तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे सुबह पहली गाड़ी से ... खिंचे खिंचे हुए रहते हो क्यूं खिंचे खिंचे हुए रहते हो ध्यान किसका है ज़रा बताओ तो ये इम्तेहान किसका है हमें भुला दो मगर ये तो याद ही होगा नई सड़क पे पुराना मकान किसका है जब तुम्हें अकेले में मेरी याद आएगी आँसुओं की बारिश में तुम भी भीग जाओगे ग़म की धूप में दिल की हसरतें न जल जाएं तुझको ऐ तुझको देखने सितारे तो जिया मांगेंगे अपने कांधे से दुपट्टा न सरकने देना वरना बूढ़े भी जवानी की दुआ मांगेंगे ईमान से गेसुओं के साए में मुझको क़त्ल कर डालो शौक़ से मगर सोचो इस शहर\-ए\-नामुराद की इज़्ज़त करेगा कौन अरे हम भी चले गए तो मुहब्बत करेगा कौन इस घर की देखभाल को वीरानियां तो हों जाले हटा दिये तो हिफ़ाज़त करेगा कौन मेरे बाद तुम किस पर ये बिजलियां गिराओगे यूं तो ज़िंदगी अपनी मैकदे में गुज़री है अश्क़ों में हुस्न\-ओ\-रंग समोता रहा हूँ मैं आंचल किसी का थाम के रोता रहा हूँ मैं निखरा है जा के अब कहीं चेहरा शऊर का बहकी हुई बहार ने पीना सिखा दिया पीता हूँ इस गरज़ से के जीना है चार दिन मरने के इंतज़ार में पीना सीख लिया इन नशीली आँखों से अरे कब हमें पिलाओगे जब तुम से इत्तेफ़ाकन मेरी नज़र मिली थी अब याद आ रहा है शायद वो जनवरी थी तुम यूं मिलीं दुबारा फिर माह\-ए\-फ़रवरी में जैसे कि हमसफ़र हो तुम राह\-ए\-ज़िंदगी में कितना हसीं ज़माना आया था मार्च लेकर राह\-ए\-वफ़ा पे थीं तुम वादों की torchलेकर मांगा जो अहद\-ए\-उल्फ़त अप्रैल चल रहा था दुनिया बदल रही थी मौसम बदल रहा था लेकिन मई जब आई जलने लगा ज़माना हर शख्स की ज़ुबां पर था बस यही फ़साना दुनिया के डर से तुमने बदली थीं जब निगाहें था जून का महीना लब पे थीं गर्म आहें जुलाई में जो तुमने की बातचीत कुछ कम थे आसमां पे बादल और मेरी आँखें पुरनम माह\-ए\-अगस्त में जब बरसात हो रही थी बस आँसुओं की बारिश दिन रात हो रही थी कुछ याद आ रहा है वो माह था सितम्बर भेजा था तुमने मुझको तर्क़\-ए\-वफ़ा का letter तुम गैर हो रही थीं अक्टूबर आ गया था दुनिया बदल चुकी थी मौसम बदल चुका था जब आ गया नवम्बर ऐसी भी रात आई मुझसे तुम्हें छुड़ाने सजकर बारात आई वो क़ैफ़ था दिसम्बर जज़्बात मर चुके थे मौसम था सर्द उसमें अरमां बिखर चुके थे लेकिन ये क्या बताऊं अब हाल दूसरा है अरे वो साल दूसरा था ये साल दूसरा है क्या करोगे तुम आखिर कब्र पर मेरी आकर थोड़ी देर रो लोगे और भूल जाओगे तुम तो ठहरे परदेसी ...
यूं बड़ी देर से पैमाना लिए बैठा हूँ
कोई देखे तो ये समझे के पिए बैठा हूँ
जिंदगी भर के लिए रूठ के जाने वाले
मैं अभी तक तेरी तस्वीर लिए बैठा हूँ
फूल के साथ साथ गुलशन में
सोचता हूँ बबूल भी होंगे
क्या हुआ उसने बेवफाई की
उसके अपने उसूल भी होंगे
गम जुदाई का यूं तो बहुत था मगर
दूर तक हाथ फिर भी हिलाना पड़ा
बैठ कर रेलगाड़ी में वो चल दिए
रोते रोते हमें घर को आना पड़ा
गम जुदाई का यूं...
वो तो चल भी दिया, दिल मेरा तोड़ कर
मुझ पे बीती है क्या, काश लेता खबर
ये वो गम है जो होगा न कम उम्र भर
होगा पानी का क्या पत्थरों पे असर
इतना रोया हूँ मैं, याद कर के उसे
आसुओं में मुझे डूब जाना पड़ा
गम जुदाई का यूं...
जिसकी खातिर ज़माने को ठुकरा दिया
उसकी चाहत में मुझको मिला ये सिला
गैर के साथ उसका मिलन हो गया
मेरी मजबूरियों की नहीं इंतेहा
उसकी शादी में उसकी खुशी के लिए
प्यार के गीत मुझको भी गाना पड़ा
गम जुदाई का यूं तो बहुत था मगर
दूर तक हाथ फिर भी हिलाना पड़ा
बैठ कर रेलगाड़ी में वो चल दिए
रोते रोते हमें घर को आना पड़ा
इस शहर-ए-नामुराद की इज़्ज़त करेगा कौन...
हम ही चले गये तो मोहब्बत करेगा कौन...
इस घर की देख-रेख के लिए वीरनियाँ तो हों...
जाले हटा दिए तो हिफ़ाज़त करेगा कौन...
सदमे से टूटने के लिए कुछ तो चाहिए...
कुछ भी नहीं तो इसकी शिकायत करेगा कौन...
मुझको खबर तो है की तू कमजोर है मगर...
मैं ये भी जनता हूँ हिमायत करेगा कौन...
खिंचे खिंचे से रहते हो, क्यों
खिंचे खिंचे से रहते हो, ध्यान किसका है
ज़रा बताओ तो ये इम्तेहान किसका है
हमें भुला दो मगर ये तो याद ही होगा
हमें भुला दो मगर ये तो याद ही होगा
नई सड़क पे पुराना मकान किसका है
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