बुद्धिमान राधा
भोला एक गरीब मल्लाह था। वह प्रतिदिन सुबह से शाम तक अपनी नाव से राहगीरों को नदी के इस पार से उस पार तथा उस पार से इस पार पहुँचाया करता था। इससे जो कुछ आदमनी होती, उसी से वह अपना गुजर-बसर करता। भोला की एक बेटी थी- राधा। राधा एक मेहनती व बुद्धिमान लङकी थी। अपनी कक्षा में वह हमेशा प्रथम आती थी। भोला अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। वह उसके लिए हमेशा उसकी पसंद की कोई न कोई चीज अवश्य लाया करता था।
भोला की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसकी अकेले की कमाई से घर के खर्चे पूरे नहीं पङते थे, अतः उसकी पत्नी बाँस की टोकरियाँ बनाया करती थी। राधा चूँकि समझदार लङकी थी और अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को वह भली-भाँति समझती थी, अतः स्कूल से आते ही वह टोकरियाँ बनाने में जुट जाती थी। जब टोकरियाँ बनकर तैयार हो जाती, तो भोला उन्हें नदी पार के बाजार में बेच आता। इससे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती। इस प्रकार जिन्दगी आराम से कट रही थी।
भोला के पङौस में एक रामू नाम का आदमी रहता था। वह बङा ही ईर्ष्यालु और लालची स्वभाव का आदमी था। पिछले दिनों उसने भी एक नई नाव खरीद ली थी। अब सारे राहगीर उसकी नई नाव में बैठने लगे। भोला की पुरानी-जर्ज़र नाव में कोई नहीं बैठता था, अतः वह उदास रहता था। वह घाट पर जाता तो रोज़ था, पर बहुधा शाम को खाली हाथ ही घर लौटता था। घर की आर्थिक स्थिति बिगङने लगी। भोला को उपाय नहीं सूझ रहा था। राधा जब अपने पिता को उदास देखती, तो उसे बहुत दुःख होता।
एक दिन राधा को एक उपाय सूझा। वह अपने बचत के पैसों से एक सुन्दर-सा मुलायम कालीन खरीद लायी। दूसरे दिन वह मुँह-अंधेरे उठी और पास के बगीचे से रंग-बिरंगे खुश्बूदार फूल चुन लायी। फिर वह घाट पर गई और अपनी नाव में नया कालीन बिछाकर तथा उसे फूलों से सजाकर चुपचाप घर लौट आई। घाट से उसका घर मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर था। उसने किसी को कुछ नहीं बताया। भोला जब घाट पर पहुँचा तो उसने अपनी नाव को नई-नवेली दुल्हन की तरह सजा हुआ पाया। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह सोचने लगा, यह किसका काम हो सकता है? तभी दो-चार राहगीर आकर उसकी नाव में बैठ गये और नाव खोलने की जिद्द करने लगे। भोला ने जैसे ही नाव खोली, दो-चार राहगीर और आ गये। नाव चल पङी। दिनभर भोला के मन में यही उधेङबुन चलती रही कि उसकी नाव को किसने सजाया होगा? आज उसके कई फेरे हुए। वह बहुत खुश था। शाम को जब वह घर लौटा तो राधा के लिए ढ़ेर सारी मिठाई लेता आया। आते ही उसने राधा से पूछा- "क्या नाव को तुमने सजाया था?"
राधा गर्व से बोली- "हाँ पिताजी! मैंने ही सजाया था। कोई दूसरा हमारी नाव को क्यों सजायेगा?"
"और वह नया कालीन?"
"वह मैंने खरीदा था।"
"लेकिन तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?"
"मेरे गुल्लक से..।"
भोला आगे कुछ नहीं पूछ सका। उसका गला रुँध गया और छाती भर आई। आगे बढकर उसने राधा का माथा चूम लिया।
सारे राहगीर अब फिर से भोला की नाव में बैठने लगे। उसकी आमदनी फिर बढने लगी। राधा सुबह उठते ही रोज़ अपनी नाव को फूलों से सजा आया करती थी। भोला जब साँझ को घर लौटता, तो उसके लिए रोज कोई न कोई उपहार अवश्य लाता। वह किसी न किसी बहाने हमेशा राधा की तरफ करता रहता था। और राधा की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। उनकी गाङी फिर से पटरी पर लौट आयी।
अब रामू घाट पर बैठा दिनभर टापता रहता, पर उसकी नाव में कोई भी राहगीर नहीं बैठता। जबकि भोला की नाव हमेशा लदी ही रहती थी। यह देखकर रामू भोला से ईर्ष्या करने लगा। उसने भोला से बदला लेने की सोची। एक दिन वह रात को चुपके-से उठा और घाट पर जाकर भोला की नाव खोल आया।
सुबह राधा जब सजावट के लिए फूल लेकर घाट पर पहुँची तो वहाँ उनकी नाव नहीं थी। वह घबरायी हुई घर आयी और सारी बात भोला को बतायी। भोला भी घबराया हुआ घाट पर पहुँचा, पर उसकी नाव का कहीं अता-पता नहीं था। वह बेदम-सा होकर वहीं बैठ गया। नाव उसके लिए नाव नहीं, बल्कि उसके जीने का सहारा थी; परम मित्र थी; उसकी जिन्दगी थी। वह घुटनों पर सिर रखकर सिसकने लगा। राधा ने उसे ढाढ़स बँधाया।
दो दिन तक भोला ने कुछ नहीं खाया। राधा के बार-बार समझाने पर भी वह दो-चार ग्रास खाकर ही उठ जाता। नाव ने उसकी भूख-प्यास सब हर ली थी। आज जब राधा उठी तो देखा, भोला का शरीर बुखार से तप रहा था। उसने तुरन्त डॉक्टर को बुलाने का फैसला किया। मल्लाहों की बस्ती में कोई डॉक्टर नहीं था, अतः वह नदी पार के डॉक्टर को बुलाने चल दी।
जब वह घाट पर पहुँची तो देखा, वहाँ सिर्फ रामू की नाव ही थी। वह चुपचाप जाकर नाव में बैठ गई, क्योंकि वह जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास पहुँचना चाहती थी। नाव चल पङीँ। आज पानी का बहाव थोङा तेज था। नाव डगमगाती हुई चल रही थी। थोङी ही देर बाद नाव घाट पर पहुँच गई। ईर्ष्यावश रामू ने राधा से डेढ गुना किराया लिया। राधा ने इस समय बहस करना उचित नहीं समझा। वह उतरते ही डॉक्टर के पास गई और अपनी सारी व्यथा कह सुनायी। डॉक्टर साहब भोला को जानते थे, अतः तुरन्त साथ हो लिए। वे दोनों घाट पर पहुँचे तो वही रामू की नाव तैयार थी। दोनों चुपचाप बैठ गये। पानी का बहाव काफी बढ गया था। सभी मल्लाहों ने छुट्टी कर दी थी, पर लालची रामू ने कोई परवाह नहीं की।
नदी के बीच में आते-आते नाव नशे में धुत्त शराबी की तरह लङखङाने लगी। तेज लहरें रह-रहकर नाव का रुख मोङ रही थी। रामू ने पूरा दम-खम लगा दिया, पर नाव नियंत्रित नहीं हुई। वह पसीने-पसीने हो गया। सारे राहगीर घबरा गये। इसी बीच एक तेज लहर ने नाव को एक ओर झुका दिया। रामू एकदम से नदी में गिर पङा और लहर के साथ बहने लगा। सारे राहगीर चीखने-चिल्लाने लगे। उधर रामू मदद के लिए चिल्ला रहा था। अब राधा के चुप बैठने का समय नहीं था। उसने तुरन्त पतवार थाम ली और राहगीरों का हौंसला बढाती हुई बोली- "घबराइये मत! कुछ नहीं होगा। आप झुकाव की विपरित दिशा में खिसक जाऐं और नाव को कसकर पकङ लें।"
राहगीरों ने ऐसा ही किया। एक क्षण में नाव संतुलित होकर सीधी हो गई। तभी एक सज्जन ने उठकर राधा के हाथ से पतवार छीन ली और पूरे जोर-जोश के साथ नाव खेने लगा। सबने राहत की साँस ली। उधर रामू पानी में हाथ-पाँव मार रहा था और बराबर मदद के लिए चिल्लाये जा रहा था। संयोग से नाव में एक धोबी भी बैठा था। राधा की नज़र उसकी कपङों की गठरी पर पङी। उसने बिना एक पल गँवाये राहगीरों की मदद से कपङो में गाँठ लगाकर एक रस्सी बनायी और नदी में डाल दी। बहाव के साथ रस्सी रामू तक पहुँच गई। रामू ने जैसे ही रस्सी को पकङा, राहगीरों ने उसे खींच लिया और रामू को डूबने से बचा लिया। नाव में आते ही रामू राधा के पैरों में गिर पङा और उससे माफी माँगने लगा। राधा पीछे हटकर बोली- "अरे..रे.! यह आप क्या कर रहें हैं दादा? मेरे पैरों में गिरकर आप मुझे लज्जित न करें। आदमी ही आदमी के काम आया करता है। आपको बचाना तो मेरा फ़र्ज था।"
यह सुनकर रामू ने उसे दिल से लगा लिया। पाश्चाताप के आँसुओं ने उसके मन का सारा मैल धो दिया। नाव के घाट पर पहुँचते ही राहगीरों ने राधा को कंधों पर उठा लिया और उसकी जय-जयकार करने लगे।
रोज एक-एक पैसे के लिए झगङने वाले रामू ने आज किसी से भी किराया नहीं लिया।
राधा डॉक्टर को लेकर तुरन्त घर पहुँची। डॉक्टर ने जाँच कर भोला को दवाई दे दी। जब पैसों की बात चली, तो डॉक्टर साहब ने साफ मना कर दिया, बोले- "आज तुम्हारी ही दी हुई यह जिन्दगी अगर तुम्हारे इतनी ही काम न आ सके, तो मेरे जीने को धिक्कार है!"
"पर डॉक्टर साहब! यह तो आपका पेशा है!"
"तो क्या हुआ? आदमी ही आदमी के काम आता है। जिन्दगी का क्या भरोसा कब उठ जाए? आज से मैं भी गरीब-बेसहारा लोगों का मुफ्त में ईलाज किया करूंगा।"
और वे अपना बैग उठाकर चल दिए।
शाम तक जब भोला का ज्वर उतर गया, तो वह राधा के मना करने के बावजूद टोकरियाँ बनाने लगा। तभी रामू आया और भोला के पैरों में गिरकर माफी माँगने लगा। भोला अवाक् रह गया। सोचा, यह आदमी आज एकदम से कैसे बदल गया? रामू कहने लगा, "भैया! मैंने तुम्हारा बहुत नुकसान किया। मुझे माफ कर दो भैया! तुम्हारी नाव को मैंने ही खोला था और वह रातों-रात बहकर समुद्र में जा गिरी थी।" और फिर उसने भोला को आज की सारी घटना बतायी कि कैसे आज राधा ने उन्हें मौत के मुँह से बचा लिया था। भोला ने राधा की तरफ देखा, वह मुस्कुरा रही थी। भोला ने रामू को गले से लगा लिया। रामू ने अपनी नाव भोला को दे दी। आज राधा की सूझबूझ और उसके सदव्यवहार ने रामू का दिल जीत लिया था। वह कहने, "भैया! क्या पङा इस ईर्ष्या-द्वेष में। एक दिन यों ही मर जायेंगे। आज से प्रेम-भाईचारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रहेंगे। यही जीवन का सार है।"
जिस किसी ने भी यह घटना सुनी, वह राधा की बुद्धिमानी और उसकी सूझबूझ की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।
भोला एक गरीब मल्लाह था। वह प्रतिदिन सुबह से शाम तक अपनी नाव से राहगीरों को नदी के इस पार से उस पार तथा उस पार से इस पार पहुँचाया करता था। इससे जो कुछ आदमनी होती, उसी से वह अपना गुजर-बसर करता। भोला की एक बेटी थी- राधा। राधा एक मेहनती व बुद्धिमान लङकी थी। अपनी कक्षा में वह हमेशा प्रथम आती थी। भोला अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था। वह उसके लिए हमेशा उसकी पसंद की कोई न कोई चीज अवश्य लाया करता था।
भोला की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसकी अकेले की कमाई से घर के खर्चे पूरे नहीं पङते थे, अतः उसकी पत्नी बाँस की टोकरियाँ बनाया करती थी। राधा चूँकि समझदार लङकी थी और अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को वह भली-भाँति समझती थी, अतः स्कूल से आते ही वह टोकरियाँ बनाने में जुट जाती थी। जब टोकरियाँ बनकर तैयार हो जाती, तो भोला उन्हें नदी पार के बाजार में बेच आता। इससे कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती। इस प्रकार जिन्दगी आराम से कट रही थी।
भोला के पङौस में एक रामू नाम का आदमी रहता था। वह बङा ही ईर्ष्यालु और लालची स्वभाव का आदमी था। पिछले दिनों उसने भी एक नई नाव खरीद ली थी। अब सारे राहगीर उसकी नई नाव में बैठने लगे। भोला की पुरानी-जर्ज़र नाव में कोई नहीं बैठता था, अतः वह उदास रहता था। वह घाट पर जाता तो रोज़ था, पर बहुधा शाम को खाली हाथ ही घर लौटता था। घर की आर्थिक स्थिति बिगङने लगी। भोला को उपाय नहीं सूझ रहा था। राधा जब अपने पिता को उदास देखती, तो उसे बहुत दुःख होता।
एक दिन राधा को एक उपाय सूझा। वह अपने बचत के पैसों से एक सुन्दर-सा मुलायम कालीन खरीद लायी। दूसरे दिन वह मुँह-अंधेरे उठी और पास के बगीचे से रंग-बिरंगे खुश्बूदार फूल चुन लायी। फिर वह घाट पर गई और अपनी नाव में नया कालीन बिछाकर तथा उसे फूलों से सजाकर चुपचाप घर लौट आई। घाट से उसका घर मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर था। उसने किसी को कुछ नहीं बताया। भोला जब घाट पर पहुँचा तो उसने अपनी नाव को नई-नवेली दुल्हन की तरह सजा हुआ पाया। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह सोचने लगा, यह किसका काम हो सकता है? तभी दो-चार राहगीर आकर उसकी नाव में बैठ गये और नाव खोलने की जिद्द करने लगे। भोला ने जैसे ही नाव खोली, दो-चार राहगीर और आ गये। नाव चल पङी। दिनभर भोला के मन में यही उधेङबुन चलती रही कि उसकी नाव को किसने सजाया होगा? आज उसके कई फेरे हुए। वह बहुत खुश था। शाम को जब वह घर लौटा तो राधा के लिए ढ़ेर सारी मिठाई लेता आया। आते ही उसने राधा से पूछा- "क्या नाव को तुमने सजाया था?"
राधा गर्व से बोली- "हाँ पिताजी! मैंने ही सजाया था। कोई दूसरा हमारी नाव को क्यों सजायेगा?"
"और वह नया कालीन?"
"वह मैंने खरीदा था।"
"लेकिन तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आये?"
"मेरे गुल्लक से..।"
भोला आगे कुछ नहीं पूछ सका। उसका गला रुँध गया और छाती भर आई। आगे बढकर उसने राधा का माथा चूम लिया।
सारे राहगीर अब फिर से भोला की नाव में बैठने लगे। उसकी आमदनी फिर बढने लगी। राधा सुबह उठते ही रोज़ अपनी नाव को फूलों से सजा आया करती थी। भोला जब साँझ को घर लौटता, तो उसके लिए रोज कोई न कोई उपहार अवश्य लाता। वह किसी न किसी बहाने हमेशा राधा की तरफ करता रहता था। और राधा की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। उनकी गाङी फिर से पटरी पर लौट आयी।
अब रामू घाट पर बैठा दिनभर टापता रहता, पर उसकी नाव में कोई भी राहगीर नहीं बैठता। जबकि भोला की नाव हमेशा लदी ही रहती थी। यह देखकर रामू भोला से ईर्ष्या करने लगा। उसने भोला से बदला लेने की सोची। एक दिन वह रात को चुपके-से उठा और घाट पर जाकर भोला की नाव खोल आया।
सुबह राधा जब सजावट के लिए फूल लेकर घाट पर पहुँची तो वहाँ उनकी नाव नहीं थी। वह घबरायी हुई घर आयी और सारी बात भोला को बतायी। भोला भी घबराया हुआ घाट पर पहुँचा, पर उसकी नाव का कहीं अता-पता नहीं था। वह बेदम-सा होकर वहीं बैठ गया। नाव उसके लिए नाव नहीं, बल्कि उसके जीने का सहारा थी; परम मित्र थी; उसकी जिन्दगी थी। वह घुटनों पर सिर रखकर सिसकने लगा। राधा ने उसे ढाढ़स बँधाया।
दो दिन तक भोला ने कुछ नहीं खाया। राधा के बार-बार समझाने पर भी वह दो-चार ग्रास खाकर ही उठ जाता। नाव ने उसकी भूख-प्यास सब हर ली थी। आज जब राधा उठी तो देखा, भोला का शरीर बुखार से तप रहा था। उसने तुरन्त डॉक्टर को बुलाने का फैसला किया। मल्लाहों की बस्ती में कोई डॉक्टर नहीं था, अतः वह नदी पार के डॉक्टर को बुलाने चल दी।
जब वह घाट पर पहुँची तो देखा, वहाँ सिर्फ रामू की नाव ही थी। वह चुपचाप जाकर नाव में बैठ गई, क्योंकि वह जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास पहुँचना चाहती थी। नाव चल पङीँ। आज पानी का बहाव थोङा तेज था। नाव डगमगाती हुई चल रही थी। थोङी ही देर बाद नाव घाट पर पहुँच गई। ईर्ष्यावश रामू ने राधा से डेढ गुना किराया लिया। राधा ने इस समय बहस करना उचित नहीं समझा। वह उतरते ही डॉक्टर के पास गई और अपनी सारी व्यथा कह सुनायी। डॉक्टर साहब भोला को जानते थे, अतः तुरन्त साथ हो लिए। वे दोनों घाट पर पहुँचे तो वही रामू की नाव तैयार थी। दोनों चुपचाप बैठ गये। पानी का बहाव काफी बढ गया था। सभी मल्लाहों ने छुट्टी कर दी थी, पर लालची रामू ने कोई परवाह नहीं की।
नदी के बीच में आते-आते नाव नशे में धुत्त शराबी की तरह लङखङाने लगी। तेज लहरें रह-रहकर नाव का रुख मोङ रही थी। रामू ने पूरा दम-खम लगा दिया, पर नाव नियंत्रित नहीं हुई। वह पसीने-पसीने हो गया। सारे राहगीर घबरा गये। इसी बीच एक तेज लहर ने नाव को एक ओर झुका दिया। रामू एकदम से नदी में गिर पङा और लहर के साथ बहने लगा। सारे राहगीर चीखने-चिल्लाने लगे। उधर रामू मदद के लिए चिल्ला रहा था। अब राधा के चुप बैठने का समय नहीं था। उसने तुरन्त पतवार थाम ली और राहगीरों का हौंसला बढाती हुई बोली- "घबराइये मत! कुछ नहीं होगा। आप झुकाव की विपरित दिशा में खिसक जाऐं और नाव को कसकर पकङ लें।"
राहगीरों ने ऐसा ही किया। एक क्षण में नाव संतुलित होकर सीधी हो गई। तभी एक सज्जन ने उठकर राधा के हाथ से पतवार छीन ली और पूरे जोर-जोश के साथ नाव खेने लगा। सबने राहत की साँस ली। उधर रामू पानी में हाथ-पाँव मार रहा था और बराबर मदद के लिए चिल्लाये जा रहा था। संयोग से नाव में एक धोबी भी बैठा था। राधा की नज़र उसकी कपङों की गठरी पर पङी। उसने बिना एक पल गँवाये राहगीरों की मदद से कपङो में गाँठ लगाकर एक रस्सी बनायी और नदी में डाल दी। बहाव के साथ रस्सी रामू तक पहुँच गई। रामू ने जैसे ही रस्सी को पकङा, राहगीरों ने उसे खींच लिया और रामू को डूबने से बचा लिया। नाव में आते ही रामू राधा के पैरों में गिर पङा और उससे माफी माँगने लगा। राधा पीछे हटकर बोली- "अरे..रे.! यह आप क्या कर रहें हैं दादा? मेरे पैरों में गिरकर आप मुझे लज्जित न करें। आदमी ही आदमी के काम आया करता है। आपको बचाना तो मेरा फ़र्ज था।"
यह सुनकर रामू ने उसे दिल से लगा लिया। पाश्चाताप के आँसुओं ने उसके मन का सारा मैल धो दिया। नाव के घाट पर पहुँचते ही राहगीरों ने राधा को कंधों पर उठा लिया और उसकी जय-जयकार करने लगे।
रोज एक-एक पैसे के लिए झगङने वाले रामू ने आज किसी से भी किराया नहीं लिया।
राधा डॉक्टर को लेकर तुरन्त घर पहुँची। डॉक्टर ने जाँच कर भोला को दवाई दे दी। जब पैसों की बात चली, तो डॉक्टर साहब ने साफ मना कर दिया, बोले- "आज तुम्हारी ही दी हुई यह जिन्दगी अगर तुम्हारे इतनी ही काम न आ सके, तो मेरे जीने को धिक्कार है!"
"पर डॉक्टर साहब! यह तो आपका पेशा है!"
"तो क्या हुआ? आदमी ही आदमी के काम आता है। जिन्दगी का क्या भरोसा कब उठ जाए? आज से मैं भी गरीब-बेसहारा लोगों का मुफ्त में ईलाज किया करूंगा।"
और वे अपना बैग उठाकर चल दिए।
शाम तक जब भोला का ज्वर उतर गया, तो वह राधा के मना करने के बावजूद टोकरियाँ बनाने लगा। तभी रामू आया और भोला के पैरों में गिरकर माफी माँगने लगा। भोला अवाक् रह गया। सोचा, यह आदमी आज एकदम से कैसे बदल गया? रामू कहने लगा, "भैया! मैंने तुम्हारा बहुत नुकसान किया। मुझे माफ कर दो भैया! तुम्हारी नाव को मैंने ही खोला था और वह रातों-रात बहकर समुद्र में जा गिरी थी।" और फिर उसने भोला को आज की सारी घटना बतायी कि कैसे आज राधा ने उन्हें मौत के मुँह से बचा लिया था। भोला ने राधा की तरफ देखा, वह मुस्कुरा रही थी। भोला ने रामू को गले से लगा लिया। रामू ने अपनी नाव भोला को दे दी। आज राधा की सूझबूझ और उसके सदव्यवहार ने रामू का दिल जीत लिया था। वह कहने, "भैया! क्या पङा इस ईर्ष्या-द्वेष में। एक दिन यों ही मर जायेंगे। आज से प्रेम-भाईचारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रहेंगे। यही जीवन का सार है।"
जिस किसी ने भी यह घटना सुनी, वह राधा की बुद्धिमानी और उसकी सूझबूझ की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।
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