ना रहींम ना राम आया
ये अकेलापन ही आखिर मेरे काम आया
पुकारा जब भी जरूरत में मैंने
ना कोई दुआ दिखी ना कोई सलाम आया
काफिलों में चला था मैं हमेशा
मगर तनहा दिखा जब भी कोई मुकाम आया
आया नही जवाब गर किसीका नाम पुकारा
बस दीवारों से टकराकर वापस हर एक नाम आया
ज़िन्दगी गुज़री है महफिलों में मैंने
फिर भी उस भीड़ में हर पल खुद को तनहा पाया
उजालों में बड़े साथी हुआ करते थे मेरे
अँधेरा क्या हुआ न साथी रहे न मेरा साया
तडपता था दिल के तू तनहा क्यों हैं
ये तन्हाई ही तेरी ताकत है मैं दिल को समझाया
ना रहींम आया और ना राम आया
ये अकेलापन ही आखिर मेरे काम आया
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