Thursday, September 6, 2012

जोगड़ा बाट जोहता है




सात भाइयों के बीच एक बहन थी। बहन का नाम था, सोनबाई। एक दिन सोनबाई अपनी भाभी के साथ मिट्टी लेने गई। सोनबाई जहां खोदती, वहां सोना निकलता और भाभी जहां खोदती, वहां मिट्टी निकलती। भाभी ने अपनी टोकरी मिट्टी से भरी, और सोनबाई ने अपनी टोकरी सोने से भर ली।

सोनबाई की टोकरी में सोना देखकर भाभी का मन ईर्ष्या से भर उठा। अपनी टोकरी सिर पर रखकर भाभी रवाना होने लगी। सोनबाई ने कहा, "भाभी, भाभी! मेरी यह टोकरी उठवा दो।"

भाभी बोली, "तुम आप ही उठा लो। मैं नहीं उठाऊंगी।" इतना कहकर भाभी वहां से चल दी।

सोनबाई अकेली रह गई। टोकरी उठाने की बहुत कोशिश की, पर वह उठा ही नहीं सकी। इसी बीच एक बाबा उधर से निकला। बाबा ने कहा,

"तुम अकेली इतना जोर क्यों लगा रही हो? लाओ, मैं टोकरी उठवाये देती हूं।"

बाबा ने टोकरी उठवा दी। सिर पर टोकरी रखकर सोनबाई अपने घर की तरफ चल पड़ी। लेकिन तुरन्त ही बाबा उसके पीछे दौड़ा, और उसको अपने कन्धे पर बैठाकर अपनी झोंपड़ी में ले गया।

बाबा ने सोनबाई से विवाह कर लिया। उनके चार-पांच बच्चे हुए। एक बार बाबा अपने बाल-बच्चों के साथ यात्रा पर निकला। गांव-गांव घूमते हुए सब आगे बढ़ने लगे। बाबा सोनबाई को गांव में भीख मांगने के लिए भेज देता, और स्वयं गांव के बाहर बैठकर बच्चों को संभालता। यो घूमते-फिरते कई सालों के बाद ये लोग सोनबाई के बाप के गांव में पहुंचे। बाबा ने हमेशा की तरह इस गांव मे भी सोनबाई को भीख मांगने भेजा। सोनबाई घर-घर घूमने और गा-गाकर भीख मांगने लगी:

दंता सेठ के सात बेटे।

सात पर एक बहन सोनबाई।

बाबा के जाल में फंसी सोनबाई।

भीख दो, भीख दो, माई।

गाती जाती और गांव में घर-घर भीख मांगती। कोई रोटी देता तो कोई चुटकी-भर आटा देता। यों घूमते-घूमते सोनबाई अपने ही मां-बाप के घर पहुंची और बोली:

दंता सेठ के सात बेटे।

सात पर एक बहन सोनबाई।

बाबा के जाल में फंसी सोनबाई।

भीख दो, भीख दो, माई।

सोनबाई की आवाज सुनकर घर के सब लोग इकट्ठे हो गए और बोले, "बाई, बाई! तुमने अभी क्या कहा था? एक बार फिर तो कहो।"

सोनबाई ने अपना गीत दोहरा दिया।

सुनकर सब बोले, "अरे, यह तो हमारी सोनबाई ही मालूम होती है।" उन्होंने सोनबाई को पहचान लिया, और उसे अपने पास ही रख लिया।

उधर बाबा ने सोनबाई की बहुत बाट देखी। पर सोनबाई वापस नहीं आई।

बगल में झोला लटकाकर बाबा सोनबाई को खोजने निकल पड़ा। बाबा घर-घर भीख मांगता जाता था और गाता जाता था:

बढ़िया बिन्दी चिपकी है, सुन्दर चोटी गूंथी है।

घर में बच्चे रोते हैं, बाबा बाट जोहते हैं!

घूमता-घूमता बाबा सोनबाई के घर पहुंचा और गाने लगा:

बढ़िया बिन्दी चिपकी है, सुन्दर चोटी गूंथी है।

घर में बालक रोते हैं, बाबा बाट जोहते हैं!

बाबा की आवाज सुनकर घर के लोग इकट्ठे हो गए और बोले, "लगत है, यह वही बाबा है, जो हमारी सोनबाई को ले गया था।"

वे बोले, "बाबाजी! आइए, बैठिए। यह तो आपकी ससुराल ही है। थोड़ी देर में हम सोनबाई को बिदा कर देंगे।"

कुएं पर खटिया डालकर उस पर बिछौना बिछा दिया गया और बाबाजी से कहा गया कि वे खटिया पर बैठें। बाबाजी ज्यों ही खटिया पर बैठे कि धमाके की आवाज के साथ वे कुएं में जा गिरे, और वहीं उनके प्राण पखेरू उड़ गए।

गांव के गोईंड़े में पहुंचकर सोनबाई अपने बच्चों को ले आई। बाद में सोनबाई की भाभी की नाक और चोटी काटकर घरवालों ने उसे गधे पर उलटा बैठाया, और घर से निकाल दिया। सोनबाई अपने पिता के घर चैन से रहने लगी।

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