Thursday, September 6, 2012

शिष्टाचार


 शशि शेखर त्रिपाठी
एक समय की बात है। एक राजा जंगल में अपने सेवकों के साथ शिकार के लिए निकला। शिकार ढूंढते-ढूंढते वे लोग बहुत दूर निकल आए। मगर , उन्हें कोई शिकार न मिला। लगातार चलते रहने से राजा को प्यास लग गई।
सेवकों ने पानी की बहुत तलाश की , मगर पानी का कहीं कोई निशान न था। दूर-दूर तक कोई तालाब , नदी , झील , कुंआ कुछ भी नजर नहीं आ रहा था , जहां पानी मिले। थक-हार कर सभी लौटने ही वाले थे , तभी एक सेवक की दृष्टि दूर स्थित एक घास-फूस की बनी कुटिया पर पड़ी। सभी को लगा शायद वहां पानी होगा। राजा ने एक सेवक को पानी लाने का आदेश दिया।
सेवक कुटिया के समीप पहुंच गया। उसने भीतर झांक कर देखा , वहां एक वृद्ध साधु ध्यान मुद्रा में बैठा साधना कर रहा था और पास ही एक घड़ा और लोटा रखा था। सेवक शीघ्र अंदर गया और साधु के पास जाकर जोर से बोला , ' बूढ़े एक लोटा पानी दे। ' तेज आवाज सुनकर साधु ने आंखें खोल दी और कहा , ' वापस चले जाओ मेरे पास थोड़ा ही पानी है और वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता हूं। '
सेवक ने वापस आकर राजा को सारी बात बताई। राजा ने इस बार मंत्री को पानी लाने भेजा। मगर कुछ देर बाद मंत्री भी खाली हाथ लौट आया। आश्चर्यचकित राजा ने इस बार स्वयं जाने का निश्चय किया। कुटिया के दरवाजे पर पहुंचकर राजा ने सबसे पहले वृद्ध साधु को प्रणाम किया और अंदर आने की आज्ञा मांगी। भीतर आकर राजा ने शिष्टतापूर्वक याचक की भांति कहा , ' साधु महाराज , मुझे बहुत प्यास लगी है , यदि थोड़ा पिला दें तो बड़ी कृपा होगी। '
वृद्ध साधु ने राजा को सम्मानपूर्वक बैठाया और घड़े का समस्त जल लाकर पिलाया। इतना ही नहीं साधु ने राजा से कहा ,' हे राजन , यदि आप चाहें तो यहां कुछ देर विश्राम भी कर सकते हैं। '
राजा ने साधु को धन्यवाद दिया और चलने की आज्ञा मांगी। किंतु चलने से पहले उसने वृद्ध साधु से पूछा , ' साधु महाराज , आपने पहले मेरे सेवक व मंत्री को पानी देने से मना कर दिया , लेकिन मुझे पूरा पानी दिया , ऐसा क्यों ?
वृद्ध साधु मुस्कराया और बोला , ' राजन , उनका व्यवहार शिष्ट नहीं था , वाणी मधुर नहीं थी , जबकि आपका व्यवहार शिष्ट था , इसलिए इस भयंकर सूखे में भी मैंने आपको पूरा पानी दे दिया। वास्तव में राजन शिष्टाचार एक अद्भुत गुण है , जो मनुष्य को न सिर्फ सम्मान दिलाता है अपितु उसके कार्य भी सुगम बनाता है। इसके बिना मनुष्य पशु के समान है। वापस लौटकर राजा ने अपने राज्य में सेवकों , सेना एंव अन्य प्रजाजनों के लिए शिष्टाचार की शिक्षा लेना अनिवार्य करवा दिया।




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