बारूद के ढेर पर दुनिया
मुकेश चंद्र श्रीवास्तव
समूची दुनिया के देश हथियारों के दीवाने हैं। हथियार जुटाने की जैसे होड़ सी मची है। तरह-तरह के हथियार हैं, एक से बढ़कर एक मारक, पलक झपकते ही हजारों-लाखों लोगों और यहां तक कि शहरों तक को www.kuchhpal.bolgsot.inशिकार बना डालने वाले परमाणु, जैविक और रासायनिक अस्त्रों को आधुनिकतम बनाने के लिए बड़े-बड़े शोध हो रहे हैं। अपने नागरिकों की मूल समस्याओं के निराकरण का रास्ता ढूंढने के बजाए देश बड़ी राशि हथियारों की खरीद में खपा रहे हैं। भारत भी पीछे नहीं, पाकिस्तान जैसे प्रत्यक्ष और चीन सरीखे छिपे हुए दुश्मन से मुकाबला करने के लिए हमें बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। भारत ने परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल की और परमाणु विस्फोट के माध्यम से यह जगजाहिर हुआ, तब हमारे देश में दो तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं। एक पक्ष का कहना था कि परमाणु बम बwww.journalistmukesh.blogspot.inनाने के क्षेत्र में उतरकर भारत ने बहुत बड़ी भूल की है। यह हमारी विश्व नीति के खिलाफ है। दूसरे पक्ष में बहुत थोड़े-से लोग थे। इनका कहना था कि परमाणु बम जरूरी हथियार हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा बजट पर खर्च कम हो जाता है। पाक के पास भी यह अस्त्र हैं इसलिये समानता के इस तर्क से भारत और पाकिस्तान के बीच अब युद्ध नहीं हो सकता। हथियारों की इस होड़ और भयावहता पर एक रिपोर्ट।
भारत से आगे पाक
स्वीडन की प्रतिष्ठित संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान के पास भारत से अधिक परमाणु हथियार हैं। भारत के पास 80 से 100 और पाकिस्तान के पास 90-110 परमाणु हथियार हैं। भारत और पाकिस्तान भी सैन्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए परमाणु हथियारों के जखीरे का विस्तार कर रहे हैं। भारत और पाकिस्तान लगातार ऐसे सिस्टम बना रहे हैं जिससे परमाणु हथियारों का इस्तेमाल और विस्तार सैन्य जरुरतों के लिए किया जा सके। विश्व की आठ परमाणु शक्तियों के पास 19 हजार एटमी हथियार हैं।भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश
एक अध्ययन ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बताया है। वर्ष 2007 से 2011 के बीच की अवधि के इस अध्ययन के मुताबिक हथियारों के आयात में दक्षिण कोरिया दूसरे और पाकिस्तान व चीन तीसरे स्थान पर रहे। स्टॉकहोम इन्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2002-06 की पांच वर्ष की अवधि की तुलना में वर्ष 2007-11 की अवधि में दुनिया में 24 फीसदी अधिक हथियारों की खरीद फरोख्त हुई। इस अवधि में सभी पांच शीर्ष हथियार आयातक देश एशिया के हैं। आंकड़ों के मुताबिक एशियाई और ओशिनियाई देशों की हिस्सेदारी कुल आयात में 44 फीसदी रही जबकि यूरोपीय देशों ने 19 फीसदी, मध्य पूर्व ने 17 फीसदी और अमेरिकी देशों ने 11 फीसदी हथियारों का आयात किया। सबसे कम अफ्रीकी देशों ने नौ फीसदी हथियार आयात किए। दुनिया के कुल हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी रही और वह सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा। शनिवार को ही भारत ने बीस हजार करोड़ रुपये के रक्षा खरीद को स्वीकृति दी है। इसके तहत सतह से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों की आठ रेजीमेंट की जरूरतों की भी पूर्ति होगी।चीन ने बढ़ाया रक्षा बजट
चीन ने इस साल अपने रक्षा बजट में भारी भरकम 11. 2 फीसदी की बढ़ोतरी की है। चीन 2012 में 110 अरब डॉलर सेना के लिए खर्च करेगा। वह बजट का बड़ा हिस्सा सेना के आधुनिकीकरण में खर्च कर रहा है जिस वजह से उसके एशियाई पड़ोसी देशों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं और अमेरिका बार बार उसके इरादों के बारे में उससे पूछ रहा है। चीन ने रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी की घोषणा करते हुए कहा, हमारे देश में 1.3 अरब लोग रहते हैं। हमारा देश बड़ा है और बड़ा तट भी है लेकिन दूसरे देशों की तुलना में हमारे देश में सेना पर खर्च बहुत ही कम है। चीन की सीमित सेना उसकी संप्रभुता, सीमा और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए है। चीन दूसरे किसी भी देश के लिए कोई खतरा नहीं है।आजकल के युद्ध में प्रयुक्त बम
विखंडक बम : इसमें विशेष प्रकार के धातु के खोखले पात्र के भीतर विस्फोटक पदार्थ भरा होता है। जब यह वायुयान अथवा राकेट से गिराने पर पृथ्वी से टकराता है तो धमाके के साथ फट जाता है और इसके टुकड़ों से लोग घायल होते हैं। कभी-कभी यह वायुयान से गिराने पर पृथ्वी से कुछ ऊँचाई पर हवा में ही फट जाता है। इन बमों का कुल भार 2 किग्रा से लेकर 50 किग्रा तक होता है। साधारणतया ये बम बड़े क्षेत्रों में गिराए जाते हैं।विध्वंसक बम : इसका भार 50 किग्रा से लेकर 1,000 किग्रा तक होता है। इसमें साधारण विस्फोटक भरा रहता हे।
अग्नि बम :
ये घनी आबादी वाले शहरों तथा बड़े-बड़े कारखानों पर गिराए जाते हैं जिनसे
वे जलकर नष्ट हो जाते हैं। इसमें आग लगाने वाला पदार्थ एक विशेष प्रकार के
पलीते के साथ भरा होता है। आग लगाने के लिए फासफोरस, नेपाम और थर्माइट
इलेक्ट्रान जैसे रासायनिक यौगिक प्रयुक्त किए जाते हैं और तब इनके नाम
प्रयुक्त पदार्थ के अनुसार भी हो जाते हैं।
रासायनिक बम :
यह एक प्रकार का बैलून होता है जिसकी दीवार पतली होती है। यह विषैली
वस्तुओं से भरा हुआ होता है। यह बम जमीन अथवा जमीन से कुछ ऊपर हवा में
विस्फोट करता है तो विषैली वस्तुएँ, गैस, तरल या ठोस जो भी होती हैं, खोल
से बाहर निकलकर जमीन अथवा हवा में बिखर जाती हैं और कुछ ही क्षणों में उस
विस्फोट स्थल के आसपास बादल का रूप धारण कर लेती हैं।जीवाणु बम : इसका भार लगभग 75 क्रिग्रा तक होता है। इसमें कई कक्ष होते हैं। प्रत्येक कक्ष में जीवाणु, रोगग्रस्त कीड़े अथवा जुएँ भरे होते हैं। बम गिराने पर इसमें लगा फ्यूज जल उठता है और इसी समय इसके कक्षों का ढक्क्न, जो कब्जेदार होता है, झटके के साथ खुल जाता है और रोग फैलानेवाले जीवाणु हवा में बिखरकर फैल जाते हैं। यदि इस बम के खोल का ढक्कन जमीन से 30 फुट पर खुल जाता है तो ये जीवाणु लगभग 400 वर्ग मीटर में फैल जाते हैं। जिस क्षेत्र में जीवाणु बम गिराए जाते हैं उसमें मनुष्य, जीव जंतु और पेड़ पौधे आदि सभी रोग के शिकार हो सकते हैं क्योंकि सारा वातावरण दूषित हो जाता है।
विकिरण बम : यह रासायनिक बम की तरह होता है लेकिन इसका खोल कुछ पतला रहता है। इसके भीतर रेडियमधर्मी पदार्थ विस्फोटक पदार्थ के साथ भरा होता है। विस्फोट होने पर ये पदार्थ धूल की तरह हवा में मिल जाते हैं जिससे वहाँ की हवा रेडियमधर्मी पदार्थों से संदूषित हो जाती है। इस प्रकार वहाँ के लोग रेडियमधर्मी विकिरणजन्य रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।
भयावह घटनाएं
ल्ल रासायनिक अस्त्रों में प्रयुक्त रसायनों के दुष्प्रभाव की भयावहता का अनुमान हम भोपाल स्थित कीटनाशक दवाएं बनाने वाली फैक्टरी यूनियन कार्बाइड में दो दिसंबर 1984 को फॉस्जीन एवं मिसाइल आइसो साइनेट के रिसाव से लगा सकते हैं। इस हादसे में हजारों जानें चली गई थीं, हजारों लोग आज भी दुष्प्रभाव झेल रहे हैं।ल्ल 1995 में आम-सिनिक्रय नामक आतंकवादी संगठन ने जापान के टोक्यो शहर के सब-वे पर सेरिन नामक स्नायुतंत्र को प्रभावित करने वाली गैस का रिसाव कर हजारों लोगों को पलभर में घायल कर दिया।
ल्ल तानाशाह सद्दाम हुसैन के सिपहसालारों ने इराक में कुर्दों के विद्रोह को दबाने के लिए संभवतया ऐसे ही किसी रासायनिक हथियार का उपयोग कर हजारों कुर्दों की हत्या कर दी थी।
आठ सेकेंड में भारत पर परमाणु हमला
पाकिस्तानी सेना के एक जनरल ने वर्ष 2001 में ब्रिटेन के पूर्व
प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के पूर्व संचार निदेशक एलिस्टेयर कैंपबेल से
पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को लेकर भारत को याद दिलाने को कहा था। कैंपबेल
ने अपनी डायरी 'द बर्डन आॅफ पावर' में जिक्र किया है कि पाकिस्तान आठ
सेकेंड में भारत पर परमाणु हमला कर सकता है। भारत ने हालांकि कभी दावा नहीं
किया लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय मिसाइलों की जद में पाकिस्तान के
अधिकतर शहर हैं। चीन का परमाणु कार्यक्रम इतना दबा-छिपा है कि उसका अंदाजा
मुश्किल महसूस होता है।
परमाणु अस्त्र
नाभिकीय अस्त्र या परमाणु बम एक विस्फोटक युक्ति है जिसकी विध्वंसक शक्ति का आधार नाभिकीय अभिक्रिया होती है। यह नाभिकीय संलयन या नाभिकीय विखण्डन या इन दोनों प्रकार की नाभिकीय अभिक्रियों के सम्मिलन से बनाये जा सकते हैं। दोनो ही प्रकार की अभिक्रोंके परिणामस्वरूप थोड़े ही सामग्री से भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। आज का एक हजार किलो से थोड़ा बड़ा नाभिकीय हथियार इतनी उर्जा उत्पन्न कर सकता है जितनी कई अरब किलो के परम्परागत विस्फोटकों से ही उत्पन्न हो सकती है। नाभिकीय हथियार महाविनाशकारी हथियार कहे जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में सबसे अधिक शक्तिशाली विस्फोटक, जो प्रयुक्त हुआ था, उसका नाम ब्लॉकबस्टर था। इसके निर्माण में तब तक ज्ञात प्रबलतम विस्फोटक ट्राईनाइट्रीटोलीन का 11 टन प्रयुक्त हुआ था। इस विस्फोटक से 2000 गुना अधिक शक्तिशाली प्रथम परमाणु बम था जिसका विस्फोट टी. एन. टी. के 22,000 टन के विस्फोट के बराबर था। अब तो प्रथम परमाणु बम से अधिक शक्तिशाली परमाणु बम बने हैं। हाइड्रोजन बम भी परमाणु बम की एक किस्म है।
रासायनिक हथियार
शाब्दिक अर्थ ही बताता है कि रसायनों के प्रयोग से बने हथियारों की श्रेणी है रासायनिक हथियार। रासायनिक हथियार के रूप में क्लोरीन गैस का दुरुपयोग जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध के समय किया था। यह गैस आसानी से किसी भी फैक्टरी में साधारण नमक की सहायता से बनाई जा सकती है एवं इसका दुष्प्रभाव सीधा फेफड़े पर पड़ता है। यह गैस फेफड़े के ऊतकों को जलाकर नष्ट करती है। जर्मनी ने इस गैस की कई टन मात्रा को वायुमंडल में छोड़कर एक प्रकार के कृत्रिम बादल के निर्माण में सफलता प्राप्त की एवं हवा के बहाव के साथ इसे वे दुश्मन की ओर भेजने में सफल हुआ। इसकी भयावह मारक क्षमता को ध्यान में रखकर 1925 में इस जैसे विषैलै रसायनों और बीमारियां फैलाने जीवाणुओं को हथियार के रूप में दुरुपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए एक संधि पर विश्व के अधिकांश देशो ने हस्ताक्षर किए। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी में हिटलर के कुख्यात गैस चैम्बर्स ने खूब चर्चा बटोरी। आजकल वैज्ञानिकों का ध्यान कीटनाशक दवाओं में पाए जाने वाले बहुतेरे विषैले रसायनों को और प्रभावी हथियार के रूप में प्रयोग करने पर है। आजकल प्रयोग होने वालीं ‘सेरिन’ एवं ‘वीएक्स’जैसी जहरीली गैसें उपरोक्त एन्जाइम से प्रतिक्रिया कर उनके एसिटिलकोलीन को हटाने के कार्य में बाधा उत्पन्न करती हैं, परिणामस्वरूप पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु कुछ ही पलों में दम घुटने से हो जाती है।जैविक अस्त्र
इन्हें भी बेहद खतरनाक श्रेणी का अस्त्र माना जाता है। ये परमाणु बम एवं हाइड्रोजन बम से भी अधिक भयानक सिद्ध हुए हैं। ये ऐसे अस्त्र हैं जिन्हें छोड़ने पर किसी प्रकार का धमाका नहीं होता। जीवाणु अस्त्र में रोग फैलाने वाले जीवाणु होते हैं और जिस युद्ध में ये इस्तेमाल किए जाते हैं, वह बहुत वीभत्स एवं संहारक होता है। जीवाणुकर्मक या रोग पैदा करने वाले जीवों से यह बनाए जाते हैं। इनका प्रयोग दुश्मन की युद्ध करने की क्षमता घटाने के लिए होता हे। ये जीवाणु उचित वातावरण पाने पर बहुत कम समय में लाखों सैनिकों को रोगग्रस्त कर देते हैं। युद्धास्त्र के रूप में नाना प्रकार के जीवाणु प्रयोग में लाए जाते हैं और प्रत्येक प्रकार के जीवाणु अलग-अलग प्रकार के संक्रामक रोग फैलाते हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि ऐसे जैविक हथियारों से आक्रमण के लिए किसी अत्याधुनिक एवं मंहगे साधन की आवश्यकता नही होती। इन्हें तो बस जानवरों, पक्षियों, हवा, पानी, मनुष्य आदि किसी भी साधन से फैलाया जा सकता है।हर व्यक्ति के हिस्से दो बुलेट
प्रत्येक वर्ष विश्व भर में छोटे हथियारों के लिए गोले-बारूद का चार अरब डॉलर से अधिक का कारोबार होता है। दुनिया भर में हर साल 12 अरब बुलेट का उत्पादन किया जाता है, और अगर धरती पर रहने वाली कुल जनसंख्या के आधार पर इसका अनुपात निकाला जाए तो हर व्यक्ति के हिस्से दो बुलेट आती हैं।विश्व की जीडीपी का ढाई प्रतिशत खर्च : वर्ष 2011 में विश्व भर में सैन्य साजो-सामान पर 1.73 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जो कि साल 2010 के खर्चे में मात्र 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। ये खर्चा विश्व की जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और दुनिया में प्रति व्यक्ति ये 249 अमेरिकी डॉलर बैठता है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत,पाकिस्तान और इजराइल के पास कुल मिलाकर लगभग 19 हजार परमाणु हथियार हैं। साल 2011 की शुरूआत में ये आंकड़ा 20,530 था।
परमाणु अप्रसार संधि : परमाणु अप्रसार संधि (नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी) को एनपीटी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य विश्व भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है। 1 जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ। अभी इस संधि पह हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 190 है। जिसमें पांच के पास आण्विक हथियार हैं। ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फांस, रूस और चीन। सिर्फ चार संप्रभुता संपन्न देश इसके सदस्य नहीं हैं। ये हैं- भारत, इजरायल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। एनपीटी के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश की मान्यता नहीं दी गई है। जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है। इस संधि का प्रस्ताव आयरलैंड ने रखा था सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला राष्ट्र है फिनलैंड। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है जिसने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को यह दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त नहीं है क्योंकि भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था। उत्तरी कोरिया ने इस सन्धि पर हस्ताक्षर किये, इसका उलंघन किया और फिर इससे बाहर आ गया।
दुनिया के सैन्य खर्च में कम बढ़ोतरी : साल 2011 में विश्व भर में सैन्य साजो-सामान पर 1.73 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जोकि साल 2010 के खर्चे में मात्र 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी, ये खर्चा विश्व की जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है और दुनिया में प्रति व्यक्ति ये 249 अमरीकी डॉलर बैठता है। अमरीका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान और इजराइल के पास कुल मिलाकर लगभग 19 हजार परमाणु हथियार हैं. साल 2011 की शुरूआत में ये आंकड़ा 20,530 था। आठ देशों ने 44,00 हथियारों को आॅपरेशन के लिए तैयार रखा है और इनमें से दो हजार उच्च आॅपरेशनल एलर्ट पर हैं। सैन्य खर्च का असर देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है और देश अपनी जनता की जरूरतों पर जरूरी खर्च भी करने में सक्षम नहीं हो पाते।

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