चार चुहिया थीं। चारों आपस में सहेलियां थीं। एक रहती थी चक्की में, एक रहती थी दुकान में, एक रहती थी बाट में और एक रहती थी खेत में।
एक बार एक किसान अपनी बैलगाड़ी लेकर खेत पर जा रहा था। रास्ते से जाते समय बाट में रहने वाली चुहिया बैलगाड़ी के पहिये से कुचल गई और ऐसी कुचली कि गाड़ी के पहिए से चिपककर रह गई। गाड़ी खेत पर पहुंची। जब किसान गाड़ी में घास में पूले जमा रहे था, तभी खेत में रहने वाली चुहिया ने गाड़ी के पहिये से चिपकी चुहिया को देख लिया। उसने किसान के हाथ संदेसा भेजा:
ओ, किसान भैया
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई हैं।
सुनकर किसान चौंका। बोला, "अरे यहां यह कौन बोल रहा है? कोई आदमी तो यहां है नहीं।
इतने में चुहिया फिर बोली:
ओ, किसान भैया,
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई हैं।
किसान ने चारों तरफ देखा, बार-बार देखा, पर कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ा। किसान डर गया और अपनी बैलगाड़ी और पूले छोड़कर भाग खड़े हुआ।
घर आकर वह बनिये की दुकान पर तेल ख़रीदने गया। उसी दुकान में वह चुहिया भी रहती थी। तेले लेते-लेते किसान बोला, "सेठजी! आज तो गज़ब हो गया!"
सेठ ने पूछा, "क्या हो गया?"
किसान बोला, " मैं गाड़ी में पूले भर रहा था तभी खेत में से कोई बोला:
ओ, किसान भैया,
ओ, पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई है।
दुकानवाली चुहिया अपने बिल में बैठी यह बात सुन रही थी। उसने बिल में से ही पूछा, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?"
सेठ और किसान दोनों एक साथ बोले, "अरे! यह कौन बोला?"
इतने में दुकानवाली चुहिया ने फिर पूछा, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?"
किसान बोला, "सेठ, भागो, भागो, भागो! इस दुकान में भी कोई है।" बस, सेठ और किसान दोनों दुकान सूनी छोड़कर भाग खड़े हुए।
घर पहुंचकर किसान ने अपनी घरवाली से कहा, "तुमने कुछ सुना? आज तो बस गज़ब ही हो गया। खेत में बैलगाड़ी खड़ी करके मैं उसमें पूले भर रहा था, तभी कोई बोला:
ओ, किसान भैया,
ओ पूलेवाले भैया!
दुकानवाली से कहना,
बाटवाली मर गई है।
मैं तो इतना डर गया कि गाड़ी छोड़कर भाग खड़ा हुआ। अभी दुकान पर तेल ख़रीदने गया, तो वहां भी यही अनुभव हुआ। मैं सेठजी से कह रहा था कि आज खेत में कोई ऐसी-ऐसी बात कह रहा था। बात सुनकर मैं तो डरके मारे भाग निकला। उसी समय दुकान में से कोई बोला, "भैया! यह बात तुमसे किसने कही?’ दुकान में दूसरा कोई था नहीं। हम तो वहां से भाग आये। लगता है, जरूर कोई हमारे पीछे पड़ा है!"
इतने में चक्की वाली चुहिया चक्की की झाड़ू और सूप माथे पर रखकर बाहर आईं और आगंन में बैठकर बोली, "भैया! तुमको यह संदेसा किसने दिया था? मेरी बाटवाली सहेली मर गई और खेतवाली सहेली ने दुकानवाली और चक्कीवाली सहेली का संदेसा भेजा! हाय, हाय! ग़ज़ब हो गया!"
किसान चौंका। बोला, "बापरे बाप! यह तो खेत में रहने वाली चुहिया बोली थी। मैं बेकार ही डरा और भागा।"
किसान की घरवाली ने कहा, "आप तो बस, ऐसे ही हैं। चुहिया से भी डर जाते हैं।"
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