एक अहीर था। उसके एक लड़का था। वह रोज गायें लेकर जंगल में जाता था। एक दिन जब वह जंगल की तरफ जा रहा था, तो रास्ते में उसे एक ब्राह्मण मिला। ब्राह्मण चुटकी बजाता जाता था, और ‘राधाक्रष्ण’, ‘राधाक्रष्ण’ बोलता जाता था। चुटकी की आवाज सुनकर अहीर के लड़के को बड़ा अचंभा सा हुआ। उसने चुटकी की आवाज कभी सुनी ही नहीं थी। लड़के ने ब्राह्मण से पूछा, "महाराज, आप क्या बजा रहे हैं?” ब्राह्मण चालाक था। उसने तुरन्त ताड़ लिया। बोला, "अरे भैया! यह तो मेरी ‘फूलकी’ है। मैंने इसे पाला है।”
लड़के ने कहा, "महाराज, आप अपनी यह ‘फूलकी’ मुझे दे देंगे, तो मैं तो अपनी ‘लीलकी’ गाय आपको दे दूंगा।” ब्राह्मण को तो हां भर कहना था। उसने झटपट लड़के को चुटकी बजाना सिखा दिया, और वह गाय लेकर चला गया।
लड़का खुश होता होता घर पहुंचा। वहां आंगन में खाट पर दादाजी बैठे थे। उन्हें देखकर लड़के ने मौज-ही-मौज में चुटकी बजाते हुए कहा, "दादाजी, दादाजी! देखिए तो! अपनी लीलकी गाय देकर मैं यह फूलकी ले आया हूं। दादाजी! जरा सुनिए तो! यह कितनी अच्छी बजती है!”
दादाजी भी उस लड़के से कुछ कम नहीं थे। बोले, "अरे वाह, यह फूलकी तो बहुत ही बढ़िया दिखती है। फट-फट बजती है, और पट-पट बोलती है।” लड़के की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। जब ब्यालू का समय हुआ, तो लड़के ने पूछा, "मां, इस फूलकी को मैं कहां रख दूं? ”
मां बोली, "बेटे, इसे उस कुल्हड़ में रख दे। वह कुल्हड़ कुठले पर पड़ा है। ज़रा संभाल कर रखना।”
उस रात लड़के ने मौज-ही-मौज में दो गुना खाना खाया। लेकिन जब हाथ धोकर वह फूलकी लेने पहुंचा, तो उसे कुल्हड़ में फूलकी नहीं मिली। लड़के का चेहरा उतर गया। वह बोला, "मां-मां! मेरी फूलकी गुम हो गई।”
दादाजी ने कहा, "अभी-की-अभी कहां चली गई? लगता है कि कुल्हड़ ही उसे निगल गया! ”
सब एक साथ बोले, "इस कुल्हड़ को तो तपाना ही होगा। इसे तपाने पर ही फूलकी वापस आयेगी।”
आंगन में बड़ा-सा अलाव जलाया गया और उसमें कुल्हड़ डाल दिया गया। जब ज़ोर की आग जली, तो लड़के के हाथ सूख गए और चुटकी फिर बजने लगी।
लड़का बोला, "लो, यह मेरी फूलकी आ गई।” सुनकर सब खुश हो गए।
एक भूत का भैया था। जंगल मे रहता था, इसलिए उसने कभी कोई दीया देखा नही था। एक दिन वह एक बड़े गांव मे पहुंचा और एक अहीर के घर ठहरा। रात होने पर अहीर के घर में दीया जलाया गया। दीया देखकर भूत भाई गहरे सोच में पड़ गया।
उसने सोचा, ‘यह जगमगाने वाली चीज़ भला क्या है? ऐसी कोई चीज़ तो मैंने कभी नहीं देखी थी। यह तो कोई अजब-गजब सी चीज़ मालूम होती है। लेकिन यह इतनी बढ़िया चीज़ है कि मांगने पर भी कोई देगा नहीं। ठीक है, जब आधी रात होगी और सब सो जायेंगे, तो मैं इसे घास की उस ढेरी की आड़ में छिपा दूंगा और सुबह जाते समय इसे वहां से लेकर चला जाउंगा।’
सब सो गए। मेहमान धीमे से उठा और कुठले के पास पहुंचा। बड़ी सावधानी के साथ उसने मिटटी का दीया अपने हाथ में लिया और चुपचाप घास की ढेरी में रख दिया। बाद में वह इस तरह अपनी खटिया पर आकर सो गया कि किसी को कुछ पता ही न चले।
लेकिन थोड़ी ही देर मे वहां एक ज़बरदस्त होली-सी जल उठी। मेहमान धू-धू जल रही गंजी के पास पहुंचकर कुछ खोजने लगा। लोगों ने पूछा, "भैया, वहां तुम क्या खोज रहे हो? दूर हटो, दूर हटो, नहीं तो जल मरोगे।”
मेहमान बोला, "वाह! वहां तो मेरा अपना जगमगिया है। उसे मैंने वहीं छिपाया है।”
लोगों ने पूछा, "भैया, यह जगमगिया क्या चीज़ है?”
मूरख मेहमान ने कहा, "वही, जो रात उस कुठले पर रखा था। रात में वह जगमग जगमग हो रहा था, और बहुत ही खूबसूरत लग रहा था।”
सब बोले, "अभागे! तो यह आग तुमने ही लगाई थी! हम तो सोच रहे थे कि यह आग कौन लगा गया होगा?”
एक था ब्राह्मण और एक थी ब्राह्मणी। एक बार रात को उनके घर में चोर घुसे। आहट सुनकर ब्राह्मण ने ब्राह्मणी से कहा, "क्योंजी तुम कुछ सुनती हो? लगता है कि घर में चोर घुसे हैं।”
ब्राह्मणी बोली, "हां, लगता तो यही है। तुम कहो तो मैं ज़ोर से चिल्लाउं और सब पड़ोसियों को इकट्ठा कर लूं?”
ब्राह्मण ने कहा, "ठहरो। हम तो ब्राह्मण हैं! बिना मुहूर्त देखे कोई काम कर ही नहीं सकते। मुझे पंचांग निकालने दो और देखने दो कि आज चिल्लाने का मुहूर्त निकलता है या नहीं।”
ब्राह्मण पंचांग देखने लगा।
ब्राह्मणी ने पूछा, "क्यों कोई मुहूर्त निकल रहा है या नहीं?”
ब्राह्मण बोला, "भला, मुहूर्त कोई रास्ते में पड़ी चीज़ है? मुहूर्त तो निकल रहा है, आज से छह महीने बाद का। इसलिए छह महीने बाद सोचेंगे। अभी तो हम सो जायं।” फिर चोरों के लिए तो चिन्ता की कोई बात रहती ही क्यों? अपना ही घर मानकर उन्हें जो भी चुराना था, सो सब चुराकर ले गए।
छह महीने बीत गए। ब्राह्मण बोला, "अब आज हम बदमाश चोरों से निपट लेंगे। आज का मुहूर्त निकला है।”
जब आधी रात हुई, तो ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों ज़ोर ज़ोर से चीखने और चिल्लाने लगे, "दौड़ो- दौड़ो, घर में चोर घुसे हैं।”
यह सोचकर कि चोर ग़रीब ब्राह्मण को लूटकर चले जायंगे, पास-पड़ोस के लोग दौड़कर आए और पूछने लगे, "महाराज! बताइए, चोर कहां है?”
महाराज बोले, "भाइयो, चोर तो छह महीने पहले आए थे। पर ख़बर आज दे रहा हूं।”
लोगों ने कहा, "महाराज! आप तो हमें मूर्ख मालूम होते है। कहीं छह महीने बाद कोई ख़बर दी जाती है!”
ब्राह्मण बोला, "लेकिन भाइयो! जब मुहूर्त ही नहीं निकल रहा था तो मैं क्या करता!”
एक मुर्ख था। एक बार वह अपनी बहन के घर गया। बहन ने बड़ी उमंग के साथ भाई को ढोकले खिलाए। भाई को ‘ढोकले’ बहुत पसन्द आए। उसने बहन से पूछा, "इनका नाम क्या है?”
बहन ने कहा, "ढोकले।”
भाई ने सोचा कि घर पहुंचकर ढोकले बनवाउंगा और पेट भरकर
खाउंगा। वह मन-ही-मन ‘ढोकले-ढोकले’ की रट लगाता हुआ अपने घर की तरफ चला। उसे भरोसा था कि अगर रटूंगा नही, तो सब भूल जाउंगा।
रास्ते में एक छोटा-सा नाला पड़ा। उसे पार किए बिना आगे बढ़ा नहीं जा सकता था। पार करने की तरकीब सोची और पार भी कर लिया। लेकिन मन मे अचंभा-सा हुआ कि इसे मैंने कैसे पार कर लिया! इस सोच-विचार में वह ढोकले का नाम भूल गया, और इसके बदले ‘खूब पार किया’, ‘खूब पार किया’ ज़बान पर चढ़ गया। घर पहुंचकर घरवाली से कहा, "सुनो, जल्दी करो। मेरे लिए ‘खूब पार किया’ बना दो। मुझे तो ‘खूब पार किया’ ही खाना है। मेरी बहन ने बहुत मीठे ‘खूब पार किया’ बनाए थे।”
घरवाली सोच में पड़ गई, ‘अरे, यह ‘खूब पार किया’ क्या चीज़ है?’ बात उसकी समझ में आई नही। देर होती देखकर मूर्ख का गुस्सा बढ़ने लगा। बोला, "बनाती क्यों नही हो? बैठी क्यों हो?”
घरवाली ने कहा, ‘खूब पार किया’ कैसे बनता है, मैं तो जानती नहीं हूं। आपकी बहन जानती है, तो वापस उनके घर जाइए, और उनसे कहिए कि वे बना दें।” सुनकर उसका पारा चढ़ गया। पास ही में एक मोंगरी पड़ी थी। उसे उठाकर वह अपनी घरवाली को तड़ातड़ पीटने लगा। बेचारी को इस बुरी तरह पीटा कि उसके सारे बदन पर ‘ढोकले-ही-ढोकले’ उठ आये।
पास-पड़ोस के लोग दौड़कर इकट्ठे हो गये। मारनेवाले को उलहना देते हुए बोले, "अरे, अपनी घरवाली को कोई इस तरह पीटता है। देखो, इसके सारे बदन पर ढोकले-ही-ढोकले उठ आये हैं।”
मूर्ख बोला, "हां-हां, बस, ये...ये...ढोकले! मुझे तो ढोकले ही खाने हैं। मैं तो इनका नाम ही भूल गया था।”
सबने कहा, "मूर्ख कहीं का! ”
किसान का एक लड़का था। वह बड़ा मूर्ख था। एक बार अपने खेत से घर आ रहा था। रास्ते में उसे एक घोड़ीवाला मिला। घोड़ी देखकर लड़के ने चाहा कि वह उसे खरीद ले। उसने घोड़ीवाले से पूछा, "क्यों भाई, इस घोड़ी का क्या लोगे? तुमको जो लेना हो ले लो, पर यह घोड़ी मुझे देते जाओ।”
घोड़ीवाले ने कहा, "लड़के! इसके पूरे सौ रूपये लगेंगे।"
लड़का बोला, "मेरे पास सौ रूपये तो नहीं है, पचास रूपये हैं।"
घोड़ीवाले ने कहा, "तो तुम अपने घर का रास्ता नापो। यों मुफ्त में कोई घोड़ी पर कैसे बैठ सकता है?"
लड़का बोला, "भाई, अगर हम ऐसा करें कि मैं ये पचास रूपये तुमको नकद दे दूं, और बाकी के पचास के बदले तुमको तुम्हारी घोड़ी लौटा दूं तो कैसा रहे? बोलो, यह सौदा तुम्हें मंजूर है पचास रूपये हैं?"
बात घोड़ीवाले की समझ में आ गई। वह कोई भला आदमी तो था नहीं। पचास रूपये और घोड़ी दोनों लेकर वह वहां से बेखटके चल पड़ा। इधर यह लड़का भी बहुत खुश हो गया। वह टिक्- टिक् आवाज करता हुआ झूठ-मूठ ही घोड़ी को हांकने लगा। हांकते-हांकते अपने घर आया। घर पहुंचकर बोला, "पिताजी, पिताजी! मैंने आज एक घोड़ी खरीदी है।"
पिताजी ने पूछा, "वह घोड़ी कहां है?"
लड़का बोला, "पिताजी, बात यह हुई कि घोड़ी मैंने सौ रूपयों में खरीदी, लेकिन मेरे पास तो पचास रूपये ही थे। वह पचास रूपये मैंने घोड़ीवाले को चुका दिए, और बाकी के पचास रूपये के बदले मैंने उसे उसकी घोड़ी वापस दे दी। हम अपने सिर बेकार कर्ज क्यों रखें?"
बाप ने कहा, "वाह बेटे, वाह! तेरी अक्ल के क्या कहने!"
एक ब्राह्मण था। एक बार उसका एक भानजा बीमार पड़ा। भानजे के समाचार जानने के लिए वह उसके गांव गया। समाचार जान लेने के बाद जब वह वापस अपने घर आ रहा था, तो रास्ते में उसे एक मसखरा सेठ मिला। सेठ ने पूछा, "काका, आप कहां हो आए?"
ब्राह्मण बोला, "भानजा बीमार था, इसलिए मैं उसके समाचार लेने गया था।"
सेठ ने कहा, "आपने कुछ सुना है या नहीं? क्या नहाने की नौबत आई है?"
ब्राह्मण बोला, "नहीं भैया! मैं तो घर में सबको भला-चंगा छोड़कर गया था। इन दो दिनों में और क्या हो गया? तुम्हारी काकी तो अच्छी-भली है न?"
सेठ ने कहा, "अरे महाराज, बहुत ही बुरा हुआ। मेरी तो जीभ ही नहीं खुल रही। लेकिन मेरी काकी विधवा हो चुकी है। गजब हो गया है, महाराज, गजब हो गया है!"
ब्राह्मण बोला, "एं-एं! क्या तुम्हारी काकी विधवा हो गई है? यह तुम क्या कह रहे हो? वह तो खुब तगड़ी थी। वह विधवा कैसे हो गई?"
सेठ मन-ही-मन हंसते हुए आगे बढ़ गया। ब्राह्मण अपने घर की गली के नुक्कड़ के पास पहुंचा। पहुंचकर चादर माथे पर ओढ़ ली और जोर-जोर से रोने लगा। गली के लोग इकटठे हो गए। ब्राह्मण अपने आंगन में जाकर बैठा और लगातार रोता ही रहा।
घर के अन्दर से ब्राह्मण की बेटी बाहर आई। बोली, "पिताजी, अब आप रोना बन्द कर दीजिए। जो होना था, सो तो हो चुका है।"
पिताजी उठे और आंखे पोंछने लगे। तभी बेटी ने पूछा, "पिताजी, मेरे फुफेरे भैया तो बहुत ही भले चंगे थे। उनको अचानक क्या हो गया?"
पिताजी बोले, "बेटी! भानजा तो मेरा ठीक है। पर यह तो एक दूसरा ही गज़ब हुआ है। रास्ते में मुझे माधो हलवाई ने ख़बर दी कि यहां उसकी काकी विधवा हो गई है। बेटी, तेरी मां विधवा हो जाय,तो क्या मुझे रोना नहीं आयगा? हाय-हाय, यह तो गजब हो गया!"
बेटी बोली, "लेकिन पिताजी! जब आप मौजूद हैं, तो मेरी मां विधवा कैसे हो सकती है?"
पिताजी बोले, ‘’अरे हां, इस बात का तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा!"
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