शम्मा की रोशनी,
ना हूँ मैं आंधी कोई, ना हवा कोई खाश हूँ,
.
कृष्ण सा ना दोस्त हूँ, ना बेरुखी का साज हूँ,
वक़्त का हूँ दास, और माता पिता की आस हूँ,
.
ना हूँ मैं संसार की हर रस्म से वाकिफ,
ना ही मैं संसार की हर रस्म से अनजान हूँ,
.
मैं हो नही सकता नदी के किनारों का फासला,
ना ही मैं सावन घटा, फूल-ओ-महक का साथ हूँ,
.
रात जो पूछे अगर, तुम कौन हो मुसाफिर?
क्या कहूँगा, मुस्कुराया मन में ऐसा सोचकर,
.
सोचा कह दूंगा सुनो, इंसान हूँ, हैरान हूँ,
जुगुनू की तरह ही सही, पर तेरा मेहमान हूँ,
.
ना सोचो इतना खोकर मैं हूँ भी आखिर कौन?
पहचानो तो हूँ दोस्त, ना जानो तो अनजान हूँ.
No comments:
Post a Comment